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AMAN SINHA
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AMAN SINHA posted a blog post

तुम वीरांगना हो जीवन की

तुम वीरांगना हो जीवन की, तुम अपने पथ पर डटी रहोचाहे उलाहना पाओ जितनी, तुम अपने जिद पर अड़ी रहोगर्भ में ही मारेंगे तुमको, वो सांस नहीं लेने देंगे कली मसल कर रख देंगे वो फूल नही बनने देंगे तुम मगर गर्भ से निकल कर अपनी खुशबू बिखरा दो तुम वीरांगना हो जीवन की, तुम अपने पथ पर डटी रहोचाहे पथ पर पत्थर फेंके, शिक्षा से रोके तुमको  कुछ पुराने मनोवृत्ति वाले चूल्हे में झोंके तुमको  तुम ना डिगना अपने प्रण से, एकाग्रचित्त हो जमी रहो  तुम वीरांगना हो जीवन की, तुम अपने पथ पर डटी रहोचाहे तेरे पहनावे पर कोई…See More
Saturday
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तलाक़

दर्द है ये दो दिलों का, एक का होता नहींजागते है संग दोनों, कोई भी सोता नहींये ख़ुशी है या के ग़म है, कोई कह सकता नहींदर्द का वैसे भी यारो, रंग होता हीं नहींयाद आती है घडी वो, जब पहली बार हम मिले थेबसंत के वो दिन नहीं थे, पर फूल दिल में खिले थेक्या हुआ जो सारी यादें, धूल बन के उड़ गयीदोनों ने मांगी थी खुशियां, क्यों शूल बनके चुभ गयींआपसी सम्मान को क्यों, दोनों ने भुला दिया?घोंसला सपनो का हमने, खुद हीं क्यों जला दिया?मैं गलत या तू सही है, फर्क अब पड़ता है क्या?फैसला अब पूछता है, अमल से डरता है…See More
May 15
AMAN SINHA posted a blog post

अज्ञात

ख़यालों में मेरे ख़याल एक आता हैभरम मेरा मुझको यूं भरमा के जाता हैदिखता नहीं है पर कोई बातें करता हैनहीं साथ मेरे पर महसूस होता हैमैं अंजान उससे पर वो जानता हैवो है बस यहीं पर ये दिल मानता हैदिखा जो कहीं पर तो पहचान लूंगीयही मर्ज़ मेरा है मैं जान लूंगीवो है झोंका हवा का है अंदाज़ मेरानहीं जानती मैं क्या है अंजाम मेरामिला जो कहीं तो उसे जाने ना दुंगीमैं बाहों से अपने उसे बांध लूंगीजहाँ चाहता है वहाँ घूमता हैगगन हो ज़मीं हो वो सब चूमता हैभेद सकता है वो दीवारों को मन केविचारों को मेरे वो भांपता हैनहीं…See More
May 12
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पश्चाताप

तोड़े थे यकीन मैंने मुहल्ले की हर गली मेंचैन हम कैसे पाते इतनी आहें लेकरमौत हो जाए मेहरबा हमपे नामुमकिन हैठोकरे हीं हमको मिलेंगी उसके दरवाज़े परहर परत रंग मेरा यूँ ही उतरता गयाज़मी थी सख्त मैं मगर बस धंसता हीं गयागुनाह जो मैंने किये थे बे-खयाली मेंयाद करके उन सबको मैं बस गिनता गया किसी का हाथ छोड़ा किसी का साथ छोड़ दियामैंने हर बदनामी को उनकी तरफ मोड़ दियासामने जब भी वो आए अपना बनाने के लिएअपने बेअदबी से मैंने उनका भरम तोड़ दिया वो न मिले महफ़िल में मुझसे तो अच्छा हैगलत थे हम ही दिल उनका आज भी सच्चा…See More
May 10
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May 3
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कुछ याद सम्हाले रखा है

कुछ याद सम्हाले रखा है,हमने दर्द को पाले रक्खा हैहँसते चेहरे के आड़ में हमने,दिल के छालों को रक्खा है सब कहते है हम हँसते हैं,हम अपने अंदर ही बसते हैं  अब सबको हम बतलाएं क्या,हम तनहाई से कैसे बचते है अब रोना धोना छोड़ दिया,बस कहना सुनना छोड़ दियाना बात कोई अब चुभती है,हमने तह तक जाना छोड़ दिया लहज़ा जो हमने बदल लिया,खुद हीं खुद का कत्ल कियाजो बातों से बह जाया करता था,उन जज़्बातों को दफन किया अब दर्द से अपनी यारी है,हर ज़ख्म में हिस्सेदारी हैउठना गिरना, गिरकर उठना,बेमतलब की दुनियादारी है अब पाना क्या…See More
Apr 28
Sushil Sarna commented on AMAN SINHA's blog post पहचाना सा एक चेहरा
"वाह मार्मिक अभिव्यक्ति आदरणीय जी ।"
Apr 28
AMAN SINHA posted a blog post

पहचाना सा एक चेहरा

वर्षों हुएएक बार देखे उसकोतब वो पूरे श्रृंगार में होती थीबात बहुतकरती थी अपनी गहरी आँखों सेशब्द कहने से उसे उलझने तमाम होती थीइमली चटनीआम की क्यारीचटपट खाना बहुत पसंद थासैर सपाटेचकमक कपडे रंगों का खेलगाना बजाना हरदम थाखेलना, कूदनापढ़ना, लिखना, सपने सजानासब उसके फेहरिस्त का हिस्सा थेसावन, झूलेनहरों में नहाना, पसंद का खानाकई तरह के किस्से थेआज दिखी थीनुक्कड़ के बाजार में अकेलीसादा सा लिबास ओढे हुएचाल धीमी थीकंधे पर कटे बाल झूलतेचेहरा बिल्कुल ही उदास थाकाले पड़े थेहोंठ उनमें लाली न थीकई दिनों से जैसे…See More
Apr 27
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on AMAN SINHA's blog post मैं थक गया हूँ
"अच्छे भाव हैं भाई लेकिन ऊपर से दूसरी पंक्ति में पत्थर और शैल में अंतर होता है क्या?"
Apr 22
AMAN SINHA posted a blog post

मैं थक गया हूँ

थक गया हूँ झूठ खुद से और ना कह पाऊंगापत्थरों सा हो गया हूँ शैल ना बन पाऊंगा देखते है सब यहाँ मुझे अजनबी अंदाज़ सेपास से गुजरते है तो लगते है नाराज़ से बेसबर सा हो रहा हूँ जिस्म के लिबास मेंबंद बैठा हूँ मैं कब से अक्स के लिहाफ में काटता है खालीपन अब मन कही लगता नहींवक़्त इतना है पड़ा के वक़्त ही मिलता नहीं रात भर मैं सोचता हूँ कल मुझे करना है क्याहै नहीं कुछ हाथ मेरे सोच कर डरना है क्या टोक ना दे कोई मुझको मेरी इस बेकारी मेंकुछ नहीं है दोष मेरा मेरी इस लाचारी में चाह “आम” बनने की है “खास” बनना है…See More
Apr 22
AMAN SINHA commented on AMAN SINHA's blog post अधूरा ख़्वाब
"आदरणीय Sushil Sarna साहब,  हौसला बढाने हेतु आभार ग्रहण करें । "
Apr 16
Sushil Sarna commented on AMAN SINHA's blog post अधूरा ख़्वाब
"वाह आदरणीय बहुत ही सुंदर और सार्थक तथा भावपूर्ण प्रस्तुति ।हार्दिक बधाई सर"
Apr 12
AMAN SINHA posted a blog post

अधूरा ख़्वाब

ख़्वाब देखे जो भी मैंने सब अधूरे रह गएमिटटी के बर्तन थे कच्चे, पानी के संग बह गएरेत की दीवार थी और दलदली सी छतरहीमौज़ों के टकराव से वो अंत तक लड़ती रहीसाल सोलह कर लिए जो पूरे अपने उम्र केकैद में घिरने लगी मैं बिन किये एक जुर्म केस्कूल का बस्ता भी मेरा कोने में था पड गयासांस लेती किताबों पर भी धूल सा एक जम गया शौक दिल में आ बसा था “लॉ” की पढ़ाई काचल पड़ी थी थाम के मैं अस्त्र उस लड़ाई कादो दिनों भी चल सका ना क्रोध मेरे भाई काबस मेरा एक ही साथी था जो इस लडाई का चूल्हा और चौकी में मेरा वक़्त यूं कटता…See More
Apr 11
AMAN SINHA commented on AMAN SINHA's blog post बेग़ैरत
"आदरणीय Dr.Prachi Singh जी,  तारिफ़ करने के लिये अथाह धन्यवाद। मुझे ना तो ग़ज़ल की समझ है और नाहीं शेर, दोहा या अन्य किसी भी प्रकार के लेखन कला की।  सत्य तो यह है की जब कलम हाथ में होती है उस क्षण जो भी शब्द मन में उभरते है बस उसीसे…"
Apr 7

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Dr.Prachi Singh commented on AMAN SINHA's blog post बेग़ैरत
"पारस्परिक प्रेम में स्वयं की विवेचना अपनी अन्तर्दशा के अस्वीकार्य व्यव्हार के प्रति इस प्रकार की स्वीकारोक्ति कम ही मिलती है विषय वस्तु  की सत्यता नें प्रभावित किया ... इस अभिव्यक्ति को ग़ज़ल में कहने का प्रयास कीजिये बहुत सुन्दर बन…"
Apr 6
AMAN SINHA posted a blog post

अंतिम सफ़र

मैं जहाँ पर खड़ा हूँवहाँ से हर मोड़ दिखता हैइस जहाँ से उस जहाँ काहरेक छोर दिखता है ये वो किनारा है जहांसब खत्म हुआ समझोसभी भावनाओं का जैसेअब अंत हुआ समझोदर्द मुझे है बहुत मगरअब उसका कोई इलाज नहींमैं ना लगूँ खुश मगर,मैं किसी से नाराज़ नहींमैंने देखा है खुदको उसकीआँखों मे कई दफा बुझते हुएउसने ये सब सहा है,हर बार मगर हँसते हुएआज नहीं तो कलखत्म होनी ये कहानी है  है सभी को अब बतानाजो मेरी अनसुनी कहानी हैये है वो रास्ता के इसपरजब भी जो भी चला हैअंतिम सफर के मंज़िल सेअंत मे वो जा मिला है"मौलिक व…See More
Apr 6

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तुम वीरांगना हो जीवन की

तुम वीरांगना हो जीवन की, तुम अपने पथ पर डटी रहो

चाहे उलाहना पाओ जितनी, तुम अपने जिद पर अड़ी रहो



गर्भ में ही मारेंगे तुमको, वो सांस नहीं लेने देंगे 

कली मसल कर रख देंगे वो फूल नही बनने देंगे 

तुम मगर गर्भ से निकल कर अपनी खुशबू बिखरा दो 

तुम वीरांगना हो जीवन की, तुम अपने पथ पर डटी रहो



चाहे पथ पर पत्थर फेंके, शिक्षा से रोके तुमको 

कुछ पुराने मनोवृत्ति वाले चूल्हे में झोंके तुमको 

तुम ना डिगना अपने प्रण से, एकाग्रचित्त हो जमी…

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Posted on May 21, 2022 at 11:59am

तलाक़

दर्द है ये दो दिलों का, एक का होता नहीं

जागते है संग दोनों, कोई भी सोता नहीं

ये ख़ुशी है या के ग़म है, कोई कह सकता नहीं

दर्द का वैसे भी यारो, रंग होता हीं नहीं

याद आती है घडी वो, जब पहली बार हम मिले थे

बसंत के वो दिन नहीं थे, पर फूल दिल में खिले थे

क्या हुआ जो…

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Posted on May 13, 2022 at 1:00pm

अज्ञात

ख़यालों में मेरे ख़याल एक आता है

भरम मेरा मुझको यूं भरमा के जाता है

दिखता नहीं है पर कोई बातें करता है

नहीं साथ मेरे पर महसूस होता है

मैं अंजान उससे पर वो जानता है

वो है बस यहीं पर ये दिल मानता है

दिखा जो कहीं पर तो पहचान लूंगी

यही मर्ज़ मेरा है मैं जान लूंगी

वो है झोंका हवा का है अंदाज़…

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Posted on May 12, 2022 at 1:31pm

पश्चाताप

तोड़े थे यकीन मैंने मुहल्ले की हर गली में

चैन हम कैसे पाते इतनी आहें लेकर

मौत हो जाए मेहरबा हमपे नामुमकिन है

ठोकरे हीं हमको मिलेंगी उसके दरवाज़े पर

हर परत रंग मेरा यूँ ही उतरता गया

ज़मी थी सख्त मैं मगर बस धंसता हीं गया

गुनाह जो मैंने किये थे बे-खयाली में

याद करके उन सबको मैं बस गिनता…

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Posted on May 6, 2022 at 12:54pm

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