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याद के खेत गोड़ देता हूँ (ग़ज़ल) पंकज मिश्र: इस्लाह की गुज़ारिश के साथ पेश

2122 1212 22(112)

याद के खेत गोड़ देता हूँ

घाव मन के यूँ फोड़ देता हूँ

उम्र भर का रिसाव ठीक नहीं

ले ये आँखें निचोड़ देता हूँ 

मुक्त स्वच्छन्द हो उड़ान उसकी

डोर रिश्तों की तोड़ देता हूँ

प्यार मुझसे न फिर से हो जाए

ले ये दुनिया ही छोड़ देता हूँ.

कब तलक यूँ रहूँगा मैं बेघर

कब्र से नाता जोड़ देता हूँ

मौलिक अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on Wednesday

प्यार मुझसे न उनको हो फिर से

ले ये दुनिया ही छोड़ देता हूँ. 

उनको को भी उसको कर लें तो असहजता की थोडी भी संभावना हुई तो वो भी जाती रहेगी. 

शुभ-शुभ

 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on Wednesday

आदरणीय अग्रज सौरभ पांडेय जी, सादर प्रणाम

आपके सुझाव मेरे लिए बेशकीमती होते हैं, सुझावों के अनुरूप संशोधन अभी करता हूँ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on Wednesday

भाई, ग़ज़ब का क़ाफ़िया लिया है ! अब यह प्रयोग है तो है. उस हिसाब से तो प्रस्तुति वाकई रोचक बन पड़ी है.

गोड़ना को जिस तरह से आपने प्रयुक्त किया है वह बरबस चकित कर रहा है. 

लो मैं आँखें निचोड़ देता हूँ ... ले ये आँखें निचोड़ देता हूँ .. मुझे लगता है कथ्य के हिसाब से ये अधिक समीचीन होगा. 

मुक्त स्वच्छन्द हो उड़ान उनकी ... उनकी क्यों ? उसकी क्यों नहीं ? ऐसे में आपका व्यथाजनित क्रोध बेहतर ढंग से बहिराएगा, भाई.  

सो मैं दुनिया ही छोड़ देता हूँ ... ले ये दुनिया छोड़ देता हूँ...  कारण वही. 

वस्तुतः, वर्ण्य पीड़ा और तदनुरूप क्रोध किसी शिष्टाचार का मुखापेक्षी नहीं हुआ करता, पंकज भाई.

क्योंकि, वह अपनापन के इंतिहा पर गहरी टूटन का दुःख झेलती हुई होती है. 

बधाई हो. 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on Monday

आदरणीय बाउजी सादर प्रणाम

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on Monday

आदरणीय राज नवादवी साहब बहुत बहुत आभार

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on Monday

आदरणीय अजय सर ग़ज़ल पर समालोचनात्मक आशीर्वाद के लिए हृदय से आभार, सीख रहा हूँ अभी

Comment by Samar kabeer on November 11, 2018 at 6:40pm

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by राज़ नवादवी on November 11, 2018 at 5:50pm

आदरणीय पंकज जी, आदाब, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई. सादर. 

Comment by Ajay Tiwari on November 10, 2018 at 7:26am

आदरणीय पंकज जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

ग़ज़ल में एक अतिशय निराशा का भाव है लेकिन वो शायद 'ड़' के काफ़िये की वज़ह ठीक से अभिव्यक्त नहीं हो पाया है. शिल्प का वैचित्र्य कथ्य पर भारी पड़ गया है.

सादर 

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