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Chetan Prakash
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Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-129 in the group चित्र से काव्य तक
"लोहड़ी औ मकर संक्रान्ति,हम सबने खूब मनाई खाकर हमने तिल के लड्डू,पतंग भी खूब उड़ाई जला अलाव बच्चों ने रात,फेरे भो कई लगाए रेबड़ी तिल सकरी मस्त खा,घर हम सबके दे आए हुआ वक्त जब दोपहरी का, माँ खिचड़ी लस्सी लाई डाल खूब घी हमने उसमें, मस्ती से जी भर…"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-135
"नमन आदरणीया बहुत अच्छी  अतुकांत  रचना  हुई है! बधाई स्वीकार करें, सादर "
Jan 16
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-135
"आदाब, आदरणीय गणेश बाग़ी जी, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें! "
Jan 16
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-135
" धन्यवाद, आदरणीया, कोई बात नहीं! दूसरी प्रस्तुति, ग़ज़ल पोस्ट कर दी है, कृपया देख लीजिएगा, सादर "
Jan 16
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-135
" जी, आदरणीय! मैंने दूसरी प्रस्तुति ग़ज़ल पोस्ट कर दी है, कृपया देख लीजिएगा! "
Jan 16
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-135
"नमन, आदरणीया, अच्छा प्रयास है, आपका! दूसरे पद का प्रवाह, तीसरी पंक्ति में बाधित हो रहा है, देखिएगा, सादर"
Jan 16
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-135
"नमन, बंधुवर लक्ष्मण सिंह मुसाफिर, दोहे अनायास ही बचपन से लेकर यौवन और तत्काल वर्तमान में लौट आते हैं! बहुत अच्छी प्रस्तुति कही जाएगी, आपकी, बधाई! "
Jan 16
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-135
"आदरणीय, भाई लक्ष्मण सिंह मुसाफिर साहब, आपने च ग़ज़ल तक पहुँचने की ज़हमत की, आपको अच्छी लगी, प्रोत्साहित हूँ! गया प्रभावित ज़रूर प्रभावित हो रही है,  सुधार लेता हूँ, इसके लिए आप का धन्यवाद, बंधुवर : "कि पहुँचा जब  कभी सज-धज मज़ा करते…"
Jan 16
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-135
"ग़ज़ल: मुहब्बत का ज़माना वो अभी तक याद है... 1222      1222      1222      12 मुहब्बत का ज़माना वो अभी तक याद है   बने हम तुम फ़साना वो अभी तक याद है तुम्हारा छुप के आना वो अभी तक याद है नहीं…"
Jan 16
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-135
"मौत.........प्रेम की दम तोड़ते साल की साँसे लम्बी हो चली थीं अंत  अब निकट ही था....! हड्डियों को बेधती  पछुआ हवा साक्षात् यमदूत  का स्वरूप बन चुकी थीं जान लेने को आतुर ......! खरगोश सी धड़कनें दिल की कहीं भी छुप जाना चाहती…"
Jan 16
Chetan Prakash posted a blog post

गीत ,, विछोह मुझे मिलन लगता है.......!

विछोह मुझे मिलन लगता  है.....!जीना मुझे यज्ञ  में आहुतिमरना गंगा जल लगता  है जब से होठ, छुए होठों से,गाँव गुमा शहर वो लगता है विछोह मुझे मिलन लगता है !अथाह  गहरा है समन्दर वोमगर  मोती सीप  रहता  हैपालनहार जानता सब कुछ,रू में उसकी वो खुद रहता हैविछोह मुझे मिलन लगता है !ग़ज़ल मुझे बाँसुरी कान्हा कीदिल वो अलगोझा  लगता  है तेरे    मेरे   बोझ   दुखों  का, वो लक्ष्मण झूला लगता  हैविछोह मुझे मिलन लगता है !खिलता फूल तोड़कर मालीचरणों  प्रभु  के  रख देता हैसमर्पण पुष्प का ईश  मुझे,आसमान क्षितिज लगता…See More
Jan 1
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"" बहुत  देर  कर दी आते- आते" नमन  आदरणीय  भाई  योगराज  प्रभाकर जी ! न जाने  कब  से लघुकथा  के मंच पर मुझे आपके  आगमन की प्रतीक्षा  थी । साल बीतते  ही सही आप इस मंच पर प्रकट…"
Dec 30, 2021
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-138
"आदरणीय  भाई  लक्ष्मण सिंह मुसाफिर साहब,  आदाब  ! श्रद्धेय समर कबीर साहब की समीक्षा  के  उपरान्त कहने को कुछ  शेष नहीं रह जाता, बंधुवर, ! फिर  भी , सारांश  में कहूँ  तो कह सकता  हूँ ग़ज़ल को…"
Dec 29, 2021
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-138
"मुहतरमा, आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही आपने! पर, मुझे लगता है मतले के सानी में 'करके' का समाधान अभी भी आपको तलाशना होगा! और, हां, चौथा शे'र भी आपकी नज़र ए सानी का मुन्तज़िर है! "
Dec 29, 2021
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-138
"आदाब, 'अमीर' साहब! अच्छी ग़ज़ल कही आपने! लेकिन, जनाब, पांचवाँ शे'र आपकी खास नज़र का मुन्तजिर है, मुझे शे'र दोमुंहा लगा! देखिएगा! "
Dec 29, 2021
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-138
"भाई आशीष यादव  आपका  ग़ज़ल  कहने  का प्रयास शनै:शनै: बेहतर  हो सकता  ! वैसे, ग़ज़ल  आप  से  अभी  और समय  चाहती  है, बंधु !"
Dec 29, 2021

Profile Information

Gender
Male
City State
Baraut
Native Place
Hapur
Profession
Teaching
About me
I'm a poet rather born than made or trained since my childhood

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गीत ,, विछोह मुझे मिलन लगता है.......!

विछोह मुझे मिलन लगता  है.....!

जीना मुझे यज्ञ  में आहुति

मरना गंगा जल लगता  है 

जब से होठ, छुए होठों से,

गाँव गुमा शहर वो लगता है 

विछोह मुझे मिलन लगता है !

अथाह  गहरा है समन्दर वो

मगर  मोती सीप  रहता  है

पालनहार जानता सब कुछ,

रू में उसकी वो खुद रहता है

विछोह मुझे मिलन लगता है !

ग़ज़ल मुझे बाँसुरी कान्हा की

दिल वो अलगोझा  लगता  है 

तेरे    मेरे   बोझ   दुखों …

Continue

Posted on January 1, 2022 at 12:23pm

ग़ज़ल

संगदिल फिर ज़िन्दगी है उससे टकराना भी क्या !

फोड़कर सर अपना यारो रोना-चिल्लाना भी क्या !!

कीमती आँसू हैं तेरे वो निशाँ जुल्म ओ सितम,

बंद दरवाजों के आगे सर को टकराना भी क्या !

कर खुदा की बन्दगी और एहतराम उसका कर ले,

लोग ही क़मज़र्फ हों गर उनको जतलाना भी क्या !

बढ़ रही तन्हाईयाँ है उम्र के बढ़ने के साथ,

खाली-खाली जीस्त है गर वो सर खुजलाना भी क्या !

नौंचनी हैं उनको लाशें क़ौम भी तो बाँटनी,

शहर सौदागर आये उनको…

Continue

Posted on October 29, 2021 at 6:30am

ग़ज़ल: संगदिल गर ज़िन्दगी है उस से टकराना भी क्या ...!

संगदिल गर ज़िन्दगी  है उससे टकराना भी क्या ।

फोड़कर सर अपना यारो रोना चिल्लाना भी क्या ।।

ज़िन्दगी गर है चुनौती मुँह छिपाकर जीना क्या ।

हाथ  दो - दो होने  दो फिर सच को झुठलाना भी क्या 

कीमती आँसू हैं तेरे वो निशाँ जुल्म ओ सितम, 

बंद दरवाजों के आगे  सर वो फुड़वाना भी  क्या ।

कर खुदा की  बन्दगी  और एहतराम उसका  कर ले, 

लोग  ही क़मज़र्फ हैं गर उनको जतलाना भी  क्या ।

नोंचनी  लाशें हैं उनको कौम को है…

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Posted on October 10, 2021 at 7:25am

ग़ज़ल

1212     1122     1212     22 / 112

मेरे  अपनों  का  ही खंजर मेरी तलाश में है ।

जिन्हें बनाया था अफसर मेरी तलाश में है ।।

जड़ों को सींच रहा हूँ शुरू से ओ बी ओ की,

नये  आए हैं  वो  चाकर  मेरी तलाश  में हैं ।

जताते झूूठा वो हक़ जो ग़ज़ल की शोहरत पर,

उन्हीं  के  हाथ  का  पत्थर  मेरी  तलाश में है ।

बहुत गुमान है उनको तो जन्म के शहर का,

नगर का हूँ  मैं तो रहबर  मेरी  तलाश  में हैं ।

जहाँ में सच…

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Posted on August 24, 2021 at 7:00pm — 5 Comments

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At 6:35am on July 22, 2021, रणवीर सिंह 'अनुपम' said…
आदरणीय, चेतन जी, "दोहे : कैसे- कैसे  लोग" शीर्षक के तहत लिखे गए दोहे बहुत सुंदर हैं और बहुत अच्छे लगे।

निम्न चरण विधान में न होने से इनमें लय भंग है। जिसे दूर करने की जरूरत है।

जन्म-भूमि स्वर्ग सम हो
(कारण-नवीं मात्रा पर शब्द पूरा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए)

कृतघ्न पक्के लोग
(कारण-आरंभ में जगण "कृतघ्न"आ रहा है, जो नहीं होना चाहिए)

कर रहे बस भोग
(कारण-एक मात्राभार कम है, साथ ही पाँचवीं मात्रा पर शब्द पूरा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए)

न हों कभी बदनाम
(कारण-पहली मात्रा पर शब्द पूरा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए)

विद्या  हमें  सिखाती है,
(कारण-13 मात्राओं की जगह 14 मात्राएँ हैं, जो नहीं होनी चाहिए)

कर अन्याय प्रतिकार
(कारण-11 की जगह 12 मात्राएँ हैं जो नहीं होनी चाहिए)
At 11:46pm on November 22, 2020, DR ARUN KUMAR SHASTRI said…

भाई चेतन जी
नमन -
इस्लाह का
सलीका आ जायेगा
मैंने आज तलक
मुकम्मल तो कोई देखा नहीं
गलतियां निकालोगे-
तो सीखूंगा ही ।।
मैं तो अधूरा था
अधूरा रहा
और हूँ अब तलक
आज आया हूँ आपकी बज्म में
कुछ सिखा दोगे -
तो सीखूंगा भी ।।

At 11:59am on June 27, 2020, Samar kabeer said…

जनाब चेतन प्रकाश जी,ये टिप्पणी आप मुशाइर: में दें,तो मुझे जवाब देने में आसानी होगी ।

 
 
 

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