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अजेय
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अजेय's Discussions

कैलेंडर

नौ तारीख तक कैलेंडर न आने से असुविधा होती है। यदि पहले से निर्धारित हो और 1-2 तारीख तक कैलेंडर आ जाए तो आसानी हो जाये।उम्मीद है आयोजक इस और ध्यान देंगेContinue

Started Apr 9, 2018

 

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Latest Activity

अजेय commented on अजेय's blog post ग़ज़ल (आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की)
"शुक्रिया जनाब अमीरुद्दीन अमीर जी।"
Thursday
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on अजेय's blog post ग़ज़ल (आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की)
"जनाब अजेय जी आदाब, शानदार ग़ज़ल हुई है शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।"
Wednesday
अजेय commented on अजेय's blog post ग़ज़ल (आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की)
"बहुत बहुत आभार नीलेश जी, समर साहब, रचना जी। आप सब के प्रोत्साहन के शब्द बहुत हिम्मत बढ़ाते हैं। अरकान: 2122 2122 2122"
Wednesday
Nilesh Shevgaonkar commented on अजेय's blog post ग़ज़ल (आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की)
"आ. अजेय जी,अच्छी ग़ज़ल हुई है ..बधाई "
Wednesday
Rachna Bhatia commented on अजेय's blog post ग़ज़ल (आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की)
"आदरणीय अजेय जी बेहतरीन ग़ज़ल, वाह, वाह,वाह। अरकान लिख देते तो समझना और आसान हो जाता।सादर।"
Wednesday
Samar kabeer commented on अजेय's blog post ग़ज़ल (आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की)
"जनाब अजेय जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही आपने, बधाई स्वीकार करें ।"
Wednesday
अजेय posted a blog post

ग़ज़ल (आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की)

कौशिशें इतनी सी हैं बस शायरी की आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी कीहद जुनूँ की तोड़ कर की है इबादतख़ूँँ जलाकर अपना तेरी आरती कीगोलियों की ही धमक है हर दिशा में और तू कहता है ग़ज़लें आशिक़ी की!भूले-बिसरे लफ़्ज़ कुछ आये हवा में कोई बातें कर रहा है सादगी कीइतनी लंबी हो गयी है ये अमावस चाँद भी अब शक्ल भूला चांदनी कीबूँद मय की तुम पिलाओ वक़्ते-रुखसत आखि़री ख्वा़हिश यही है ज़िन्दगी की#मौलिक व अप्रकाशितSee More
Oct 7
अजेय commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- ख़ूब इतराते हैं हम अपना ख़ज़ाना देख कर
"वाह नीलेश भाई वाह हर शेर के बाद यक ब यक वाह वाह निकल उठा. बहुत उम्दा. दूसरा शेर और तीसरा शेर तो बाकमाल, बेमिसाल. बहुत खूब"
Oct 6
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"शुक्रिया लक्ष्मण भाई। "
Sep 26
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"अच्छी तरही ग़ज़ल के लिए बहुत दाद मैथानी जी"
Sep 26
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"अच्छी ग़ज़ल हुई जनाब नाकाम जी। बहुत बहुत दाद"
Sep 26
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"ग़ज़ल पर अच्छी उपस्थिति दर्ज हुई नादिर भाई। बहुत ख़ूब"
Sep 26
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"बहुत अलग अंदाज़ के अशआर मनीष जी। बहुत अच्छे लगे।"
Sep 26
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आपके आने , हौसला देने और मेरी तबीयत का ख़्याल रखने के लिए आभार समर साहब। लिखे हुए शेर ऑफिस में रखे थे और ये फौरी तौर पर लिखे हैं। हाल अब बेहतर है। संभावित कोरोना संक्रमण था जो अब निकलने की कगार पर ही है। आप सब की शुभकामनाएं और दुआएँ ज़रूर असर…"
Sep 26
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"थे पुलाव, शाही पनीर था, चपातियाँ रूमाली थीं मगर हुकूमत की दावत में चीजें सभी ख़याली थीं चाहा हाथ हाथ में ले लें किसी हसीना का लेकिन ख़ाली हाथ ही रहने थे, जब जेबें अपनी ख़ाली थीं बह्र-क़ाफ़िया, रब्त-मआनी सारे उससे रूठ गए औरों की ग़ज़लों में जिसने कमियाँ…"
Sep 26
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ भाई अमित जी। शुभकामनाएं"
Sep 25

Profile Information

Gender
Male
City State
Karnal (Haryana)
Native Place
Karnal
Profession
Business
About me
ग़ज़ल, कविता, लघुकथा लेखन में रूचि, तीन स्वतंत्र काव्य संग्रह प्रकाशित, 3 ऑनलाइन पुस्तकें प्रकाशित. एक काव्य संग्रह हरियाणा साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित. parivartaaajkal.com पर 'अजय की कलम' के शीर्षक से नियमित कॉलम

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ग़ज़ल (आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की)

कौशिशें इतनी सी हैं बस शायरी की 

आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की

हद जुनूँ की तोड़ कर की है इबादत

ख़ूँँ जलाकर अपना तेरी आरती की

गोलियों की ही धमक है हर दिशा में

और तू कहता है ग़ज़लें आशिक़ी की!

भूले-बिसरे लफ़्ज़ कुछ आये हवा में

कोई बातें कर रहा है सादगी की

इतनी लंबी हो गयी है ये अमावस

चाँद भी अब शक्ल भूला चांदनी की

बूँद मय की तुम पिलाओ वक़्ते-रुखसत

आखि़री ख्वा़हिश यही है ज़िन्दगी…

Continue

Posted on October 7, 2020 at 5:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल (और कितनी देर तक सोयेंगें हम)

पल सुनहरी सुबह के खोयेंगें हम

और कितनी देर तक सोयेंगें हम।

रात काली तो कभी की जा चुकी

अब अँधेरा कब तलक ढोयेंगे हम।

जुगनुओं जैसा चमकना सीख लें 

रोशनी के बीज फिर बोयेंगे…

Continue

Posted on September 19, 2020 at 11:20pm — 16 Comments

एक ग़ज़ल (वैलेंटाइन डे स्पेशल)

एक ग़ज़ल।

**********

बँध गई हैं एक दिन से प्रेम की अनुभूतियाँ

बिक रही रैपर लपेटे प्रेम की अनुभूतियाँ

शाश्वत से हो गई नश्वर विदेशी चाल में

भूल बैठी स्वयं को ऐसे प्रेम की अनुभूतियाँ

प्रेम पथ पर अब विकल्पों के बिना जीवन नहीं

आज मुझ से, कल किसी से, प्रेम की अनुभूतियाँ

पाप से और पुण्य से हो कर पृथक ये सोचिए

लज्जा में लिपटी हैं क्यों ये प्रेम की अनुभूतियाँ

परवरिश बंधन में हो तो दोष किसको दीजिये

कैसे पहचानेंगे…

Continue

Posted on February 14, 2019 at 1:54pm — 4 Comments

एक ग़ज़ल (हिलता है तो लगता ज़िंदा है साया)

हिलता है तो लगता ज़िंदा है साया

लेकिन चुप है, शायद गूँगा है साया

कहने में तो है अच्छा हमराही पर

सिर्फ़ उजालों में सँग होता है साया

सूरज सर पर हो तो बिछता पाँवों में

आड़ में मेरी धूप से बचता है साया

असमंजस में हूँ मैं तुमसे ये सुनकर

अँधियारे में तुमने देखा…

Continue

Posted on February 7, 2019 at 12:38pm — 3 Comments

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At 7:49pm on September 27, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय अजय गुप्ता जी आदाब बहुत बहुत शुक्रिया हौसला बढ़ाने का ग़ज़ल पसंद आयी तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आपका
At 7:46pm on August 31, 2019, dandpani nahak said…
बहुत बहुत धन्यवाद् भाई साहब अजय गुप्ता जी समय निकाल कर आपने जो मेरा हौसला बढ़ाया है बहुत शुक्रगुज़ार हूँ
At 12:56pm on May 26, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय अजय गुप्ता जी आदाब आपने मेरी ग़ज़ल पढ़ी उसे सराहा उसके लिए बहुत शुक्रिया
At 12:18pm on November 23, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

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