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इस नज़र से उस नज़र की बात लम्बी हो गई

मेज़ पे रक्खी हुई ये चाय ठंडी हो गई

 

आसमानी शाल ने जब उड़ के सूरज को ढका

गर्मियों की दो-पहर भी कुछ उनींदी हो गई

 

कुछ अधूरे लफ्ज़ टूटे और भटके राह में     

अधलिखे ख़त की कहानी और गहरी हो गई

 

रात के तूफ़ान से हम डर गए थे इस कदर

दिन सलीके से उगा दिल को तसल्ली हो गई

 

माह दो हफ्ते निरंतर, हाज़री देता रहा

पन्द्रहवें दिन आसमाँ से यूँ ही कुट्टी हो गई

 

कुछ दिनों का बोल कर अरसा हुआ लौटीं न तुम 

इश्क की मंडी में जानाँ तबसे मंदी हो गई

 

बादलों की बर्फबारी ने पहाड़ों पर लिखा   

रात जब सो कर उठी शहरों में सर्दी हो गई

 

कान दरवाज़े की कुंडी में ही अटके रह गए

झपकियों ही झपकियों में रात कब की हो गई

मौलिक व् अप्रकाशित 

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Comment by दिगंबर नासवा on Tuesday

बहुत शुक्रिया शिज्जु जी ...


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Comment by शिज्जु "शकूर" on Tuesday

आ. दिगंबर नासवा जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है, सादर बधाई आपको

Comment by दिगंबर नासवा on February 11, 2019 at 9:35am

शुक्रिया सुरखाब साहब ...

Comment by Surkhab Bashar on February 9, 2019 at 11:38pm

आ़ दिगंबर नासवा साहब उम्दा ग़ज़ल हुई है मुबारक बाद

Comment by दिगंबर नासवा on February 9, 2019 at 12:51pm

बहुत आभार लक्ष्मण जी ... 

अच्छा है सुझाव आपका ... दरअसल मैं चाँद के चौदह और पंद्रह दिन का चक्र पूरा करना चाहता था इसलिए स्पष्ट कर के लिखा ...

बहुत बहुत आभार सराहना के लिए ...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2019 at 7:14am

आ. भाई दिगम्बर जी, सादर अभिवादन । सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

दो हफ्ते को - पखवाड़े' करने से भी दोष निकल जायेगा । सादर...

Comment by दिगंबर नासवा on February 8, 2019 at 7:49pm

बहुत शुक्रिया आदरणीय समर कबीर जी ... 

ये दोष हर बार मेरी नज़र में नहीं आ पाता  ... आपके सुझाव बहुत उत्तम हैं ... आपका आभार है ग़ज़ल है को सुगम बनाने के लिए ...

Comment by Samar kabeer on February 8, 2019 at 5:44pm

जनाब दिगंबर नासवा जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है,मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

'चाँद दो हफ्ते निरंतर, हाज़री देता रहा'

इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखें,"चाँद" की जगह "माह" कर सकते हैं,और नहीं करें तो भी कोई बात नहीं,एक सुझाव मात्र है ।

'कुछ दिनों का बोल कर अरसा हुआ लौटी न तुम 

इश्क की मंडी में जाना तबसे मंदी हो गई'

इस शैर के ऊला में 'लौटी' को "लौटीं" और सानी में 'जाना' को "जानाँ" करना उचित होगा ।

'कान दरवाज़े की कुंडी में अटक के रह गए'

इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखें,मिसरा यूँ कर लें तो ऐब निकल सकता है:-

'कान दरवाज़े की कुंडी में ही अटके रह गए'

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