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Gurpreet Singh jammu
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Gurpreet Singh jammu replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-110
"शुक्रिया आदरनीया  राजेश कुमारी  जी "
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Gurpreet Singh jammu replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-110
"शुक्रिया आदरनीय   Md. anis sheikh जी "
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"शुक्रिया आदरनीय लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी "
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"शुक्रिया आदरणीय दंडपाणि नाहक जी "
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"शुक्रिया आदरणीय आसिफ़ ज़ैदी जी "
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Gurpreet Singh jammu replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-110
"आदरणीय  नादिर खान जी , ग़ज़ल पसंद करने के लिए और बहुत सुंदर सुझावों के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद "
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Gurpreet Singh jammu replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-110
"जी शुक्रिया आदरणीय समर सर जी "
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Friday
Gurpreet Singh jammu replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-110
"फ़ैसला तुम्हारा क्यों, घिर गया सवालों में । जान जाओगे तुम भी, आने वाले सालों में । बर्गरों में पीजों में, सब्ज़ियों में दालों में । ढूंडिए न मज़हब को, रोटियों निवालों में ।  फ़िर अंधेरों में उनको, ढूंढ़ना न पड़ जाए, खो रहे हैं हम जिनको, आज अब…"
Friday
Gurpreet Singh jammu replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-110
"कैसे जाँ बचायेंगे मेमने यहाँ अपनी भेड़िये छिपे हों जब बकरियों की खालों में वाह आदरणीय नादिर खान जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही आपने । "
Friday
Gurpreet Singh jammu replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-110
"खुद की हाँकनी छोड़ें, अब तो आप नेताजी,सुनिये दर्द पिन्हा जो, मुफ़लिसों के नालों में।       अच्छा शेअर है आदरणीय बासुदेव अग्रवाल नमन जी "
Friday
Gurpreet Singh jammu replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-110
"आदरनीय आसिफ़ ज़ैदी जी , इस  खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई  प्रेम चंद के लेखन का,हीरो एक हामिद था।लफ्ज़ पुस्तकों में थे , शब्द थे रिसालों में।। वाह वाह बहुत ख़ूब "
Friday
dandpani nahak left a comment for Gurpreet Singh jammu
"आदरणीय गुरप्रीत सिंह जी आदाब , बहुत बहुत शुक्रिया हौसला अफ़जाई का मेरे ग़ज़ल कहने का प्रयास आपको पसंद आया दिल से शुक्रगुज़ार हूँ!"
Jul 27
Gurpreet Singh jammu replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-109
"सर जी आपकी ग़ज़ल भी दिखाई नहीं दे रही इस बार "
Jul 27
Gurpreet Singh jammu replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-109
"आदरणीय नीलेश सर जी नमस्कार ,  बहुत समय बाद आपकी ग़ज़ल पढ़ने को मिली । एक अजीब सी ख़ुशी महसूस हुई । हमेशा की तरह ग़ज़ल बेहतरीन ग़ज़ल । "
Jul 27
Gurpreet Singh jammu replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-109
"आदरणीय अनीस शेख जी ,  इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद क़ुबूल करें जी । "
Jul 27

Profile Information

Gender
Male
City State
Patiala Punjab
Native Place
India
Profession
Govt Employee
About me
I love to write, but dont have an ustaad so dont know the rules. Thats why i am here

Gurpreet Singh jammu's Blog

दो ग़ज़लें (2122-1212-22)

1.

शमअ  देखी न रोशनी देखी । 

मैने ता उम्र तीरगी देखी । 

देखा जो आइना तो आंखों में, 

ख़्वाब की लाश तैरती देखी । 

टूटे दिल का हटाया मलबा तो, 

आरज़ू इक दबी पड़ी देखी । 

एक इक पल डरावना सा लगा, 

इतने पास आ के ज़िन्दगी देखी । 

मैने इंसानियत रह ए हक़ पर, 

दो कदम चल के हांफती देखी 

2.

आप ने क्या कभी परी देखी । 

मैने यारो अभी अभी देखी । 

उसकी आँखों में सुब्ह सी…

Continue

Posted on July 14, 2019 at 12:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल

(2122-2122-2122-212)

मुश्किलें कितनी हैं अपने दरमियाँ गिनता रहा ।

बैठ कर मैं राह की दुश्वारियाँ गिनता रहा ।

आँखों में अश्कों का दरिया चढ़ के जब उतरा तो फ़िर,

मैं तो बस ख़्वाबों की डूबी कश्तियाँ गिनता रहा ।

और करता भी तो क्या वो नौजवां बेरोज़गार,

दी हैं कितनी नौकरी कीअरज़ियाँ गिनता रहा ।

राजनेता को न था मतलब किसी इंसान से,

वो तो केवल धोतियाँ और टोपियाँ गिनता रहा ।

वो रहे गिनते मुनाफ़ा कारख़ाने का उधर,…

Continue

Posted on July 8, 2018 at 7:50am — 17 Comments

(ग़ज़ल - इस्लाह के लिए) अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ -(गुरप्रीत सिंह)

22-22-22-22-22-2



अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ।

अपने आँसू ख़ुद ही पोंछा करता हूँ।



देर तलक आईना देखा करता हूँ।

जाने उसमें किसको ढूँढा करता हूँ।



दिल में दर्द उठे तो फ़िर क्या करता हूँ?

बस उसकी तस्वीर से शिक्वा करता हूँ।



क्या वो अब भी याद मुझे करता होगा?

ख़ुद से ऐसी बातें पूछा करता हूँ।



एक न इक दिन पत्थर पिघलेगा पगले!

ये कह के दिल को बहलाया करता हूँ।



शाम ढले वो तोड़ दिया करता हूँ मैं,

सुब्ह जो अक्सर ख़ुद… Continue

Posted on November 4, 2017 at 11:30am — 12 Comments

तरही ग़ज़ल (पहले ये बतला दो उसने छुप कर तीर चलाए तो)- गुरप्रीत सिंह

लाख करे कोशिश सोने की फ़िर भी नींद न आए तो।

एक अधूरा ख़्वाब किसी को सारी रात जगाए तो ।



तुम तो हौले से 'ना' कह के अपने रस्ते चल दोगे,

लेकिन किसी का अम्बर टूटे और धरती फट जाए तो ।



हाँ मैं तेरे ज़ुल्म के बारे में न ज़ुबाँ से बोलूँगा,

पर क्या होगा गर महफ़िल में आँख मेरी भर आए तो ।



फ़िर बतलाना सीने ऊपर वार बचाना है कैसे,

पहले ये बतला दो उसने छुप कर तीर चलाए तो ।



वो गर नज़रों से ही छू ले तो दिल धक धक करने लगे,

जाने क्या हो गर वो सचमुच आकर… Continue

Posted on November 2, 2017 at 1:30pm — 9 Comments

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At 8:13pm on July 27, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय गुरप्रीत सिंह जी आदाब , बहुत बहुत शुक्रिया
हौसला अफ़जाई का मेरे ग़ज़ल कहने का प्रयास आपको पसंद आया दिल से शुक्रगुज़ार हूँ!
At 4:55pm on August 30, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय गुरप्रीत सिंह जी, आप नई चर्चा आरम्भ कर सकते हैं किन्तु ग़ज़ल के सम्बन्ध में "ग़ज़ल की कक्षा" और "ग़ज़ल की बातें" में पूर्व से ही कई चर्चाएँ चल रही है. जहाँ तक मुझे लगता है उन चर्चाओं में ग़ज़ल के लगभग सभी पहलुओं पर चर्चा हुई है और सतत हो रही है. अतः जिस विषय पर चर्चा पूर्व में ही आरम्भ हो चुकी है उसे आप निरंतर कर सकते है. वहीं अपने प्रश्न भी पूछ सकते हैं. गुनीजन स्वमेव ही उत्तर के साथ वहां उपस्थित हो जायेंगे. सादर 

At 10:42pm on August 21, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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