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Chetan Prakash
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Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
" नमन, सु श्री प्रतिभा पाण्डे जी, सुन्दर रोला छंद रचे आपने, बधाई ! किन्तु , बिचारा शब्द , कदाचित् व्याकरण सम्मत नहीं है। सादर !"
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"शुभ प्रभात, भाई श्री दया राम मेठानी जी रोला छंद पर अच्छा प्रयास है, आपका । "रानी अपनी गई रूठ, मात-पिता द्वारें" द्वारे, शुद्ध है, अनुस्वार बिन्दु अनावश्यक है, देखियेगा। और अन्त्यानुप्रास का निर्वाह भी इससे नहीं हो पाया । सादर !"
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"नमस्कार, भाई श्री मिथिलेश वामनकर जी, बहुत सुन्दर रोला छंद आधारित गीत की सृजना हुई है। बधाई स्वीकार कीजिये !"
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"रोला छंदः भूल गया माँ बाप, बना वह.... वैरागी है । शहर बसी सन्तान,पुत्र कब अनुरागी है ।। हुई जब माँ अशक्त, पिता ही शैफ बना है । पुत्र ..नहीं अब राम, बहू शहरी... खन्ना है ।। मात-पिता हलकान, निराश्रित ज्यौं माँ जापा। बुरी ..बला.. है भूख, बना खा…"
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-162
"जय- पराजय ः गीतिका छंद जय पराजय कुछ नहीं बस, आँकड़ो का मेल है । आड़ ..लेकर ..दूसरों.. की़, जीतने ..का खेल है ।। तेल ...देखो तेल.. की ..वो, धार ...भी.. देखिये । मज़हबी कुछ लोग भारत, चाल उनकी देखिये।। भारती ही हारती है, क्या गुलज़मी कुछ नहीं । लाल…"
Apr 14
Chetan Prakash commented on Samar kabeer's blog post "ओबीओ की 14वीं सालगिरह का तुहफ़ा"
"आदाब,  समर कबीर साहब ! ओ.बी.ओ की सालगिरह पर , आपकी ग़ज़ल-प्रस्तुति, आदरणीय ,  मंच के प्रति समर्पण की उत्कृष्ट बानगी है ! ईश्वर आपको दीर्घायुे प्रदान करे ! और,   ओ.बी.ओ  आपकी सरपरस्ती में ओ.बी.ओ निरन्तर ऊंचाइयाँ छूता रहे !…"
Apr 10
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-165
"  आ. भाई  , Mahendra Kumar ji, यूँ तो  आपकी सराहनीय प्रस्तुति पर आ.अमित जी  सुझाव और उन पर  आपकी सहमति के पश्चात कुछ भी कहने को बहुत रह नहीं जाता।  किन्तु  काव्य  / ग़ज़ल के किन्हीं बिन्दुओं पर …"
Mar 29
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-165
"आदरणीय, अमित जी, आदाब आपने ग़ज़ल तक आकर जो प्रोत्साहन दिया, इसके लिए आपका आभारी हूँ ।// आज़माता ख़ुद को ही ख़ार से उलझता वो होश को सँभलने में देर कितनी लगती है  // आपने रब्त का अभाव बताया, सो इस शेर के ऊला को बदला गया है, कृपया देखें : जाम-ए-…"
Mar 28
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-165
"212 1222 212 1222 ज़िन्दगी बदलने में देर कितनी लगती है हादसों को टलने में देर कितनी लगती है मौज में वो रहता है, और फिर है दिलदार वो आदमी को ढलने में देर कितनी लगती है आज़माता ख़ुद को ही ख़ार से उलझता वो  होश को सँभलने में देर कितनी…"
Mar 28
Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 154 in the group चित्र से काव्य तक
"कुकुभ छंद पूरब हो उत्तर दक्षिण, क्रिकेट के.. सब दीवाने । जलते रहते अभी धूप में, आठ देश हैं परवाने ।। क्रिकेट भारत बड़ा खेल है, सभी जगह खेला जाता । यथा काश्मीर कन्याकुमारी, सब लोगों को यह भाता ।। सामन्त कभी खेला करते, सम्प्रति रंक रिझाता है ।…"
Mar 23
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-161
"होली के रंग ः दोहे होली उत्सव स्नेह का, मत कीजै हड़दंग। मत कीचड़ बरसाइये, मत करिए बदरंग ।। कीजै कुछ ऐसा सखा, बरसे.. खूब.. बसंत। रंग - बिरंगी हो छटा., फागुन बसे अनंत ।। बासंती हो हर दिशा, खिले धूप हर अंग । भ्रमर कली से गुँथ रहे, मुखर होत अनंग।। ऐसा…"
Mar 17
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-161
"होली गीत ः होली की आई बहार है पसरा जगह जगह बसंत औ धरा फागुनी बयार है फूल खिले हैं बाग-बगीचे जगती कामदेव कहार है होली की आई बहार है.. जनगण का मन हुआ प्रफुल्लित प्रकृति हुआ सब श्रृंगार है कली-कली गदराई देखो फुलवारी हँसे घर द्वार है आई होली की बहार…"
Mar 16
Chetan Prakash commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post है खुश खूब झकझोर डाली हवा- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"छोटी बह्र पर अच्छी ग़ज़ल  ! दूसरे शे'र का सानी यूँ बेहतर होता , ' बजा पात देती है ताली हवा ' , बधाई,' मुसाफिर' साहब  ! "
Mar 12
अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी and Chetan Prakash are now friends
Feb 29
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"आदरणीय, अमित जी आप सही कह रहे हैं। ऐसी अवस्था, सभी, में / पर / पे महर्षि पाणिनी की व्याकरण के अनुसार सही हैं। क्षमा करें, मुझे आदरणीय नीलेश जी की टिप्पणी इस संदर्भ में अनावश्यक जान पड़ी। सादर"
Feb 25
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"आ. Richa Yadav ji, आप  ग़ज़ल तक  पहुँची,  आभार  व्यक्त करता हूँ ! गुणीजन वृन्द के सुझावों का मैं पहले ही  संज्ञान ले चुका हूँ ! सादर "
Feb 24

Profile Information

Gender
Male
City State
Baraut
Native Place
Hapur
Profession
Teaching
About me
I'm a poet rather born than made or trained since my childhood

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ग़ज़ल

2122 1122 1122 22 / 112

अंधा आँखों का है हर शख़्स बता देगा तुम्हें

ख़ार खाया है ये जन्मों का दग़ा देगा तुम्हें

गुरु वो घंटाल ज़माने कभी सय्याद रहा

काट कर पर वो रखेगा जो सज़ा देगा तुम्हें

झाँसे में उसके न आया करो जानाँ कभी तुम

रहती दुनिया का दरिन्दा वो क़जा देगा तुम्हें

है नशा उसको सदारत का कई बज़्म सुना

ना तुम्हारा न वो मेरा ही जता देगा तुम्हें

है वो ख़ुदगर्ज़ निहायत कहीं हद से ज़ियादा

ख़ुद…

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Posted on December 20, 2023 at 6:00pm — 2 Comments

एक ताज़ा ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

ख़्वाब से जाग उठे शाह सदा दी जाए

पकड़े जायें अभी क़ातिल वो सज़ा दी जाए

बख़्श दी जाए कहीं जान ख़वातीनों की

अब तो ज़ालिम को कड़ी कोई सज़ा दी जाए

घूमते हैं वो दरिन्दे भी नकाबों में अब तो

जितना जल्दी हो उन्हें मौत बजा दी जाए

लोग अच्छे ही परेशान हैं वहशी दरिन्दों

इन्तिहाँ हो गयी अब लौ वो बुझा दी जाए

ज़ात इन्साँ की पशेमाँ है ज़रायम से 'चेतन'

तूफाँ कोई तो उठा कर…

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Posted on November 27, 2023 at 12:57pm — 2 Comments

एक ताज़ा गज़ल

2121 2122 2121 212

खो गया सुकून दिल का कार हो गया जहाँ

गुम गया सनम भँवर में ख़ार हो गया जहाँ

कामयाबी तौलती दुनिया भरोसे जऱ ज़मी

फार्म जिनके हैं नहीं गुड़मार हो गया जहाँ

ज़िन्दगी जिसे कहा हमने कहीं छुपा गया

है निशान अपने ज़ालिम पार हो गया जहाँ

कार-ए-दुनिया और कुछ हैं और कुछ दिखें ख़ुदा

मारकाट हाल कारोबार हो गया जहाँ

तोड़ हद रहे सभी अब तो अदब जहान में

लाज लुट रही घरों मुरदार हो गया…

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Posted on November 8, 2023 at 8:30pm

एक और ग़जल ः

2121 2122 2122 212



ढूढ़ ले हबीब कोई ज़िन्दगी तो हो सके

साथ हो नसीब कोई ज़िन्दगी तो हो सके



छोड़ देता रोना-धोना मस्त जीता ज़िन्दगी

दोस्त हो करीब कोई ज़िन्दगी तो हो सके



मरता जीता मुश्किलों तू आदमी है बदगुमाँ

साध ले सलीब कोई ज़िन्दगी तो हो सके



ज़ीस्त बोझ बन गई हर शख़्स वो है झींकता

जाम हो अजीब कोई जिन्दगी तो हो सके



खो चुका ख़ुलूस आदम हो गया बे होश है

दोस्त हो ग़रीब कोई ज़िन्दगी तो हो सके



उम्र सारी वो गँवा दी… Continue

Posted on September 24, 2023 at 9:46am — 1 Comment

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At 6:35am on July 22, 2021, रणवीर सिंह 'अनुपम' said…
आदरणीय, चेतन जी, "दोहे : कैसे- कैसे  लोग" शीर्षक के तहत लिखे गए दोहे बहुत सुंदर हैं और बहुत अच्छे लगे।

निम्न चरण विधान में न होने से इनमें लय भंग है। जिसे दूर करने की जरूरत है।

जन्म-भूमि स्वर्ग सम हो
(कारण-नवीं मात्रा पर शब्द पूरा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए)

कृतघ्न पक्के लोग
(कारण-आरंभ में जगण "कृतघ्न"आ रहा है, जो नहीं होना चाहिए)

कर रहे बस भोग
(कारण-एक मात्राभार कम है, साथ ही पाँचवीं मात्रा पर शब्द पूरा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए)

न हों कभी बदनाम
(कारण-पहली मात्रा पर शब्द पूरा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए)

विद्या  हमें  सिखाती है,
(कारण-13 मात्राओं की जगह 14 मात्राएँ हैं, जो नहीं होनी चाहिए)

कर अन्याय प्रतिकार
(कारण-11 की जगह 12 मात्राएँ हैं जो नहीं होनी चाहिए)
At 11:46pm on November 22, 2020, DR ARUN KUMAR SHASTRI said…

भाई चेतन जी
नमन -
इस्लाह का
सलीका आ जायेगा
मैंने आज तलक
मुकम्मल तो कोई देखा नहीं
गलतियां निकालोगे-
तो सीखूंगा ही ।।
मैं तो अधूरा था
अधूरा रहा
और हूँ अब तलक
आज आया हूँ आपकी बज्म में
कुछ सिखा दोगे -
तो सीखूंगा भी ।।

At 11:59am on June 27, 2020, Samar kabeer said…

जनाब चेतन प्रकाश जी,ये टिप्पणी आप मुशाइर: में दें,तो मुझे जवाब देने में आसानी होगी ।

 
 
 

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"आपका हार्दिक आभार, आदरणीय"
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"आदरणीय आदरणीय चेतन प्रकाशजी मेरे प्रयास को मान देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। हार्दिक आभार। सादर।"
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"आदरणीया प्रतिभा जी, प्रदत्त चित्र को शाब्दिक करती मार्मिक प्रस्तुति। इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक…"
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"आदरणीय दयाराम जी, प्रदत्त चित्र को शाब्दिक करते बहुत बढ़िया छंद हुए हैं। इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक…"
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