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Naveen Mani Tripathi
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  • Ajay Tiwari
 

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अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"डॉ नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें। "अपनी रानाई पे तू मग़रूर है क्या   बेवफ़ाई के लिए मज़बूर है क्या " इस शैर के दोनों मिसरों में कोई रब्त नहीं है, ग़ौर करें। "मजबूर" में नुक़्ता नहीं…"
Jul 11
TEJ VEER SINGH commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि  जी।बेहतरीन गज़ल। मेरा ख़त पढ़के बहुत ख़ामोश है वो ।फैसला   मेरा   उसे  मंजूर  है  क्या ।।"
Jul 11
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल

2122 2122 2122 अपनी  रानाई  पे  तू  मग़रूर  है  क्या । बेवफ़ाई  के  लिए  मज़बूर  है  क्या ।।कम न हो पाये अभी तक फ़ासले भी ।। तू  बता  उल्फ़त  की  दिल्ली  दूर  है क्या ।।दूर तक चर्चा है क़ातिल के हुनर की । वो ज़रा  सी उम्र में मशहूर  है  क्या ।।तोड़ देना दिल किसी का बेसबब ही । शह्र   का   तेरे  नया  दस्तूर  है  क्या ।।ज़ुल्मते शब हो गयी रोशन यहां भी । चाँद का उतरा जमीं पर नूर है क्या ।।हो  रहा  है  हर  तरफ  हंगामा  यारो । आ  गई  महफ़िल  में  कोई  हूर  है क्या ।।जख़्म जो उनसे मिला था चंद दिन में । बन…See More
Jul 11
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई नवीन मणि जी, सादर अभिवादन । सुन्दर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Jul 9
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल

2122 2122 2122 अपनी  रानाई  पे  तू  मग़रूर  है  क्या । बेवफ़ाई  के  लिए  मज़बूर  है  क्या ।।कम न हो पाये अभी तक फ़ासले भी ।। तू  बता  उल्फ़त  की  दिल्ली  दूर  है क्या ।।दूर तक चर्चा है क़ातिल के हुनर की । वो ज़रा  सी उम्र में मशहूर  है  क्या ।।तोड़ देना दिल किसी का बेसबब ही । शह्र   का   तेरे  नया  दस्तूर  है  क्या ।।ज़ुल्मते शब हो गयी रोशन यहां भी । चाँद का उतरा जमीं पर नूर है क्या ।।हो  रहा  है  हर  तरफ  हंगामा  यारो । आ  गई  महफ़िल  में  कोई  हूर  है क्या ।।जख़्म जो उनसे मिला था चंद दिन में । बन…See More
Jul 9
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल-महफ़िल में वो बाहर जब आकर चली गई

हासिल ग़ज़ल221 2121 1221 212बेचैनियों का दौर बढा कर चली गयी ।महफ़िल में वो बहार जब आ कर चली गयी ।।उसकी मुहब्बतों का ये अंदाज़ था नया ।अल्फ़ाज़ दर्दो ग़म के छुपाकर चली गयी।।उसको कहो न बेवफ़ा जो मुश्क़िलात में ।कुछ दूर मेरा साथ निभाकर चली गयी ।।साक़ी भुला सका न उसे चाहकर भी मैं ।जो मैक़दे में जाम पिलाकर चली गयी ।।हैरां थी मुझ में देख के चाहत का ये शबाब ।दांतों तले जो उँगली दबा कर चली गयी ।।मैं भूल जाऊं कैसे तुम्हारीअना को यार।जो आशियाँ में आग लगा कर चली गयी ।।मुद्दत के बाद आई थी मिलने वो एक बार ।नजरें हया…See More
Jun 18
Ravi Shukla commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय नवीन मणि  जी अक्ष्‍छी गजल हुई बधाई "
Jun 16
TEJ VEER SINGH commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी। बेहतरीन गज़ल। उसी के हक़ की यहां रोटियां नदारद हैं ।जो अपने ख़ून पसीने से पेट भरता है ।।3 न घर से उठ सकी ईमानदार की अर्थी ।ये किस के साथ खड़ा देखिए ज़माना है ।।8"
Jun 13
Dimple Sharma commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन'शाहिद'जी नमस्ते , एक सवाल था जैसा की आपने इस बहर के विषय में बताया तीसरी छूट के अनुसार एक लघु अलग से ले सकते हैं तो मेरा सवाल है कि क्या ये हर मिसरे पर कर सकते हैं या पूरी ग़ज़ल के एक ही मिसरे पर ये छूट है ? कृप्या…"
Jun 13
Dimple Sharma commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय नवीन जी नमस्ते ,इस खुबसूरत ग़ज़ल पर बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें ।"
Jun 13
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । जनाब रवि जी से सहमत हूँ,मगर आप सुधार कम ही करते हैं ।"
Jun 12
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Naveen Mani Tripathi साहिब, इस लाजवाब ग़ज़ल पर दाद और मुबारकबाद स्वीकार करें। /निकल पड़े न किसी दिन सितम की हद पर वो ।जो अश्क़ मैंने अभी तक सँभाल रक्खा है ।।5/आदरणीय, इस शे'र के मिस्रा-ए-ऊला के लिए एक सुझाव देना चाहूँगा, अगर आप को…"
Jun 12
Dimple Sharma commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"नमस्ते आदरणीय, बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई बधाई स्वीकार करें ।"
Jun 11
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी, आदाब।  शानदार ग़ज़ल हुई है। बधाई स्वीकार करें। शेअ'र नं 6 में आख़िरी अक्षर टाईप होने से रह गया है। दुरूस्त कर लें। "
Jun 11
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल

1212 1122 1212 22यूँ उसके हुस्न पे छाया शबाब धोका है ।।1मेरी नज़र ने जिसे बार बार देखा है ।।वफ़ा-जफ़ा की कहानी से ये हुआ हासिल।था जिसपे नाज़ वो सिक्का हूजूर खोटा है ।।2उसी के हक़ की यहां रोटियां नदारद हैं ।जो अपने ख़ून पसीने से पेट भरता है ।।3खुला है मैकदा कोई सियाह शब में क्या ।हमारे शह्र में हंगामा आज बरपा है ।।4निकल पड़े न किसी दिन सितम की हद पर वो ।जो अश्क़ मैंने अभी तक सँभाल रक्खा है ।।5मिले हैं फूल किताबों में आज फिर यारो ।पता करें ये मुहब्बत का काम किसका ।।6अब उनके बारे में चर्चा तमाम क्या करना…See More
Jun 11
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई नवीन जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Jun 9

Profile Information

Gender
Male
City State
Kanpur , Uttar Pradesh
Native Place
Basti
Profession
Govt. Service
About me
I am a poet and trained astrologer. Write geet and ghazal.

Naveen Mani Tripathi's Blog

ग़ज़ल

2122 2122 2122

अपनी  रानाई  पे  तू  मग़रूर  है  क्या ।

बेवफ़ाई  के  लिए  मज़बूर  है  क्या ।।

कम न हो पाये अभी तक फ़ासले भी ।।

तू  बता  उल्फ़त  की  दिल्ली  दूर  है क्या ।।

दूर तक चर्चा है क़ातिल के हुनर की ।

वो ज़रा  सी उम्र में मशहूर  है  क्या ।।

तोड़ देना दिल किसी का बेसबब ही ।

शह्र   का   तेरे  नया  दस्तूर  है  क्या ।।…

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Posted on July 9, 2020 at 3:00pm — 3 Comments

ग़ज़ल-महफ़िल में वो बाहर जब आकर चली गई

हासिल ग़ज़ल

221 2121 1221 212

बेचैनियों का दौर बढा कर चली गयी ।

महफ़िल में वो बहार जब आ कर चली गयी ।।

उसकी मुहब्बतों का ये अंदाज़ था नया ।

अल्फ़ाज़ दर्दो ग़म के छुपाकर चली गयी।।

उसको कहो न बेवफ़ा जो मुश्क़िलात में ।

कुछ दूर मेरा साथ निभाकर चली गयी ।।

साक़ी भुला सका न उसे चाहकर भी मैं ।

जो मैक़दे में जाम पिलाकर चली गयी ।।

हैरां थी मुझ में देख के चाहत का ये शबाब…

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Posted on June 18, 2020 at 1:37pm

ग़ज़ल

1212 1122 1212 22

यूँ उसके हुस्न पे छाया शबाब धोका है ।।1

मेरी नज़र ने जिसे बार बार देखा है ।।



वफ़ा-जफ़ा की कहानी से ये हुआ हासिल।

था जिसपे नाज़ वो सिक्का हूजूर खोटा है ।।2

उसी के हक़ की यहां रोटियां नदारद हैं ।

जो अपने ख़ून पसीने से पेट भरता है ।।3

खुला है मैकदा कोई सियाह शब में क्या ।

हमारे शह्र में हंगामा आज बरपा है ।।4

निकल पड़े न किसी दिन सितम की हद पर वो ।

जो अश्क़ मैंने अभी तक सँभाल रक्खा है…

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Posted on June 10, 2020 at 9:06pm — 6 Comments

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

दिल सलामत भी नहीं और ये टूटा भी नहीं ।

दर्द बढ़ता ही गया ज़ख़्म कहीं था भी नहीं ।।

काश वो साथ किसी का तो निभाया होता ।

क्या भरोसा करें जो शख़्स किसी का भी नहीं ।।

क़त्ल का कैसा है अंदाज़ ये क़ातिल जाने ।

कोई दहशत भी नहीं है कोई चर्चा भी नहीं ।।

मैकदे में हैं तेरे रिंद तो ऐसे साक़ी ।

जाम पीते भी नही और कोई तौबा भी नहीं ।।

सोचते रह गए इज़हारे मुहब्बत होगा ।

काम आसां है मगर आपसे होता भी नहीं…

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Posted on June 7, 2020 at 10:00am — 10 Comments

Comment Wall (6 comments)

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At 10:37pm on May 11, 2020, Naveen Mani Tripathi said…

आ0 मिथिलेश वामनकर साहब

आ0 किशोर कान्त साहब

आ0तेजवीर सिंह साहब

आ0 दण्ड पाणि नाहक साहब

आप सभी आदरणीय को तहेदिल से शुक्रिया और नमन ।

At 12:06pm on May 8, 2020, TEJ VEER SINGH said…

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी को जन्म दिन की हार्दिक बधाई एवम असीमित शुभ कामनायें। ईश्वर सदैव सुख, शाँति और समृद्धि प्रदान करें। स्वस्थ रहें। दीर्घायु बनें।जीवन में हमेशा उन्नति के पथ पर अग्रसर रहें।

At 11:34am on September 29, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय नवीन मणी त्रिपाठी जी ग़ज़ल तक आने का शुक्रिया आपने समय निकला इसके लिए ह्रदय से शुक्रगुज़ार हूँ हौसला बढ़ने का बहुत बहुत शुक्रिया!
At 10:44am on May 8, 2019, TEJ VEER SINGH said…

जन्मदिन की हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी साहब जी।

At 6:32am on August 5, 2018, Kishorekant said…

लाजवाब रचना केलिये आपको बहुत बहुत बधाइयाँ आदरणीय नविनमणी त्रिपाठी जी  ,

At 2:14am on May 8, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें!

 
 
 

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