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Chetan Prakash
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ग़ज़ल

212 212 212 2राज़ आशिक़ के पलने लगे हैं फूल लुक-छिप के छलने लगे हैउनके आने से जलने लगे हैं मुँह-लगे दिल तो मलने लगे हैंकोई आता है खिड़की पे उसकी रात में गुल वो खिलने लगे हैंचल रही है मुआफिक हवा भी बागवाँ फूल फलने लगे हैंआज पूनम दुखी है बहुत सुन ! आँख में ख्वाब खलने लगे हैंरंग बसंत ग़ज़ल आ घुले फिर अब तो चेतन बदलने लगे हैंमौलिक एवं अप्रकाशितSee More
11 hours ago
DR ARUN KUMAR SHASTRI left a comment for Chetan Prakash
"भाई चेतन जी नमन - इस्लाह का सलीका आ जायेगा मैंने आज तलक मुकम्मल तो कोई देखा नहीं गलतियां निकालोगे- तो सीखूंगा ही ।। मैं तो अधूरा था अधूरा रहा और हूँ अब तलकआज आया हूँ आपकी बज्म में कुछ सिखा दोगे - तो सीखूंगा भी ।।"
yesterday
Chetan Prakash commented on DR ARUN KUMAR SHASTRI's blog post मौसम त्योहार का ओर तुम
"   भाई, डाॅ अरण कुमार शास्त्री, आपकी कविता अथवा काव्य- लेखन इस्लाह से नही, मुक्त छंद अथवा अतुकांत कविता के अच्छे काव्य के अध्ययन से सुधर सकता है। उदाहरण के लिए अंग्रेजी मे टी. एस एलिएट, हिन्दवी ( हिन्दुस्तानी, उर्दू ) में कैफी आज़मी, साहिर…"
Friday
Chetan Prakash commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुमसे ग़ज़ल ने कुछ नहीं बोला?
"आदाब, भाई ब्रजेश कुमार ब्रज ! बेहतर होता कि आप ग़जल की बह्र और अरकान भी रचना के ऊपर अंकित करते। ! ऐसा होने से शिल्प की पड़ताल बेहतर हो सकती थी। वैसे, मुझे तय करना कठिन हो रहा है कि रचना को नाम क्या दूँ, कदाचित नज़्म कहना बेहतर होगा। एक और बात और, हर…"
Thursday
Chetan Prakash commented on Chetan Prakash's blog post फैसला (लघुकथा)
"बंधु, बृजेश कुमार बृज शुभ सँध्या । लघु-कथा सार रूप में कथ्य की प्रस्तुति होती है। और, जनाब, शब्दों को संदर्भ में और वाक्य को उसके विन्यास और पूर्णता मे समझा जाता है, न कि संदर्भ से काटकर, अधूरे वाक्य उठाकर अर्थ का अनर्थ किया जाए । साभार"
Wednesday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Chetan Prakash's blog post फैसला (लघुकथा)
"आदरणीय चेतन जी अन्यथा न लें...अगर गौर से पढता नहीं तो इतना लिखता नहीं..बहुत अच्छी लघु कथा लिख के निकल लेता। खैर अपनी अपनी समझ है..जो आप कहना चाह रहे शायद मैं नहीं समझा...सादर"
Wednesday
Chetan Prakash commented on DR ARUN KUMAR SHASTRI's blog post मौसम त्योहार का ओर तुम
"डाॅ अरुण कुमार शास्त्री, शुभ प्रभात ! कविता की भाषा असंयमित प्रतीत हुई। और, कदाचित, एकरूपता का अभाव भी भाषा मे जान पड़ा।"
Nov 18
Chetan Prakash commented on सालिक गणवीर's blog post फिर से मुझको न वो हरा जाए....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"भाई सलिक गणवीर , नमस्कार ! गजल अच्छी है, बधाई, स्वीकार करें ! हाँ, तीसरा शेर संशोधन चाहता है, वाक्य विन्यास की दृष्टि से से भी और सम्प्रेषण की दृष्टि से भी ।"
Nov 18
Chetan Prakash commented on Chetan Prakash's blog post फैसला (लघुकथा)
"भाई बृजेश कुमार बृज, नमस्कार! आपने लघु कथा , "फैंसला" को ध्यान पूर्वक पढ़ा ही नही। कहानी आपको पुनः पढ़नी होगी, यदि आप वाकई अपने प्रश्नों का उत्तर चाहते है । एक बात और कहानीकार, कहानीकार ही होता है, कोई पात्र नहीं । वैसे भी लघु-कथा का मर्म…"
Nov 18
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Chetan Prakash's blog post फैसला (लघुकथा)
"कहानी तो अच्छी है आदरणीय लेकिन एक पाठक के तौर पे कुछ् बातें मुझे खटक रहीं। पहली पंक्ति से स्पष्ट है कि कहानीकार बड़ा भाई है।लेकिन "काश वह खुद अपनी पत्नी का चुनाव कर पाता" "उसकी तलाश पूरी हो चुकी थी" जैसे वाक्यों से महसूस होता है…"
Nov 17
Chetan Prakash commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दीपावली - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' ( गजल )
"भाई लक्ष्मण धामी जी, दीपावली भाई दूज दोनों मुबारक हो ! भाई जी आपकी ग़ज़ल के मतले के मिसरों मेंं राबता नहीं जान पड़ा। बाकी शेऱ अच्छे है।"
Nov 16
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-121
"अतुकांत कविता..... एक से इक्कीस दीपावली की वेला है एक से इक्कीस भले दीप से दीप जले ! राजा से रंक भले दुःख को समझते हैं पड़ौसी का बारिश में उड़ा छप्पर बालक ही उठा लाते हैं, बड़ो के सहयोग से दोबारा रखवाते हैं...! आवारा है..... पर गरीबों के मसीहा…"
Nov 15
Chetan Prakash commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post मुंगेरीलाल के वैक्सीन सपने (कहानी) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी :
"नमन, मान्यवर ! कहानी, लघु-कथा से इतर गम्भीर साहित्यिक विधा है। लेकिन मोहतरम, नाचीज आपकी कहानी का उद्देश्य ही नहीं समझ पाया।"
Nov 15
Chetan Prakash commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post गार्गी की बार्बी (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"आदाब,जनाब शहजाद उस्मानी !आपकी लघु कथा सम्पादन की आकाँक्षी है और बिखराव भी बहुत है। कथावस्तु का विकास यदि कार्य-कारण सम्बंध पर आधारित न हो तो सुखद परिणाम नहीं मिलता। साभार !"
Nov 10
Chetan Prakash commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post लघुकथा : मज़ा (गणेश जी बाग़ी)
"आदरणीय भाई इं0. गणेश बागी जी नमन ! वाहहहह, बहुत अच्छी लघु कथा है ! बधाई स्वीकार करें ! ,"
Nov 10
Chetan Prakash commented on Samar kabeer's blog post तरही ग़ज़ल
"कहते हैं, बहुत ज़रूरी चीजे जैसै हवा, पानी, धूप और आकाश ईश कृपा से प्राप्त होती है, बिल्कुल फ्री ! मोहतरम जनाब, समर कबीर साहब की ग़जल दीपावली के शुभ अवसर पर हम सब परिवार के सदस्यों के लिए ऐसा ही नायाब तोहफा है। मेहरबानी जैसे शब्द बहुत छोटे है, आपका…"
Nov 9

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Gender
Male
City State
Baraut
Native Place
Hapur
Profession
Teaching
About me
I'm a poet rather born than made or trained since my childhood

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ग़ज़ल

212 212 212 2

राज़ आशिक़ के पलने लगे हैं
फूल लुक-छिप के छलने लगे है

उनके आने से जलने लगे हैं
मुँह-लगे दिल तो मलने लगे हैं

कोई आता है खिड़की पे उसकी
रात में गुल वो खिलने लगे हैं

चल रही है मुआफिक हवा भी
बागवाँ फूल फलने लगे हैं

आज पूनम दुखी है बहुत सुन !
आँख में ख्वाब खलने लगे हैं

रंग बसंत ग़ज़ल आ घुले फिर
अब तो चेतन बदलने लगे हैं

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on November 23, 2020 at 6:58pm

फैसला (लघुकथा)

आज मम्मी जी पापा जी छोटे के लिए लड़की देखने जा रहे। हम दो भाई है, छोटे भाई का नाम अभिषेक है। मुझे तो बैंक जाना था, फरवरी मार्च दो महीने, बैंक से छट्टिया वैसे भी नहीं मिलतीं। सास- ससुर की लाड़ली बड़ी बहू उनके साथ जारही थी। बहुत खुश थी, बड़ी बहू-चयन का विशेष दायित्व जो मिल गया था। पापा जी ने तो कह दिया था, हम ठहरे पुराने जमाने के लोग, आजकल जो अपेक्षाएं, एक बहू से परिवार को हो सकती है तुम बेहतर जानती हो। ड्राईवर के आते ही कहा, गाड़ी लगाओ, रामबीर चार घंटे का रास्ता है । बारह बजे तक पहुँचना है,…

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Posted on November 8, 2020 at 7:00pm — 6 Comments

सरस्वती वंदना

वीणावादिनी सरस्वती,

माँ शारदे भारती वर दे !

अँधकार की गर्द बढी है

सूरज की रौशनी घटी है

रतौँधी से ग्रस्त है मानव,

कवि की दृष्टि पड़ी धुँधली है

शिव-नेत्र -कवि हृदय जगा दे !

कि माँ शारदे रात जगा दे

जग से अँधकार मिटा दे

वर दे माँ शारदे वर दे !

तमसो मा ज्योतिर्गमय मंत्र

समस्त विश्व प्रसारित कर दे !

द्रोही हैं जो मानवता के

जन-धन की आवश्यकता के

चुन-चन कर संहार करो माँ

वंचित जन-मन…

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Posted on October 29, 2020 at 1:00pm — 3 Comments

रोटी.....( अतुकांत कविता)

रोटी का जुगाड़

कोरोना काल में

आषाढ़ मास में

कदचित बहुत कठिन रहा

आसान जेठ में भी नहीं था.

पर, प्रयास में नए- नए मुल्ला

अजान उत्साह से पढ रहे थे...

दारु मृत संजीवनी सुरा बन गयी थी

सरकार के लिए भी,

कोरोना पैशैन्ट्स के लिए भी

और, पीने वालों का जोश तो देखने लायक था,

सबकी चाँदी थी...!

आषाढ़ तो बर्बादी रही..

इधर मानसून की बारिश

उधर मज़दूरो की भुखमरी

और, बेरोज़गारी.....

सच, मानो कलेजा मुुँह

को आ गय़ा...!…

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Posted on July 11, 2020 at 1:00pm

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At 11:46pm on November 22, 2020, DR ARUN KUMAR SHASTRI said…

भाई चेतन जी
नमन -
इस्लाह का
सलीका आ जायेगा
मैंने आज तलक
मुकम्मल तो कोई देखा नहीं
गलतियां निकालोगे-
तो सीखूंगा ही ।।
मैं तो अधूरा था
अधूरा रहा
और हूँ अब तलक
आज आया हूँ आपकी बज्म में
कुछ सिखा दोगे -
तो सीखूंगा भी ।।

At 11:59am on June 27, 2020, Samar kabeer said…

जनाब चेतन प्रकाश जी,ये टिप्पणी आप मुशाइर: में दें,तो मुझे जवाब देने में आसानी होगी ।

 
 
 

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हमारा आज और कल एक सिक्के के दो पहलू हैं सुनहरे कल के लिए आज की बलि मत चढ़ा दो माना की आज ज़िंदगी कठिन…See More
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"बहुत सुंदर पंक्तियाँ हैं आदरणीय।प्रेरणादायक।हार्दिक बधाई"
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"बहुत बहुत आभार आपका।"
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"बहुत बहुत आभार आपका आदरणीय "
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