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एक ग़ज़ल । हम हैं नाकाम ऐ हम-नवा

फाइलुन फाइलुन फाइलुन
2 1 2 ,2 1 2 , 2 1 2

हम हैं नाकाम ऐ हम-नवा,
काम आई तेरी बद-दुआ ।

इश्क़ की है अभी इब्तिदा ,
यार मुझ को न तू आज़मा।

रात भर जागता रहता है,
चाँद क्यों इतना है ग़म-ज़दा ।

आखरी बार मुझ से मिलो ,
आखरी बार है इल्तिजा ।

अब नही देखता तुझ को मैं,
रायगाँ है सवरना तेरा ।
- शेख ज़ुबैर अहमद

मौलिक एवं अप्रकाशित

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