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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"
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  • Uttar Pradesh
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"स्वागत है"
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"आदरणीय अमित जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई"
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"अभी अभी लिखे हूँ ग़ज़ल, बहुत दिनों से भागीदारी नही हो पा रही थी इस लिए बहुत जल्दबाज़ी हुई है।"
19 hours ago
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"आदरणीय बाऊजी प्रणाम सहीह कर दिए हूँ"
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"साथ तुम्हारा मुझको ऐसा लगता है मरुथल मे ज्यूँ मीठा दरिया लगता है सामने तेरे खिला खिला सा लगता है दूर गए तो मन मुरझाया लगता है तुझ में कुछ ऐसे मिलता जाता हूँ, ज्यूँ शक्कर पानी में घुलता सा लगता है क्यूँ लगता है कुछ जाना पहचाना सा चाँद बता तू कौन…"
19 hours ago
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

प्रेम हो जाना अर्थात रात भर जगना------गीत

प्रेम हो जाना अर्थात रात भर जगना।।भूख प्यास नींद चैन सब गँवा करअवधान में एकल उद्दीपक बसा करउस तक पहुँचने का सतत यत्न करनाप्रेम हो जाना अर्थात रात भर जगना।।इच्छित के प्रति समर्पण है प्रेमउद्देश्य के प्रति अभ्यर्पण है प्रेमलक्ष्य के प्रति अनवरत गतिशील रहनाप्रेम हो जाना अर्थात रात भर जगना।।प्रेयसी के अंक पाश तक सीमित नहींकाम जनित आकर्षण तो किंचित नहींकामना के केंद्र-बिंदु पर टिके रहनाप्रेम हो जाना अर्थात रात भर जगना।।माता-पिता व संतान, गुरु और ज्ञानस्त्री और पुरुष, भक्त और भगवानसाधक का साध्य में…See More
Monday
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

स्वप्न के सीवान में----------गीत

स्वप्न के सीवान में ज़ुल्फ़ों के बादल छा गएचाँद क्या आया नज़र हम दिल गँवा कर आ गए।।चूम कर नज़रों से नज़रें, गुदगुदा कर मन गईरूपसी जादू भरी थी मन की अभिहर* बन गई                      तन सुरभि का यूँ असर खुद को भुला कर आ गएचाँद क्या आया नज़र हम दिल गँवा कर आ गए।।मन्द सी मुस्कान उसके होठों पर जैसे खिलीइस हृदय की बन्द साँकल खुद अचानक से खुलीहम मनस में रूप उसका लो सजा कर आ गएचाँद क्या आया नज़र हम दिल गँवा कर आ गए।।चाल हिरनी बात जैसे छंद मानस का सरलस्वर मधुर ऐसे कि जैसे मीर की कोई ग़ज़लसो उसे हम प्रीत की सरगम…See More
May 18
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"आदरणीय सौरभ सर, सादर प्रणाम दोष पकड़ने की कोशिश करता हूँ"
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"आदरणीय हरिओम जी सादर आभार"
May 18

Profile Information

Gender
Male
City State
Azamgarh
Native Place
Azamgarh
Profession
Teaching

Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog

प्रेम हो जाना अर्थात रात भर जगना------गीत

प्रेम हो जाना अर्थात रात भर जगना।।

भूख प्यास नींद चैन सब गँवा कर

अवधान में एकल उद्दीपक बसा कर

उस तक पहुँचने का सतत यत्न करना

प्रेम हो जाना अर्थात रात भर जगना।।

इच्छित के प्रति समर्पण है प्रेम

उद्देश्य के प्रति अभ्यर्पण है प्रेम

लक्ष्य के प्रति अनवरत गतिशील रहना

प्रेम हो जाना अर्थात रात भर जगना।।

प्रेयसी के अंक पाश तक सीमित नहीं

काम जनित आकर्षण तो किंचित नहीं

कामना के केंद्र-बिंदु पर…

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Posted on May 20, 2019 at 1:01pm

स्वप्न के सीवान में----------गीत

स्वप्न के सीवान में ज़ुल्फ़ों के बादल छा गए

चाँद क्या आया नज़र हम दिल गँवा कर आ गए।।

चूम कर नज़रों से नज़रें, गुदगुदा कर मन गई

रूपसी जादू भरी थी मन की अभिहर* बन गई                      

तन सुरभि का यूँ असर खुद को भुला कर आ गए

चाँद क्या आया नज़र हम दिल गँवा कर आ गए।।

मन्द सी मुस्कान उसके होठों पर जैसे खिली

इस हृदय की बन्द साँकल खुद अचानक से खुली

हम मनस में रूप उसका लो सजा कर आ गए

चाँद क्या आया नज़र हम दिल…

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Posted on May 10, 2019 at 9:00am — 4 Comments

गज़ब करता है अय्यारी.......तरही ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222

गज़ब करता है अय्यारी ज़माने से ज़माना भी

हक़ीक़त जो है इस पल में है कल का वो फ़साना भी

न मानो तो सकल संसार है इक शै महज़, लेकिन

हर इक शै ज्ञान का खुद में है अतुलित इक खज़ाना भी

बहुत अलगाव का परचम उठाए फिर लिए यारों

समय कहता है आवश्यक हुआ सबको मिलाना भी

उन्होंने पूछा उसको किस लिए फ़िलवक्त चुप है वो

समंदर हौले से बोला है इक तूफाँ उठाना भी

बहाते नीर हो क्यूँकर, जो बादल से कहा…

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Posted on April 28, 2019 at 2:30pm — 4 Comments

यार पंकज, चुन सुकूँ, रख बन्द आँखें, मौन धर-----ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

मौन रह अपनी ज़रूरत के लिए ए मित्रवर

तू समस्याओं पे काहें को फ़िराता है नज़र

यूँ भी सदियों से लुटेरे आबरू लूटा किए

रोकने की क्या ज़रूरत लूट लेंगे अब अगर

चाय अपनी दाल रोटी चल रही दासत्व से

तो भला ज़िद ठान बैठा है तू क्यूँ सम्मान पर

साख़ पर उल्लू हैं लाखों क्या हुआ, जाने भी दे

छोड़ चिंता बाग की, बस धन पे रख अपनी नज़र

क्या गरज तुझको पड़ी क्यूँ नींद अपनी खो रहा

यार पंकज, चुन सुकूँ, रख बन्द…

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Posted on April 17, 2019 at 1:27pm — 7 Comments

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At 4:23pm on February 28, 2016, kanta roy said…

स्वागत आपका तहेदिल आदरणीय पंकज जी।  

At 6:34pm on October 26, 2015, kanta roy said…

महीने के सक्रीय सदस्य चुने जाने के इस गौरव पल के  लिए ढेरों बधाई आपको आदरणीय पंकज जी।  

At 11:27pm on October 15, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

पंकज कुमार मिश्रा 'वात्स्यायन' जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 5:35pm on August 7, 2015, Ravi Shukla said…

स्‍वागत है पंकज जी आपका

At 11:39am on July 26, 2015, Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" said…
सभी लोगों का सादर अभिवादन
 
 
 

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