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ग़ज़ल की कक्षा

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ग़ज़ल की कक्षा

इस समूह मे ग़ज़ल की कक्षा आदरणीय श्री तिलक राज कपूर द्वारा आयोजित की जाएगी, जो सदस्य सीखने के इच्‍छुक है वो यह ग्रुप ज्वाइन कर लें |

धन्यवाद |

Location: OBO
Members: 338
Latest Activity: 25 minutes ago

Discussion Forum

ग़ज़ल संक्षिप्‍त आधार जानकारी-10 36 Replies

मुफरद बह्रों से बनने वाली मुजाहिफ बह्रेंइस बार हम बात करते हैं मुफरद बह्रों से बनने वाली मुजाहिफ बह्रों की। इन्‍हें देखकर तो अनुमान हो ही जायेगा कि बह्रों का समुद्र कितना बड़ा है। यह जानकारी संदर्भ के काम की है याद करने के काम की नहीं। उपयोग करते करते ये बह्रें स्‍वत: याद होने लगेंगी। यहॉं इन्‍हें देने का सीमित उद्देश्‍य यह है जब कभी किसी बह्र विशेष का कोई संदर्भ आये तो आपके पास वह संदर्भ के रूप में उपलब्‍ध रहे। और कहीं आपने इन सब पर एक एक ग़ज़ल तो क्‍या शेर भी कह लिया तो स्‍वयं को धन्‍य…Continue

Tags: बह्र, विवरण, पाठ, ज्ञान, ग़ज़ल

Started by Tilak Raj Kapoor. Last reply by Farida shahin Jun 24, 2017.

ग़ज़ल-संक्षिप्‍त आधार जानकारी-9 6 Replies

(श्री तिलक राज कपूर जी द्वारा मेल से भेजे गए पोस्ट को हुबहू पोस्ट किया जा रहा है.....एडमिन) जि़हाफ़:जि़हाफ़ का शाब्दिक अर्थ है न्‍यूनता या कमी। बह्र के संदर्भ में इसका अर्थ हो जाता है अरकान में मात्राओं की कमी। ग़ज़ल का आधार संगीत होने के कारण यह जरूरी हो गया कि मात्रिक विविधता पैदा की जाये जिससे बह्र विविधता प्राप्‍त हो सके। इसका हल तलाशा गया मूल अरकान में संगीतसम्‍मत मात्रायें कम कर उनके नये रूप बनाकर। मात्रायें कम करना कोई तदर्थ प्रक्रिया नहीं है, इसके निर्धारित नियम हैं।मुख्य…Continue

Started by Admin. Last reply by आवाज शर्मा Jul 20, 2011.

ग़ज़ल-संक्षिप्‍त आधार जानकारी-8 7 Replies

बह्र विवरण-अगला चरण:पिछली पोस्‍ट में जो जानकारी दी गयी थी उससे एक स्‍वाभाविक प्रश्‍न उठता है कि सभी मुफ़रद बह्र एक ही रुक्‍न की आवृत्ति से बनती हैं तो वो प्रकृति से ही सालिम हैं और मुरक्‍कब बह्र अलग-अलग अरकान से बनती हैं तो सालिम हो नहीं सकतीं फिर सालिम परिभाषित करने की आवश्‍यकता कहॉं से पैदा हुई। जहॉं तक मूल अरकान की बात है उनके लिये सालिम परिभाषित करने की वास्‍तव में कोई आवश्‍यकता नहीं थी लेकिन अरकान के जि़हाफ़़ से मुज़ाहिफ़ बह्र बनती हैं और उनमें एक ही जि़हाफ़़ की आवृत्ति होने पर सालिम की…Continue

Tags: पाठ, विवरण, ज्ञान, ग़ज़ल, कक्षा

Started by Tilak Raj Kapoor. Last reply by Tilak Raj Kapoor May 14, 2011.

ग़ज़ल-संक्षिप्‍त आधार जानकारी-7 4 Replies

ग़ज़ल की विधा में रदीफ़ काफि़या तक बात तो फिर भी आसानी से समझ में आ जाती है, लेकिन ग़ज़ल के तीन आधार तत्‍वों में तीसरा तत्‍व है बह्र जिसे मीटर भी कहा जा सकता है। आप चाहें तो इसे लय भी कह सकते हैं मात्रिक-क्रम भी कह सकते हैं।रदीफ़ और काफि़या की तरह ही किसी भी ग़ज़ल की बह्र मत्‍ले के शेर में निर्धारित की जाती है और रदीफ़ काफिया की तरह ही मत्‍ले में निर्धारित बह्र का पालन पूरी ग़ज़ल में आवश्‍यक होता है। प्रारंभिक जानकारी के लिये इतना जानना पर्याप्‍त होगा कि बह्र अपने आप में एकाधिक रुक्‍न…Continue

Tags: बह्र, कक्षा, ग़ज़ल, ज्ञान, पाठ

Started by Tilak Raj Kapoor. Last reply by विनोद 'निर्भय' yesterday.

ग़ज़ल-संक्षिप्‍त आधार जानकारी-6 15 Replies

काफि़या को लेकर अब कुछ विराम लेते हैं। जितना प्रस्‍तुत किया गया है उसपर हुई चर्चा को मिलाकर इतनी जानकारी तो उपलब्‍ध हो ही गयी है कि इस विषय में कोई चूक न हो। रदीफ़ को लेकर कहने को बहुत कुछ नहीं है फिर भी कोई प्रश्‍न हों तो इस पोस्‍ट पर चर्चा के माध्‍यम से उन्‍हें स्‍पष्‍ट किया जा सकता है। लेकिन रदीफ़ और काफि़या को लेकर कुछ महत्‍वपूर्ण है जिसपर चर्चा शेष है और वह है रदीफ़ और काफि़या के निर्धारण में सावधानी। यह तो अब तक स्‍पष्‍ट हो चुका है कि रदीफ़ की पुनरावृत्ति हर शेर में होती है और काफि़या का…Continue

Tags: पाठ, ज्ञान, ग़ज़ल, कक्षा

Started by Tilak Raj Kapoor. Last reply by kanta roy Jan 27, 2016.

ग़ज़ल-संक्षिप्‍त आधार जानकारी-5 36 Replies

पिछले आलेख में हमने प्रयास किया काफि़या को और स्‍पष्‍टता से समझने का और इसी प्रयास में कुछ दोष भी चर्चा में लिये। अगर अब तक की बात समझ आ गयी हो तो एक दोष और है जो चर्चा के लिये रह गया है लेकिन देवनागरी में अमहत्‍वपूर्ण है। यह दोष है इक्‍फ़ा का। कुछ ग़ज़लों में यह भी देखने को मिलता है। इक्‍फ़ा दोष तब उत्‍पन्‍न होता है जब व्‍यंजन में उच्‍चारण साम्‍यता के कारण मत्‍ले में दो अलग-अलग व्‍यंजन त्रुटिवश ले लिेये जाते हैं। वस्‍तुत: यह दोष त्रुटिवश ही होता है। इसके उदाहरण हैं त्रुटिवश 'सात' और 'आठ' को…Continue

Tags: पाठ, ज्ञान, ग़ज़ल, कक्षा

Started by Tilak Raj Kapoor. Last reply by Nilesh Shevgaonkar Apr 22, 2017.

ग़ज़ल-संक्षिप्‍त आधार जानकारी-4 31 Replies

काफि़या को लेकर आगे चलते हैं।पिछली बार अभ्‍यास के लिये ही गोविंद गुलशन जी की ग़ज़लों का लिंक देते हुए मैनें अनुरोध किया था कि उन ग़ज़लों को देखें कि किस तरह काफि़या का निर्वाह किया गया है। पता नहीं इसकी ज़रूरत भी किसी ने समझी या नहीं।कुछ प्रश्‍न जो चर्चा में आये उन्‍हें उत्‍तर सहित लेने से पहले कुछ और आधार स्‍पष्‍टता लाने का प्रयास कर लिया जाये जिससे बात समझने में सरलता रहे।काफि़या या तो मूल शब्‍द पर निर्धारित किया जाता है या उसके योजित स्‍वरूप पर। पिछली बार उदाहरण के लिये 'नेक', 'केक' लिये गये…Continue

Tags: पाठ, ज्ञान, ग़ज़ल, कक्षा

Started by Tilak Raj Kapoor. Last reply by क़मर जौनपुरी on Tuesday.

ग़ज़ल-संक्षिप्‍त आधार जानकारी-3 53 Replies

एक बात जो आरंभ में ही स्‍पष्‍ट कर देना जरूरी है कि यह आलेख काफि़या का हिन्‍दी में निर्धारण और पालन करने की चर्चा तक सीमित है। उर्दू, अरबी, फ़ारसी या इंग्लिश और फ्रेंच आदि भाषा में क्‍या होता मैं नहीं जानता।पिछले आलेख पर आधार स्‍तर के प्रश्‍न तो नहीं आये लेकिन ऐसे प्रश्‍न जरूर आ गये जो शायरी का आधार-ज्ञान प्राप्‍त हो जाने और कुछ ग़ज़ल कह लेने के बाद अपेक्षित होते हैं।प्राप्‍त प्रश्‍नों पर तो इस आलेख में विचार करेंगे ही लेकिन प्रश्‍नों के उत्‍तर पर आने से पहले पहले कुछ और आधार स्‍पष्‍टता प्राप्‍त…Continue

Tags: पाठ, ज्ञान, ग़ज़ल, कक्षा

Started by Tilak Raj Kapoor. Last reply by Rajeev Bharol Feb 22, 2012.

ग़ज़ल-संक्षिप्‍त आधार जानकारी-2 12 Replies

ग़ज़ल की आधार परिभाषायें जानने के बाद स्‍वाभाविक उत्‍सुकता रहती है इन परिभाषित तत्‍वों के प्रायोगिक उदाहरण जानने की। ग़ज़ल में बह्र का बहुत अधिक महत्‍व है लेकिन उत्‍सुकता सबसे अधिक काफि़या के प्रयोग को जानने की रहती है। आज प्रयास करते हैं काफि़या को उदाहरण सहित समझने की।सभी उदाहरण मैनें आखर कलश पर प्रकाशित गोविन्‍द गुलशन जी की ग़ज़लों से लिये हैं। एक मत्‍ला देखें:'दिल में ये एक डर है बराबर बना हुआमिट्टी में मिल न जाए कहीं घर बना हुआ'इसमें 'बना हुआ' तो मत्‍ले की दोनों पंक्तियों के अंत में आने…Continue

Tags: पाठ, ज्ञान, ग़ज़ल, कक्षा

Started by Tilak Raj Kapoor. Last reply by विनोद 'निर्भय' yesterday.

ग़ज़ल-संक्षिप्‍त आधार जानकारी-1 55 Replies

यह आलेख उनके लिये विशेष रूप से सहायक होगा जिनका ग़ज़ल से परिचय सिर्फ पढ़ने सुनने तक ही रहा है, इसकी विधा से नहीं। इस आधार आलेख में जो शब्‍द आपको नये लगें उनके लिये आप ई-मेल अथवा टिप्‍पणी के माध्‍यम से पृथक से प्रश्‍न कर सकते हैं लेकिन उचित होगा कि उसके पहले पूरा आलेख पढ़ लें; अधिकाँश उत्‍तर यहीं मिल जायेंगे। एक अच्‍छी परिपूर्ण ग़ज़ल कहने के लिये ग़ज़ल की कुछ आधार बातें समझना जरूरी है। जो संक्षिप्‍त में निम्‍नानुसार हैं:ग़ज़ल- एक पूर्ण ग़ज़ल में मत्‍ला, मक्‍ता और 5 से 11 शेर (बहुवचन अशआर) प्रचलन…Continue

Tags: पाठ, ज्ञान, कक्षा, ग़ज़ल

Started by Tilak Raj Kapoor. Last reply by विनोद 'निर्भय' yesterday.

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Comment by V.M.''vrishty'' on October 15, 2018 at 3:16pm
आदरणीय समर कबीर जी, हार्दिक धन्यवाद! आपकी सहायता और सुझाव पा कर मैं हमेशा आपकी शुक्रगुज़ार हूँ।
Comment by Samar kabeer on October 15, 2018 at 2:37pm

'न जाने क्या हुआ मुझको मिला हमराज ना कोई
न जाने क्यों हरएक से मेरी तबीयत नही मिलती'

इस शैर को यों किया जा सकता है:-

'ये दुनिया है, यहाँ हर आदमी की अपनी फ़ितरत है

किसी की भी किसी से दोस्तो आदत नहीं मिलती'

Comment by V.M.''vrishty'' on October 15, 2018 at 1:13pm
आदरणीय योगराज प्रभाकर सर, प्रणाम! जी मैं इस बाध्यता से पूर्णतः अन्जान थी। आगे से ख्याल रखूँगी। धन्यवाद !

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 15, 2018 at 1:03pm

आ० वृष्टि जी, आपकी रचनाएँ एप्रूव होने का कारण यह है कि आप एक ही दिन में कई-कई रचनाएँ पोस्ट कर देती हैं। कृपया एक दिन में एक ही रचना पोस्ट किया करें वह भी कुछ दिन के अंतराल के पश्चात, हर रोज़ नहीं।      

Comment by V.M.''vrishty'' on October 15, 2018 at 12:32pm
आदरणीय समर कबीर जी,, मैंने पहले ब्लॉग पोस्ट की ही कोशिश की, पर admin ने अप्रूव नही किया। अतः आपकी राय जानने के लिए मुझे यहाँ बात करनी पड़ी। आपके सानिध्य में मुझे बहुत कुछ सीखने को मिल रहा और उम्मीद करती हूँ ये स्नेह बना रहे। बहुत बहुत शुक्रिया!!

तबियत वाले मिसरे को गर यूँ कहें--
((खुदा जाने हरएक से क्यो मेरी आदत नही मिलती))
तो क्या ये ठीक है??
Comment by Samar kabeer on October 15, 2018 at 12:23pm

मुहतरना "वृष्टि" जी आदाब,ये ग़ज़ल आपको ब्लॉग पर पोस्ट करना चाहिए थी, ख़ैर ।

मतले में शुतरगुर्बा दोष है,इसे यों कर लें :-

'शिकायत क्या करूँ कि आपको मुहलत नहीं मिलती

मुझे अपने लिये ही आजकल फ़ुर्सत नहीं मिलती'

दूसरे शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,यों कर लें:-

'यहाँ गर नाम पाना है तो भाई कुछ मशक़्क़त कर

किसी को घर में बैठे बैठे तो शुहरत नहीं मिलती'

4थे शैर के ऊला में ' ग़में-गुरबत' को "ग़म-ए-ग़ुरबत" कर लें ।

5वें शैर में "तबीअत" क़ाफ़िया काम नहीं करेगा ।

आख़री शैर के ऊला में 'यारों' को "यारो"लिखें,सानी मिसरा बह्र में नहीं,यों कर लें:-

'कभी दुनिया में हर इंसान को चाहत नहीं मिलती'

Comment by V.M.''vrishty'' on October 15, 2018 at 11:33am
आदरणीय समर कबीर जी, प्रणाम! शुभ प्रभात!

इस रचना पर आपकी टिप्पड़ी चाहती हूं--

शिकायत क्या करें कि आपको मोहलत नहीं मिलती
मुझे मेरे लिए ही आजकल फुरसत नहीं मिलती

न यूँ बर्बाद अपना वक़्त कर तू मुफ्त में ऐसे
किसी को घर मे यूँ ही बैठ कर शोहरत नहीं मिलती

अगर ख्वाहिश हो दिल मे प्यार की तो प्यार से रहना
किसी की छीन कर इज़्ज़त कभी इज़्ज़त नही मिलती

खुदा ने लिख दिया है जिनकी किस्मत में ग़में-गुरबत
करें वो लाख कोशिश पर उन्हें दौलत नहीं मिलती

न जाने क्या हुआ मुझको मिला हमराज ना कोई
न जाने क्यों हरएक से मेरी तबीयत नही मिलती

लगी ठोकर हमें जिस रोज़, यारों हमने भी माना
सही कहते हैं हर इंसां को मोहब्बत नहीं मिलती
मौलिक व अप्रकाशित
Comment by Samar kabeer on October 13, 2018 at 2:06pm

प्रयासरत रहें,शुभेच्छाएँ ।

Comment by V.M.''vrishty'' on October 13, 2018 at 12:29pm
आदरणीय समर कबीर जी, सादर अभिनंदन! मैं अल्फ़ाज़ों में बयाँ नहीं कर सकती कि आपके इस टिप्पड़ी से मुझे कितना सुकून महसूस हो रहा है। मुझे ये लगने लगा था कि ग़ज़ल मेरे बस की बात नही,और मेरा प्रयास निरर्थक है।
आपने मेरे मृतप्राय उत्साह में जान डाल दी है।
बहुत बहुत धन्यवाद!
Comment by Samar kabeer on October 13, 2018 at 11:56am

मुहतरमा "वृष्टि" जी,आपकी ग़ज़ल अच्छी है,बधाई आपको ।

धूल दिए हैं धूल बारिश ने मकानों के मगर

सिर्फ़ ये मिसरा बह्र में नहीं है,इसे यूँ किया जा सकता है :-

'धो दिया है तेज़ बारिश ने मकानों को मगर'

 
 
 

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