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गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत '
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गिरिराज भंडारी commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post सुकून-ओ-अम्न पर कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़(५० )
"आदरनीय गिरधारी भाई , बड़ी खूब सूरत ग़ज़ल कही , हार्दिक बधाई स्वीकार करें"
Jul 7
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post हाय क्या हयात में दिखाए रंग प्यार भी (४९)
"आदरणीय  गिरिराज भंडारी जी ,हौसला आफजाई के लिए शुक्रिया "
Jul 5
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मन के आँगन में फूटा जो प्रीतांकुर नवजात |(४८ )
"आदरणीय  गिरिराज भंडारी जी ,आपकी सराहना के लिए हार्दिक आभार | "
Jul 5

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गिरिराज भंडारी commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मन के आँगन में फूटा जो प्रीतांकुर नवजात |(४८ )
"क्या बात है , आदरणीय गिरधारी भाई , बढिया गीत रचना की है , हार्दिक बधाई"
Jul 5

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गिरिराज भंडारी commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post हाय क्या हयात में दिखाए रंग प्यार भी (४९)
"आदरणीय गिरधारी भाई , खूब सूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाईयाँ"
Jul 5
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post न हसरतों से ज़ियादा रखें लगाव कभी (५४)
"जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,मुझे ऐसा लगता है इस ग़ज़ल को आपने दोबारा पोस्ट किया है? एक बार चेक कर के बताएँ, अपनी टिप्पणी आपके जवाब के बाद दूँगा ।"
Jul 3
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post ये हुआ है कैसा जहाँ खुदा यहाँ पुरख़तर हुई ज़िंदगी (५२)
"जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें । 'कहीं वहशतों का निज़ाम है कहीं दहशतें खुले-आम है' इस मिसरे के अंत में 'है' को "हैं" कर लें ।"
Jul 3
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post ग़म को क़रीब से कभी देखा है इसलिए(५१)
"जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'लगता है दर्द ग़ैर का अपना है इसलिए' इस मिसरे में रदीफ़ से इंसाफ़ नहीं हो सका,देखियेगा । 'पड़ती है मार पर उसे सच्चा है इसलिए' इस मिसरे का…"
Jul 3
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted blog posts
Jul 1
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post सुकून-ओ-अम्न पर कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़(५० )
"//ज़रूरी शग़्ल है कोई मुहब्बत और पीरी में// ये मिसरा अब ठीक है । //ख़िराम लूगत में स्त्रीलिंग ही लिखा था इसलिए इतेमाल किया// आपकी लूग़त ग़लत जानकारी दे रही है,"ख़िराम" शब्द पुल्लिंग है ।"
Jul 1
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post सुकून-ओ-अम्न पर कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़(५० )
"आदरणीय  Samar kabeer साहेब ,आदाब  ,आपकी  हौसला अफजाई और ज़र्रानवाज़ी का तहेदिल से शुक्रिया |शादो आबादो सेहतयाब रहें |  नवाज़िशो करम क़ायम रहे |इस मिसरे को इस प्रकार संशोधित किया है -ज़रूरी शग़्ल है कोई मुहब्बत और…"
Jul 1
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post सुकून-ओ-अम्न पर कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़(५० )
"जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें । 'शग़ल कोई ज़रूरी है मुहब्बत और पीरी में' इस मिसरे में 'शग़ल' ग़लत है,सहीह शब्द है "शग़्ल"21,इसके हिसाब से मिसरा बदलने का…"
Jun 30
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted a blog post

ग़म को क़रीब से कभी देखा है इसलिए(५१)

(२२१ २१२१ १२२१ २१२ )ग़म को क़रीब से कभी देखा है इसलिएलगता है दर्द ग़ैर का अपना है इसलिए**जब और कोई राह न सूझे ग़रीब कोरस्ता हुज़ूर ज़ुर्म का चुनता है इसलिए**झूठों का कुछ बिगाड़ न सकते हुज़ूर आपपड़ती है मार पर उसे सच्चा है इसलिए**बाज़ार के उसूल हुए लागू इश्क़ परबिकता है ख़ूब इन दिनों सस्ता है इसलिए**आसाँ न दरकिनार उसे करना ज़ीस्त सेदिल का हुज़ूर आपके टुकड़ा है इसलिए**उनके ज़मीर के हुए चर्चे जहान मेंमिट्टी के भाव में उसे बेचा है इसलिए**ना-जायज आप फ़ायदा उसका उठायें मतहद से ज़ियादा आदमी अच्छा है इसलिए**आते हैं ग़म…See More
Jun 29
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted a blog post

सुकून-ओ-अम्न पर कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़(५० )

सुकून-ओ-अम्न पर कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़ अगर पैहम है तकलीफ़-ए-अवाम अच्छी नहीं हरगिज़ **निज़ामत देखती रहती वतन में क़त्ल-ओ-गारत क्यों नज़रअंदाज़ की खू-ए-निज़ाम अच्छी नहीं हरगिज़ **न रोके तिफ़्ल की परवाज़ कोई भी ज़माने में कभी सपने के घोड़े पर लगाम अच्छी नहीं हरगिज़ **किसी को हक़ नहीं है ये कि ले क़ानून हाथों में मगर सूरत वतन में है ये आम अच्छी नहीं हरगिज़ **क़ज़ा को घर बुलाना है तुम्हें तो ख़ूब पी लेना वगरना मय है पक्की या है ख़ाम अच्छी नहीं हरगिज़ **शग़ल कोई ज़रूरी है मुहब्बत और पीरी में शब-ए-ग़म और तन्हाई की शाम…See More
Jun 27
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted a blog post

हाय क्या हयात में दिखाए रंग प्यार भी (४९)

हाय क्या हयात में दिखाए रंग प्यार भी इस चमन में साथ साथ फूल भी हैं ख़ार भी **देखते बदलते रंग मौसमों के इश्क़ में हिज्र की ख़िज़ाँ कभी विसाल की बहार भी **इंतज़ार की घड़ी नसीब ही नहीं जिसेक्या पता उसे है चीज़ लुत्फ़-ए-इंतिज़ार भी **कीजिये सुकून चैन की न बात इश्क़ में इश्क़ में क़रार भी है इश्क़ बे-क़रार भी **चश्म इश्क़ में ज़ुबान का हुआ करे बदल जो शरर बने कभी कभी है आबशार भी **प्यार एक फ़लसफ़ा है और नैमत-ए-ख़ुदा रंज़ है इसे बनाते लोग कार-ओ-बार भी **इश्क़ जो करे जनाब रूह से उसे नसीब अज्मल-ए-जहान और ज़बीन पर निखार भी…See More
Jun 26
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post हाय क्या हयात में दिखाए रंग प्यार भी (४९)
"आदरणीय  Samar kabeer  साहेब ,आपकी इस्लाह बहुत ही पुरअसर है और मिसरे को वाजिब अर्थ देने के लिए आवश्यक भी | संशोधन कर रहा हूँ | सादर आभार एवं नमन | इसी तरह कृपा बनायें रखें | "
Jun 25

Profile Information

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Male
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BIKANER (RAJASTHAN)
Native Place
BIKANER
Profession
RETIRED GOVT EMPLOYEE
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POET WRITER

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न हसरतों से ज़ियादा रखें लगाव कभी (५४)

न हसरतों से ज़ियादा रखें लगाव कभी 

वगरना क़ल्ब में मुमकिन है कोई घाव कभी 

***

इमारतें जो बनाते जनाब रिश्तों की 

उन्हें भी चाहिए होता है रखरखाव कभी 

***

हयात का ये सफर एक सा कहाँ होता 

कभी ख़ुशी तो मिले ग़म का भी पड़ाव कभी 

***

न इश्क़ की भी ख़ुमारी सदा रहे यकसाँ 

कभी उतार का आलम है और चढाव कभी 

***

अदब से…

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Posted on July 1, 2019 at 4:00pm — 1 Comment

ये हुआ है कैसा जहाँ खुदा यहाँ पुरख़तर हुई ज़िंदगी (५२)

(११२१२ ११२१२ ११२१२ ११२१२ )

.

ये हुआ है कैसा जहाँ खुदा यहाँ पुरख़तर हुई ज़िंदगी

न किसी को ग़ैर पे है यक़ीं न मुक़ीम अब है यहाँ ख़ुशी

**

कहीं रंज़िशें कहीं साज़िशें कहीं बंदिशें कहीं गर्दिशें

कहाँ जा रहा है बता ख़ुदा ये नए ज़माने का आदमी

**

कहीं तल्ख़ियों का शिकार है कहीं मुफ़्लिसी की वो मार है

मुझे शक है अब ये बशर कभी क्या रहेगा ज़ीस्त में शाद भी

**

कहीं वहशतों का निज़ाम है कहीं दहशतें खुले-आम है

मिले आदमी से यूँ आदमी मिले अजनबी से जूँ…

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Posted on June 30, 2019 at 2:30am — 1 Comment

ग़म को क़रीब से कभी देखा है इसलिए(५१)

(२२१ २१२१ १२२१ २१२ )

ग़म को क़रीब से कभी देखा है इसलिए

लगता है दर्द ग़ैर का अपना है इसलिए

**

जब और कोई राह न सूझे ग़रीब को

रस्ता हुज़ूर ज़ुर्म का चुनता है इसलिए

**

झूठों का कुछ बिगाड़ न सकते हुज़ूर आप

पड़ती है मार पर उसे सच्चा है इसलिए

**

बाज़ार के उसूल हुए लागू इश्क़ पर

बिकता है ख़ूब इन दिनों सस्ता है इसलिए

**

आसाँ न दरकिनार उसे करना ज़ीस्त से

दिल का हुज़ूर आपके टुकड़ा…

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Posted on June 28, 2019 at 11:00pm — 1 Comment

सुकून-ओ-अम्न पर कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़(५० )



सुकून-ओ-अम्न पर कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़

अगर पैहम है तकलीफ़-ए-अवाम अच्छी नहीं हरगिज़

**

निज़ामत देखती रहती वतन में क़त्ल-ओ-गारत क्यों

नज़रअंदाज़ की खू-ए-निज़ाम अच्छी नहीं हरगिज़

**

न रोके तिफ़्ल की परवाज़ कोई भी ज़माने में

कभी सपने के घोड़े पर लगाम अच्छी नहीं हरगिज़

**

किसी को हक़ नहीं है ये कि ले क़ानून हाथों में

मगर सूरत वतन में है ये आम अच्छी नहीं हरगिज़

**

क़ज़ा को घर बुलाना है तुम्हें तो ख़ूब पी लेना

वगरना मय है पक्की या है ख़ाम अच्छी…

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Posted on June 27, 2019 at 9:15pm — 4 Comments

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