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Naveen Mani Tripathi
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  • Ajay Tiwari
 

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Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'हर इक सू से सदा ए सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।सुना है इस वतन को बेटियां अच्छी नहीं लगतीं' मतले का भाव स्पष्ट नहीं,और ऊला मिसरे में 'सिसकियाँ' हिन्दी भाषा…"
Monday
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल

2122 2122 2122 212कुछ मुहब्बत कुछ शरारत और कुछ धोका रहा ।हर अदा ए इश्क़ का दिल तर्जुमा करता रहा ।।याद है अब तक ज़माने को तेरी रानाइयाँ ।मुद्दतों तक शह्र में चलता तेरा चर्चा रहा ।।पूछिए उस से भी साहिब इश्क़ की गहराइयाँ ।जो किताबों की तरह पढ़ता कोई चहरा रहा ।।वो मेरी पहचान खारिज़ कर गया है शब के बाद ।जो मेरे खाबों में आकर गुफ्तगू करता रहा ।।साजिशें रहबर की थीं या था मुकद्दर का कसूर ।ये मुसाफ़िर रहगुज़र में बारहा लुटता रहा ।।वो परिंदा क्या बताएगा फ़लक की दास्ताँ ।जो कफ़स के दरमियाँ हालात से लड़ता रहा…See More
Monday
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर साहब तहेदिल से बहुत बहुत शुक्रिया"
Monday
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 प्रदीप देवीशरण भट्ट साहब तहेदिल से बहुत बहुत शुक्रिया"
Monday
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 सुशील सरना साहब तहेदिल से बहुत बहुत शुक्रिया।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई नवीन जी, उम्दा गजल हुई है । हार्दिक बधाई।"
Dec 7
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"नवीन जी सम सामयिक अच्छी रचना के लिए बधाई। "ये नीलामी ये पी एस यू का नाटक बंद भी कर दो   हमारे मुल्क में ये चोरियाँ अच्छी नही लगती""
Dec 6
Sushil Sarna commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"हर इक सू से सदा ए सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।सुना है इस वतन को बेटियां अच्छी नहीं लगतीं ।। न जाने कितने क़ातिल घूमते हैं शह्र में तेरे ।यहाँ कानून की खामोशियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।। वाह आज के नंगे यथार्थ को कितनी संजीदगी से आपने अपनी ग़ज़ल में पेश किया…"
Dec 5
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल

ग़ज़लहर इक सू से सदा ए सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।सुना है इस वतन को बेटियां अच्छी नहीं लगतीं ।।न जाने कितने क़ातिल घूमते हैं शह्र में तेरे ।यहाँ कानून की खामोशियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।।सियासत के पतन का देखिये अंजाम भी साहब ।दरिन्दों को मिली जो कुर्सियां अच्छी नहीं लगतीं।।वो सौदागर है बेचेगा यहाँ बुनियाद की ईंटें ।बिकीं जो रेल की सम्पत्तियां अच्छी नहीं लगतीं ।।बिकेगी हर इमारत अब विदेशी बोलियों पर क्या ।तुम्हें तो जगमगाती बस्तियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।।ये नीलामी ये पी एस यू का नाटक बन्द कर दीजै ।हमारे…See More
Dec 4
दिगंबर नासवा commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"एक अच्छा प्रयास है आपका ... मेरी बहुत बधाई ..."
Nov 21
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई शवीन जी, गजल का अच्छा प्रयास हुआ है । हार्दिक बधाई।"
Nov 20
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, तरही ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें । 'नहीं यूँ ही दीवाने आए हरम तक । इशारा तेरा भी हुआ मुख़्तसर है' भाव की दृष्टि से इस शैर के सानी मिसरे में 'भी' शब्द भर्ती का है,और क़ाफ़िया भी उचित…"
Nov 16
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल

122 122 122 122न जाने किधर जा रही ये डगर है ।सुना है मुहब्बत का लम्बा सफर है ।।मेरी चाहतों का हुआ ये असर है ।झुकी बाद मुद्दत के उनकी नज़र है ।।नहीं यूँ ही दीवाने आए हरम तक ।इशारा तेरा भी हुआ मुख़्तसर है ।।यहाँ राजे दिल मत सुनाओ किसी को ।ज़माना कहाँ रह गया मोतबर है ।।है साहिल से मिलने का उसका इरादा ।उठी जो समंदर में ऊंची लहर है ।।है मकतल सा मंजर हटा जब से चिलमन ।बड़ी क़ातिलाना तुम्हारी नज़र है ।।बतातीं हैं बिस्तर की ये सिलवटें अब ।तुम्हें नींद आती नहीं रात भर है ।।वहीं बैठती है वो रंगीन तितली ।गुलों…See More
Nov 15
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल -
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें । 'नियत से आप भी अक्सर फिसल के देखते हैं' इस मिसरे में सहीह शब्द है ''नीयत"22, मिसरा बदलने का प्रयास करें ।"
Nov 9
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल -
"आ. भाई नवीन जी, उम्दा गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Nov 8
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ग़ज़ल -

1212 1122 1212 22/112न पूछिये कि वो कितना सँभल के देखते हैं ।शरीफ़ लोग मुखौटे बदल के देखते हैं ।।अज़ीब तिश्नगी है अब खुदा ही खैर करे ।नियत से आप भी अक्सर फिसल के देखते हैं ।।पहुँच रही है मुहब्बत की दास्ताँ उन तक ।हर एक शेर जो मेरी ग़ज़ल के देखते हैं ।।ज़नाब कुछ तो शरारत नज़र ये करती है ।यूँ बेसबब ही नहीं वो मचल के देखते हैं ।।गुलों का रंग इन्हें किस तरह मयस्सर हो ।ये बागवान तो कलियां मसल के देखते हैं ।।ज़मीर बेच के जिंदा मिले हैं लोग बहुत ।तुम्हारे शह्र में जब भी टहल के देखते है ।।न जाने क्या हुआ जो…See More
Nov 6

Profile Information

Gender
Male
City State
Kanpur , Uttar Pradesh
Native Place
Basti
Profession
Govt. Service
About me
I am a poet and trained astrologer. Write geet and ghazal.

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ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

कुछ मुहब्बत कुछ शरारत और कुछ धोका रहा ।

हर अदा ए इश्क़ का दिल तर्जुमा करता रहा ।।

याद है अब तक ज़माने को तेरी रानाइयाँ ।

मुद्दतों तक शह्र में चलता तेरा चर्चा रहा ।।

पूछिए उस से भी साहिब इश्क़ की गहराइयाँ ।

जो किताबों की तरह पढ़ता कोई चहरा रहा ।।

वो मेरी पहचान खारिज़ कर गया है शब के बाद ।

जो मेरे खाबों में आकर गुफ्तगू करता रहा ।।

साजिशें रहबर की थीं या था मुकद्दर का कसूर ।

ये मुसाफ़िर…

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Posted on December 9, 2019 at 12:33am

ग़ज़ल

ग़ज़ल

हर इक सू से सदा ए सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।

सुना है इस वतन को बेटियां अच्छी नहीं लगतीं ।।

न जाने कितने क़ातिल घूमते हैं शह्र में तेरे ।

यहाँ कानून की खामोशियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।।

सियासत के पतन का देखिये अंजाम भी साहब ।

दरिन्दों को मिली जो कुर्सियां अच्छी नहीं लगतीं।।

वो सौदागर है बेचेगा यहाँ बुनियाद की ईंटें ।

बिकीं जो रेल की सम्पत्तियां अच्छी नहीं लगतीं ।।

बिकेगी हर इमारत…

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Posted on December 4, 2019 at 2:02am — 7 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 122

न जाने किधर जा रही ये डगर है ।

सुना है मुहब्बत का लम्बा सफर है ।।

मेरी चाहतों का हुआ ये असर है ।

झुकी बाद मुद्दत के उनकी नज़र है ।।

नहीं यूँ ही दीवाने आए हरम तक ।

इशारा तेरा भी हुआ मुख़्तसर है ।।

यहाँ राजे दिल मत सुनाओ किसी को ।

ज़माना कहाँ रह गया मोतबर है ।।

है साहिल से मिलने का उसका इरादा ।

उठी जो समंदर में ऊंची लहर है ।।

है मकतल सा मंजर हटा जब से चिलमन…

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Posted on November 14, 2019 at 5:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल -

1212 1122 1212 22/112

न पूछिये कि वो कितना सँभल के देखते हैं ।

शरीफ़ लोग मुखौटे बदल के देखते हैं ।।

अज़ीब तिश्नगी है अब खुदा ही खैर करे ।

नियत से आप भी अक्सर फिसल के देखते हैं ।।

पहुँच रही है मुहब्बत की दास्ताँ उन तक ।

हर एक शेर जो मेरी ग़ज़ल के देखते हैं ।।

ज़नाब कुछ तो शरारत नज़र ये करती है ।

यूँ बेसबब ही नहीं वो मचल के देखते हैं ।।

गुलों का रंग इन्हें किस तरह मयस्सर हो…

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Posted on November 6, 2019 at 2:51pm — 2 Comments

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At 11:34am on September 29, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय नवीन मणी त्रिपाठी जी ग़ज़ल तक आने का शुक्रिया आपने समय निकला इसके लिए ह्रदय से शुक्रगुज़ार हूँ हौसला बढ़ने का बहुत बहुत शुक्रिया!
At 10:44am on May 8, 2019, TEJ VEER SINGH said…

जन्मदिन की हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी साहब जी।

At 6:32am on August 5, 2018, Kishorekant said…

लाजवाब रचना केलिये आपको बहुत बहुत बधाइयाँ आदरणीय नविनमणी त्रिपाठी जी  ,

At 2:14am on May 8, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें!

 
 
 

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