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2122 1212 22

फासले    बेकरार    करते   हैं ।

और   हम   इतंजार  करते   हैं ।।

इक तबस्सुम को लोग जाने क्यूँ ।

क़ातिलों में सुमार करते हैं ।।

सिर्फ धोखा मिला ज़माने से ।

जब कभी ऐतबार करते हैं ।।

मैं तो इज्ज़त बचा के चलता हूँ ।

और वह तार तार करते हैं ।।

उम्र गुज़री है बस चुकाने में ।

आप जब भी उधार करते हैं।।

उनको गफ़लत हुई यही यारो ।

इश्क़ हम से हजार करते हैं ।।

हुस्न की बेसबब नुमाइश कर ।

गुल खिंजा को बहार करते हैं।।

अब मुहब्बत की बात क्या करना ।

जब वो खंजर पे धार करते हैं ।।

हाले दिल अब न पूछिये हमसे ।

आप तो इश्तिहार करते हैं ।।

कितने शातिर हैं शह्र वाले ये ।

पीठ पे रोज वार करते हैं ।।

बेचते अब ज़मीर दौलत पर ।

वो यही कारोबार करते हैं ।।

कुछ वफाओं का वास्ता देकर ।

लोग दिल का शिकार करते हैं ।।

डॉ नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Thursday

आ. भाई नवीन जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on Tuesday

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी। बेहतरीन गज़ल।

सिर्फ धोखा मिला ज़माने से ।

जब कभी ऐतबार करते हैं ।।

मैं तो इज्ज़त बचा के चलता हूँ ।

और वह तार तार करते हैं ।।

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