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मेरी आँखें बंद करो
और इस तरह से
दुनिया को बंद करना
मैं तुम्हें फिर मिलूंगा
तुम  शानदार हो 
जीवित और ज्वलंत
मेरे सीने  से गहरी सांस लेना
मैं तुम्हारी मुस्कान  की तस्वीर बना लूँगा 
तुम्हारी  आंखों के पीछे का नरम  प्रकाश
मेरे दिमाग में यादों का  मीलो  चलना
इच्छा है कि मैं एक चील  की तरह झपट के 
और तुम्हें उस जगह  ले जाऊ 
जिस  जगह जहां आँसू गिरते थे 
जबकि हम आमने-सामने बैठे थे
एक दूसरे के गाल पर हाथ
फुसफुसाते हुए "सब ठीक है"

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by राज़ नवादवी on November 7, 2018 at 10:38am

आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान साहब, आदाब. अच्छी कविता हुई है, मुबारकबाद पेश करता हूँ. सादर 

Comment by Samar kabeer on November 3, 2018 at 5:38pm

जनाब नरेंद्र सिंह चौहान साहिब आदाब,कविता का प्रयास अच्छा है,लेकिन कविता कुछ और समय चाहती है ।

'  और इस तरह से'

इस पंक्ति में 'इस तरह' के बाद 'से' लिखने की ज़रूरत नहीं होती ।

बाक़ी की पंक्तियों में कहीं सम्बोधन 'तुम' है कहीं 'आप',इस पर विचार करें ।

इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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