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सतविन्द्र कुमार राणा
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  • karnal,haryana
  • India
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सतविन्द्र कुमार राणा replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"आदरणीय रवि प्रभाकर जी, लघुकथा ने एक सृजक, चिंतक , आलोचक ही नहीं खोया, आपके रूप में मैनें  एक स्नेहसिन्धु, पथप्रदर्शक भी खो दिया है। आपके बारे में सुनें समाचार पर यकीन नहीं कर पा रहा हूँ। आजीवन स्मृतियों में जिंदा रहोगे। ॐ शांति!"
May 23
सतविन्द्र कुमार राणा posted a blog post

कालिख सना समय

जब-जब कालिख सने समय के,पन्ने खोले जाएंगेमानवता पर लगे ग्रहण को,सीधा याद दिलाएंगे।आफत को जो अवसर मानें,लाभ कमाने बैठे हैंअन्तस् को बस मार दिया है,हठ में अपनी ऐंठे हैंआज हवा और दवा सब पर,जिनका पूरा कब्जा हैजान छीनने के कामों को,ही करने का जज़्बा है।उनके सारे कर्म आज के,सदा ही मुँह चिढाएंगे।जब-जब कालिख सने समय के,पन्ने खोले जाएंगे।कुर्सी का लालच कुर्सी कामद अब जिन पर छाया हैजिनके दुष्कृत्यों के कारण,हर जन ही भरमाया है।दूर रही जो दूरदर्शिता,लचर व्यवस्था भारी हैजिसकी भूल भुगतती दिखती,अब जनता बेचारी…See More
May 19
सतविन्द्र कुमार राणा commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post बिना बात की बात
"आदरणीय धामी जी सादर नमन सह आभारं"
May 18
सतविन्द्र कुमार राणा replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"विनम्र श्रद्धांजलि!  भारी वक्त है, ईश्वर शीघ्र उबारें!"
May 2
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post बिना बात की बात
"आ. भाई सतविन्द्र जी, सादर अभिवादन। अच्छी समसामयिक रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
Apr 27
सतविन्द्र कुमार राणा posted a blog post

बिना बात की बात

बिना बात की बात बनाते, लोग यहाँ दिख जाते हैं जैसे उल्लू सीधा होता, वैसे ही बिक जाते हैं।धर्म नहीं जानें क्या होता, क्या जानें परिभाषा को रिश्तों को अब मान नहीं है, स्थान नहीं कुछ आशा को। दशरथ घर से बाहर हैं अब, पूत वहाँ का राजा है, देकर वचन भूल जाना बस, यही समय से साधा है सरयू को अपमानित करते, गंगा दूषित होती है देख नज़ारा प्रतिदिन का यह, भारत भू अब रोती है। राम नहीं है घट में लेकिन, झंडों पर टिक जाते हैं। बिना बात की बात बनाते, लोग यहाँ दिख जाते हैं।गुह-सा मित्र नहीं है कोई, जो कुछ साथ…See More
Apr 21
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post तेरे गम के निशानों को यहाँ पर कौन समझे
"आ. भाई सतविंद्र जी , सादर अभिवादन । उत्तम गजल हुई है हार्दिक बधाई ।"
Apr 10
सतविन्द्र कुमार राणा commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post तेरे गम के निशानों को यहाँ पर कौन समझे
"जी, आदरणीय बृजेश भाई ऐसे किया जा सकताहै।सादर आभार"
Apr 10
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post तेरे गम के निशानों को यहाँ पर कौन समझे
"तब ठीक है लेकिन सौदा की जगह साधन भी किया जा सकता है...सादर "बनी व्यापार का साधन""
Apr 9
सतविन्द्र कुमार राणा posted a blog post

मिर्च कोई आग पर बोता है क्या- ग़ज़ल

2122 2122 212मिर्च कोई आग पर बोता है क्या,लोन-पानी ज़ख्म को धोता है क्या।हो रहा जो अब भले होता है क्या,कोई अपने आप को खोता है क्या।बेबसी को तू हटा औज़ार बन,इसका दामन थाम कर रोता है क्या।इश्क़ करता, सब्ज़ धरती देख ले,बीज इसका तू कभी बोता है क्या।'बाल' चुप्पी साध लेना जुर्म पर,जुर्म से खुद कम कभी होता है क्या।लोन-नमकमौलिक अप्रकाशितSee More
Apr 6
सतविन्द्र कुमार राणा commented on Samar kabeer's blog post "ओ बी ओ" की ग्यारहवीं सालगिरह का तुहफ़ा
"आदरणीय समर सर, बहुत बढ़िया! हार्दिक शुभकामनाएं!"
Apr 5
सतविन्द्र कुमार राणा commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post हौसले से तीरगी मिट जाएगी
"आदरणीय समर साहब सादर नमन, उत्साहवर्धन के लिए सादर आभार। बाल तख़ल्लुस की जगह ही प्रयोग करता हूँ सर, सादर"
Apr 5
सतविन्द्र कुमार राणा commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post तेरे गम के निशानों को यहाँ पर कौन समझे
"आदरणीय समर कबीर जी सादर नमन, मार्गदर्शन के लिए बहुत-बहुत आभार। यहाँ पर को रहने देते हैं, ताकि कोई और पाठक इसे पढ़े तो आपका मशवरा भी।ध्यान आये। मैं इसे ठीक कर लेता हूँ। आगे भी इस बात का ध्यान रखा जाएगा।"
Apr 5
सतविन्द्र कुमार राणा commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post तेरे गम के निशानों को यहाँ पर कौन समझे
"आदरणीय बृजेश भाई जी, सादर आभार। बनी व्यापार का सौदा,  नफ़रत के बारे में ही कहा है कि यह कुछ लोगों के लिए व्यापार बन गयी है। सौदा पंजाबी में वस्तु को भी कह लेते हैं, खरीद-बेच की क्रिया को भी कहते हैं। इसलिए व्यापार और सौदा समानार्थी भी मालूम…"
Apr 5
Samar kabeer commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post हौसले से तीरगी मिट जाएगी
"जनाब सतविन्द्र कुमार राणा जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें । 'बाल' क्या आपका तख़ल्लुस है?"
Apr 3
Samar kabeer commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post तेरे गम के निशानों को यहाँ पर कौन समझे
"जनाब सतविन्द्र कुमार राणा जी आदाब, 'यहाँ' शब्द के साथ 'पर' का प्रयोग उचित नहीं होता,इस हिसाब से अपनी रदीफ़ पर ग़ौर करें ।"
Apr 3

Profile Information

Gender
Male
City State
करनाल हरियाणा
Native Place
गाँव व डाक बालराजपूतान
Profession
अध्यापक
About me
I am a simple person living simply.I have interests in reading,movies and enjoy these timely.try to write somthings when there is time to do so.Believe in nationalism as an ideology.

सतविन्द्र कुमार राणा's Blog

कालिख सना समय

जब-जब कालिख सने समय के,

पन्ने खोले जाएंगे

मानवता पर लगे ग्रहण को,

सीधा याद दिलाएंगे।

आफत को जो अवसर मानें,

लाभ कमाने बैठे हैं

अन्तस् को बस मार दिया है,

हठ में अपनी ऐंठे हैं

आज हवा और दवा सब पर,

जिनका पूरा कब्जा है

जान छीनने के कामों को,

ही करने का जज़्बा है।

उनके सारे कर्म आज के,

सदा ही मुँह चिढाएंगे।

जब-जब कालिख सने समय के,

पन्ने खोले जाएंगे।

कुर्सी का लालच कुर्सी का

मद अब जिन पर छाया है

जिनके…

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Posted on May 18, 2021 at 5:00pm

बिना बात की बात

बिना बात की बात बनाते,

लोग यहाँ दिख जाते हैं

जैसे उल्लू सीधा होता,

वैसे ही बिक जाते हैं।

धर्म नहीं जानें क्या होता,

क्या जानें परिभाषा को

रिश्तों को अब मान नहीं है,

स्थान नहीं कुछ आशा को।

दशरथ घर से बाहर हैं अब,

पूत वहाँ का राजा है,

देकर वचन भूल जाना बस,

यही समय से साधा है

सरयू को अपमानित करते,

गंगा दूषित होती है

देख नज़ारा प्रतिदिन का यह,

भारत भू अब रोती है।

राम नहीं है घट में लेकिन,

झंडों पर…

Continue

Posted on April 21, 2021 at 2:46pm — 2 Comments

मिर्च कोई आग पर बोता है क्या- ग़ज़ल

2122 2122 212

मिर्च कोई आग पर बोता है क्या,
लोन-पानी ज़ख्म को धोता है क्या।

हो रहा जो अब भले होता है क्या,
कोई अपने आप को खोता है क्या।

बेबसी को तू हटा औज़ार बन,
इसका दामन थाम कर रोता है क्या।

इश्क़ करता, सब्ज़ धरती देख ले,
बीज इसका तू कभी बोता है क्या।

'बाल' चुप्पी साध लेना जुर्म पर,
जुर्म से खुद कम कभी होता है क्या।

लोन-नमक

मौलिक अप्रकाशित

Posted on April 6, 2021 at 8:06pm

हौसले से तीरगी मिट जाएगी

2122 2122 212

कौन कहता है खुशी मिट जाएगी?
हौसले से तीरगी मिट जाएगी।

है भरम बस धूल आँधी के समय,
शांत होते ही कमी मिट जाएगी।

चोर चोरी भी तो मिहनत से करे,
कर ले मिहनत, गंदगी मिट जाएगी।

एक होता दूसरे खातिर फिदा,
फिर कहा क्यों जिंदगी मिट जाएगी?

'बाल' कर अल्फ़ाज़ से तू दोस्ती,
तेरी तन्हा बेबसी मिट जाएगी।


मौलिक अप्रकाशित

Posted on March 29, 2021 at 7:34am — 2 Comments

Comment Wall (8 comments)

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At 6:46am on July 2, 2018, राज़ नवादवी said…

"आदरणीय सतविन्द्र कुमार राणा  साहब, तरही मुशायरे में मेरी ग़ज़ल में शिरकत का दिल से शुक्रिया. समयाभाव था, कमेंट बॉक्स बंद हो चुका है. इसलिए यहाँ से आभार प्रकट कर रहूँ हूँ.सादर "

At 7:34am on June 20, 2016, सुरेश कुमार 'कल्याण' said…
आदरणीय सतविंदर भाई ये मार्गदर्शन आपके द्वारा ही दिया गया है। हार्दिक आभार ।
At 7:41am on January 27, 2016, Omprakash Kshatriya said…
बहुतबहुत शुक्रिया आप का आदरणीय सतविंदर कुमार जी . आप ने मेरा जन्म दिन याद रख कर मुझे अमूल्य/अतुल्य शुभकामनाएं दी. इस हेतु मैं आप का आजीवन ऋणी रहूंगा .
At 8:46pm on January 11, 2016, सतविन्द्र कुमार राणा said…
धन्यवाद आदरणीय sushil Sarna जी।आपको भी सपरिवार सादर शुभकामनाएं!
At 6:59pm on January 3, 2016, Sushil Sarna said…

नूतन वर्ष 2016 आपको सपरिवार मंगलमय हो। मैं प्रभु से आपकी हर मनोकामना पूर्ण करने की कामना करता हूँ।

सुशील सरना

At 7:16pm on December 18, 2015, सतविन्द्र कुमार राणा said…
बहुत बहुत आभार आदरणीयEr Ganesh Jee Bagi सर।
At 7:54pm on December 17, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

सतविंदर कुमार जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 11:59am on October 2, 2015,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

भाई सतविंदरजी, 

आपका हार्दिक धन्यवाद कि आपको मेरी विवेचना तोषकारी लगी है.

आप किसी आयोजन या इवेण्ट पर अपनी भावनाएँ उसी थ्रेड में पोस्ट किया करें. यदि आपने अपना धन्यवाद ज्ञापन संकलित लघुकथाओं के पोस्ट में ही किया होता या अब भी कर दें तो यह अधिक उचित होगा.

पुनः धन्यवाद, भाईजी

 
 
 

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