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Manan Kumar singh
  • बिहार
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Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आ. ओम जी,लघुकथा हेतु बधाई लीजिए।'काम अपनी गति से होता है और बस समझो,हो गया।' हो जाए, तो शायद ज्यादा उपयुक्त हो।महज एक अल्पविराम की बात है।हो सकता है, टंकण में रह गया हो। दूसरी बात,...तुम आजकल काम करवा कर लौटोगे या आज काम करवा कर…"
Apr 30
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आ. बबीता जी,अपनी लघुकथा का पुनर्पाठ कीजिए,तब स्वत ज्ञात होगा कि इसमें कुछ अवांछित त्रुटियां घर कर गई हैं। प्रथमतः, विराम चिन्हों पर गौर करना लाजिमी है।द्वितीय, कुछ ऐसे शब्दांश हैं जो भ्रम पैदा करते हैं,जैसे:प्रश्नसूचक दृष्टि से अपनी ओर देखकर.....।…"
Apr 30
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आ. दीप जी, सामयिक लघुकथा हेतु बधाई लीजिए। हां, विराम चिन्हों पर गौर फरमाने से भाषा और दुरूस्त होगी।"
Apr 30
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आ. उस्मानी जी, जैसा मुझे प्रतीत होता है, प्रथम वाक्य में  .......,प्रश्नोत्तरी के रूप में ' हो तथा फिर बाद वाले वाक्य में  .....,सही विकल्प चुनकर ' हो तो अच्छा रहेगा। और जहां तक हालात की बात है,तो यह शब्द बहुवचन के रूप में…"
Apr 30
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आ.लक्ष्मण भाई जी,आपका आभार।"
Apr 30
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आपका आभार आ.बबिता जी।"
Apr 30
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आपका आभार आ.संदीप जी।"
Apr 30
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"सामयिक विषय पर आधारित लघुकथा हेतु आपको बधाई आ.उस्मानी जी। हां,yatr तत्र अल्पविराम वगैरह का प्रयोग छूट जाना किंचित संयोगजनित है,और हालात स्वयं ही बहुवचन है(एक वचनहै हाल)।"
Apr 29
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"लघुकथा को मान देने के लिए आपका दिली आभार आ.उस्मानी जी।"
Apr 29
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"शीर्षक है आदरणीय।"
Apr 29
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"मेड़ चलती है सेमर का यह पेड़ मेड़ के इस पार था।'' कैसे पता ?'' उसे मैंने ही बोया था।यह मेरा ही खेत है।''फिर यह उधर कैसे चला गया?'' समय लगा है इसमें। मेड़ उधर से धीरे धीरे खिसकी है। पहले वह पेड़ से मिली,फिर…"
Apr 29
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-71
"वह तब से भाग रहा है;कभी पेट की खातिर,तो कभी इज्जत की खातिर।जाने कब तक भागेगा,पता नहीं।भरे पूरे घर के लोग यही चर्चा कर रहे हैं। वह भागता भागता अकस्मात उनके सामने आ जाता है।लोग रास्ता देने लगते हैं,पर वह ठहर जाता है। ' क्यों भई?आगे बढ़ जा।।'…"
Feb 28
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Manan Kumar singh's blog post लघुकथा(आजादी)
"आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन । अच्छी कथा हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Jan 12
Samar kabeer commented on Manan Kumar singh's blog post लघुकथा(आजादी)
"जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब, अच्छी लघुकथा हुई है, बधाई स्वीकार करें I"
Jan 12
Manan Kumar singh posted a blog post

लघुकथा(आजादी)

' आजादी के झंडे बिक रहे हैं।'' पिछले साल वाले भी?'' क्या?'' महकमों के पुराने झंडे नये दाम में बिकते हैं। बिल बन जाती ।'' जाने दो।आजादी का जश्न है,धूम से मने।'' मिलेगी कब?'' अबे बुरबक! कब की मिल चुकी, सन सैंतालीस में।''सरकारी राशन का पर्याय बनी जिंदगी,मिलावट का जहर और आदमी का खून पीता आदमी!यही आजादी है?'"मौलिक व अप्रकाशित"See More
Jan 10
Samar kabeer commented on Manan Kumar singh's blog post आका (लघुकथा)
"जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।"
Dec 10, 2020

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Male
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E 52 Krishna Apt , Patna
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लघुकथा(आजादी)

' आजादी के झंडे बिक रहे हैं।'

' पिछले साल वाले भी?'

' क्या?'

' महकमों के पुराने झंडे नये दाम में बिकते हैं। बिल बन जाती ।'

' जाने दो।आजादी का जश्न है,धूम से मने।'

' मिलेगी कब?'

' अबे बुरबक! कब की मिल चुकी, सन सैंतालीस में।'

'सरकारी राशन का पर्याय बनी जिंदगी,मिलावट का जहर और आदमी का खून पीता आदमी!यही आजादी है?'

"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on January 10, 2021 at 9:09am — 2 Comments

आका (लघुकथा)

फसल की बालियां,डालियां और पत्तियां आपस में बातें कर रही थीं।

' हम फल हैं।जीवन का पर्याय हैं।' बालियां इतरा कर कह रही थीं।

' हम भोजन  न बनाएं,तो सारी हेकड़ी धरी की धरी रह जायेगी।' पत्तियों ने आंखें तरे ड़ कर कहा।

' वाह वाह! क्या कहने! गर हम तुम्हें न संभालें तो फिर क्या हो?' डालियां जरा  मौज में झूमकर बोलीं।

' ठहरो,ठहरो।हमें असमय सूखने पर मजबूर न करो।हम अभी नाजुक दौर में हैं।' बालियों और पत्तियों की सम्मिलित आर्त ध्वनियां गूंजने लगीं।

जड़ और तने एक दूसरे को…

Continue

Posted on December 4, 2020 at 11:00pm — 2 Comments

लेडी डॉक्टर(लघुकथा)

माधवी पटना की लेडी डॉक्टर से मिलकर बाहर आते ही पति से बोली,' यह ओवरी वाला क्या चक्कर था मधुप?'
' बकवास ही समझो '
' वाकई दोनों ओवरी बराबर आकार की होती है?छपरा वाली डॉक्टरनी बोली थी।'
' नहीं होती।मैंने अपने दोस्त डॉक्टरों से सलाह की थी।' पति बोला।
' फिर वह मुई ऑपरेशन किस चीज का करती?'
' पता नहीं। डोनेशन वाले डॉक्टर - डॉक्टरनी भी तो होते हैं भई।'
' ऐसा?'
'और क्या? यहां सब चलता है।' पति हिकारत भरे लहजे में बोला।
' मौलिक व अप्रकाशित'

Posted on September 26, 2020 at 1:20pm — 1 Comment

हवाओं के झोंके....(गजल)

122 122 122 12

 हवाओं के' झोंके मचलने लगे,

अदाओं के' आंचल सरकने लगे।1

दबे दिल के' कोने में ' जो थे कभी
परत दर परत राज खुलने लगे।2

बसाए फिरे जो जिगर में कभी
हकीकत बताने से बचने लगे।3

कहा था कभी, हम न होंगे जुदा,
मिले ही कहां,अब वो ' कहने लगे।4

नज़ाकत भरे थे जो लमहे कभी,
शरारत जदा आज डंसने लगे।5

"मौलिक व अप्रकाशित"
@

Posted on August 29, 2020 at 4:36pm — 4 Comments

Comment Wall (7 comments)

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At 12:51pm on January 23, 2020, TEJ VEER SINGH said…

जन्म दिन की हार्दिक बधाई एवम शुभ कामनायें आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।

At 2:33pm on September 28, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय मनन कुमार सिंह जी आदाब बहुत शुक्रिया आपने समय निकाला और मेरा हौसला बढ़ाया मैं ह्रदय से शुक्रगुज़ार हूँ| बहुत शुक्रिया!
At 11:05pm on June 27, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय मनन कुमार सिंह जी बहुत शुक्रिया आपने जो हौसला बढ़ाया है
At 11:03pm on September 17, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
आदरणीय
श्री मनन कुमार सिंह जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन
At 8:47pm on May 24, 2015, kanta roy said…
स्वागत आपका दोस्त
At 5:20pm on April 12, 2015, Manan Kumar singh said…
आदरणीय गोपालजी, आपकी मित्रता मेरे लिए अमूल्य है।
At 8:29pm on April 7, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आ0 मनन जी

आपकी मित्रता मेरा गौरव है . सादर .

 
 
 

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