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Chetan Prakash
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Chetan Prakash commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की - तमन्नाओं को फिर रोका गया है
"आदाब, मैं आदरणीय समर कबीर साहब से सहमत हूँ, आपकी ग़ज़ल की सम्प्रेषणीयता वास्तव में अद्भुत है! बाकी कहना  होगा, अन्तिम रूप से काव्य भाव की ही साधना है! अत: 'अति सवर्त्रवर्जयेत ' के सर्वमान्य सिद्धांत के अनुसार बताए गए, विद्वत जन, क्षमा…"
Friday
Chetan Prakash posted a blog post

ग़ज़ल: संगदिल गर ज़िन्दगी है उस से टकराना भी क्या ...!

संगदिल गर ज़िन्दगी  है उससे टकराना भी क्या ।फोड़कर सर अपना यारो रोना चिल्लाना भी क्या ।।ज़िन्दगी गर है चुनौती मुँह छिपाकर जीना क्या ।हाथ  दो - दो होने  दो फिर सच को झुठलाना भी क्या कीमती आँसू हैं तेरे वो निशाँ जुल्म ओ सितम, बंद दरवाजों के आगे  सर वो फुड़वाना भी  क्या ।कर खुदा की  बन्दगी  और एहतराम उसका  कर ले, लोग  ही क़मज़र्फ हैं गर उनको जतलाना भी  क्या ।नोंचनी  लाशें हैं उनको कौम को है बाँटना, शह्र सौदागर आये हैं तो मुँह दिखलाना भी क्या ।बढ़ रही तन्हाईयाँ हैं उम्र के बढ़ने के साथ,  खाली खाली…See More
Oct 10
Chetan Prakash commented on Sushil Sarna's blog post मुक्तक (आधार छंद - रोला )
" नमस्कार,  भाई  सुशील सरना  ! खूबसूरत  छंद आधारित  मुक्तक हैं, दोनों, बधाई  !"
Oct 10
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-78 (विषय: 'विजय)
"नमस्कार, 'प्रकाश' साहब  कमीशन का लालच देकर उपभोक्तावाद को प्रश्रय देना, युवाओं को ग़ैर ज़रूरी वस्तुएं खरीदने को प्रोत्साहित कर फिजूलखर्ची को किस तरह  बढ़ावा  दिया जा  रहा  है, को रेखांकित करती अच्छी …"
Sep 30
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-78 (विषय: 'विजय)
"नमस्कार, आदरणीया! बहुत गम्भीर विषय को उकेरती सार्थक रचना है, आपकी! परन्तु, क्षमा करें, लघुकथा कम रिपोर्ताज ज्यादा प्रतीत हुई! "
Sep 30
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-78 (विषय: 'विजय)
"नमस्कार, मनन कुमार सिंह भावपूर्ण लघुकथा है! परन्तु भाव- बोध का पटाक्षेप कथ्य पर होता, कदाचित श्रेयस्कर होता! "
Sep 30
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-78 (विषय: 'विजय)
"जनाब, आदाब! यह क्या मज़ाक है? लघु कथा का कौन सा प्रकार है, यह? ज़रा समझाइएगा! न कोई पात्र, न कोई कथ्य, न कोई परिवेश! मात्र जिंगल! फिर कौन किसी सत्य का बोध कर पाएगा, बताइये! "
Sep 30
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-78 (विषय: 'विजय)
"जनाब, आप लघुकथा पढ़ रहे हैं!  दो पात्र है, दोनों का ही वार्तालाप बिलकुल स्पष्ट है! स्पेसिंग, कोमा, फुल स्टाप कहाँ आपको अधूरे दिखाई पड़े, चिन्हित करने की कृपा करें! आश्चर्य की बात है, लघुकथा अपने भाव-बोध के लिए जानी जाती है, उस पर आप कुछ कह नहीं…"
Sep 30
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-78 (विषय: 'विजय)
"                  विजेता..... अरे, भाई  मास्टर  अश्विनी ! अलस सुबह ही ठेकेदार सुखबीर आवाज  लगा  रहा था ! अश्विनी ने घर का दरवाजा खोलकर दबंग  ठेकेदार  को बैठक  में सोफे…"
Sep 30
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"आदाब, जनाब नादिर खान, बेहतरीन ग़ज़ल हुई है, मुबारक़ हो, आपको! लेकिन चौथा शे'र ऊला में 'नए' की वज़ह से शायद शतुरगुरबा ऐब को जन्म दे रहा है, देखिएगा! "
Sep 25
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"आदाब, भाई दिनेश कुमार खूबसूरत ग़ज़ल हुई, बधाई स्वीकार करें! "
Sep 25
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"नमस्कार, दिनेश कुमार विश्वकर्मा, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास किया  आपने किन्तु रदीफ  ग़लत  हो  जाने  से पुरी ग़ज़ल  दिशाहीन  हो गई है ! अत: दोष पूर्ण मतला बदल कर पुन: सुधीजनों के परामर्श को दृष्टिगत रखते  हुए …"
Sep 25
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"आदाब, जनाब तस्दीक अहमद  खान साहब, खूबसूरत ग़ज़ल हुई है ।बधाई आप को  ! परन्तु  छठे शे'र  का सानी  मिसरा बेहतर  हो सकता था, देखिएगा  !"
Sep 25
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"नमस्कार,  दण्डात्मक 'नाहक ' साहब,  खूबसूरत ग़ज़ल हुई है, बधाई  ! दूसरा शे'र और मक्ता मुझे  कमजोर लगे !"
Sep 25
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"नमस्कार, अनिल कुमार सिंह, खूब  ग़ज़ल हुई है, बधाई आपको ! मकते का शे'र, विशेष रूप से ऊला बेहतर हो  सकता  था ! सादर "
Sep 25
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"आदाब, आदरणीय सौरभ साहब, कलकत्ता, पटना साधारण  संज्ञाएं  नहीं हैं, विशेष इतिहास प्रसिद्ध शहरो  की नाम वाचक  संज्ञाएं   (proper nouns)  हैं ।अत: माननीय स्थापित संज्ञाएं  हैं और उनका  बहुवचन  सम्भव ही…"
Sep 25

Profile Information

Gender
Male
City State
Baraut
Native Place
Hapur
Profession
Teaching
About me
I'm a poet rather born than made or trained since my childhood

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ग़ज़ल: संगदिल गर ज़िन्दगी है उस से टकराना भी क्या ...!

संगदिल गर ज़िन्दगी  है उससे टकराना भी क्या ।

फोड़कर सर अपना यारो रोना चिल्लाना भी क्या ।।

ज़िन्दगी गर है चुनौती मुँह छिपाकर जीना क्या ।

हाथ  दो - दो होने  दो फिर सच को झुठलाना भी क्या 

कीमती आँसू हैं तेरे वो निशाँ जुल्म ओ सितम, 

बंद दरवाजों के आगे  सर वो फुड़वाना भी  क्या ।

कर खुदा की  बन्दगी  और एहतराम उसका  कर ले, 

लोग  ही क़मज़र्फ हैं गर उनको जतलाना भी  क्या ।

नोंचनी  लाशें हैं उनको कौम को है…

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Posted on October 10, 2021 at 7:25am

ग़ज़ल

1212     1122     1212     22 / 112

मेरे  अपनों  का  ही खंजर मेरी तलाश में है ।

जिन्हें बनाया था अफसर मेरी तलाश में है ।।

जड़ों को सींच रहा हूँ शुरू से ओ बी ओ की,

नये  आए हैं  वो  चाकर  मेरी तलाश  में हैं ।

जताते झूूठा वो हक़ जो ग़ज़ल की शोहरत पर,

उन्हीं  के  हाथ  का  पत्थर  मेरी  तलाश में है ।

बहुत गुमान है उनको तो जन्म के शहर का,

नगर का हूँ  मैं तो रहबर  मेरी  तलाश  में हैं ।

जहाँ में सच…

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Posted on August 24, 2021 at 7:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल

रहगुज़र को मेरी कारवाँ दे गया....

212     212     212     212

रहगुज़र  को  मेरी कारवाँ  दे गया

वो खुदी  को अभी पासवाँ दे गया

मुफलिसी वो बुरा ख्वाब थी ज़िन्दगी 

था खुदा जात वो कहकशाँ  दे  गया

आँख भर आए है याद कर के उसे

वो खुदा  था मुझे  बागवाँ  दे गया

ज़िन्दगी  को रज़ा की जबाँ दे गया

रास्ता  एक  था  दो  जहाँ  दे गया

जो बुरा ख्वाब  होता मुझे नींद में

वो बदल  कर नई दास्ताँ  दे…

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Posted on August 7, 2021 at 6:00pm

ग़ज़ल

2122     1212    22 / 112

आज  सोया है शहर घर कर के ! 

खूब  रोया  खुदा  महर  कर के  !!

क्या बुरा हो गया  सनम मुझ से

देखता कब है वो नज़र कर के  !

ज़हरीला बन गया हरेक रिश्ता याँ 

खत्म हो हर अजाब मर कर के  !

हम हैं मारे उसी की बेरुखी के

जिसको देखा नज़र वो भर कर के !

कोई है बात जो लगी दिल को

मिलता कोई नहीं खबर  कर के !

क्या करू मिल के ज़िन्दगी से मैं

खौलता  खून  है …

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Posted on August 3, 2021 at 12:46am — 2 Comments

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At 6:35am on July 22, 2021, रणवीर सिंह 'अनुपम' said…
आदरणीय, चेतन जी, "दोहे : कैसे- कैसे  लोग" शीर्षक के तहत लिखे गए दोहे बहुत सुंदर हैं और बहुत अच्छे लगे।

निम्न चरण विधान में न होने से इनमें लय भंग है। जिसे दूर करने की जरूरत है।

जन्म-भूमि स्वर्ग सम हो
(कारण-नवीं मात्रा पर शब्द पूरा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए)

कृतघ्न पक्के लोग
(कारण-आरंभ में जगण "कृतघ्न"आ रहा है, जो नहीं होना चाहिए)

कर रहे बस भोग
(कारण-एक मात्राभार कम है, साथ ही पाँचवीं मात्रा पर शब्द पूरा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए)

न हों कभी बदनाम
(कारण-पहली मात्रा पर शब्द पूरा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए)

विद्या  हमें  सिखाती है,
(कारण-13 मात्राओं की जगह 14 मात्राएँ हैं, जो नहीं होनी चाहिए)

कर अन्याय प्रतिकार
(कारण-11 की जगह 12 मात्राएँ हैं जो नहीं होनी चाहिए)
At 11:46pm on November 22, 2020, DR ARUN KUMAR SHASTRI said…

भाई चेतन जी
नमन -
इस्लाह का
सलीका आ जायेगा
मैंने आज तलक
मुकम्मल तो कोई देखा नहीं
गलतियां निकालोगे-
तो सीखूंगा ही ।।
मैं तो अधूरा था
अधूरा रहा
और हूँ अब तलक
आज आया हूँ आपकी बज्म में
कुछ सिखा दोगे -
तो सीखूंगा भी ।।

At 11:59am on June 27, 2020, Samar kabeer said…

जनाब चेतन प्रकाश जी,ये टिप्पणी आप मुशाइर: में दें,तो मुझे जवाब देने में आसानी होगी ।

 
 
 

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