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Naveen Mani Tripathi
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  • Ajay Tiwari
 

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Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें । 'अभी चुनाव का आया रुझान थोड़ी है' इस मिसरे में क़ाफ़िया ग़लत है,सहीह शब्द है "रुजहान", देखियेगा ।"
Dec 24, 2019
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'कुछ तो भेजी खुदा ने  आफ़त है ।ये  तबस्सुम  है  या  क़यामत  है' इस मतले के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,देखियेगा ।"
Dec 24, 2019
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल

1212 1122 1212 22हमारे इल्म  का  वो  क़द्रदान  थोड़ी है । हमें  दे  रोटियां  कोई  महान  थोड़ी है ।।उसे है बेचना हर ईंट इस इमारत की । हुज़ूर मुफ़्त में वो मिह्रबान थोड़ी है ।।विकास सब का हो और साथ भी रहे सबका । ये राजनीति है पक्की ज़ुबान थोड़ी है ।।लुढ़क रहे हैं ख़ज़ाने ये फ़िक्र कौन करे । नज़र में उनके अभी तक ढ़लान थोड़ी है ।।बदल गया है बहुत कुछ यहां सँभल के चलो । पुराना वाला ये हिंदोस्तान थोड़ी है ।।मशीन वोट की कर देगी फैसला हक़ में । तुम्हारे हाथ में सारी कमान थोड़ी है ।।बहा ले…See More
Dec 17, 2019
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल

2122 1212 22. मत  कहो  आप  दौरे   गुरबत   है । चश्मेतर  हूँ  ये   वक्ते  फुरकत  है ।।कुछ तो भेजी खुदा ने  आफ़त है । ये  तबस्सुम  है  या  क़यामत  है ।।उसकी किस्मत को दाद  देता  हूँ । जिसको हासिल तुम्हारी कुर्बत है ।।अलविदा  मत  कहें  हुजूर  अभी । बज़्म   को  आपकी  ज़रूरत  है ।।इश्क़  में  क्या  बताऊँ  मैं  तुमको । थोड़ी  उल्फ़त है बाकी तुहमत है ।।ख्वाहिशें सबकी अपनी अपनी हैं । हाशिये   पर  यहाँ   मुहब्बत   है ।।कैसे आज़ाद  कह  दूं मैं  खुद को । दिल पे अब  तक  तेरी हुक़ूमत है ।। फिक्र  मुझको  रक़ीब…See More
Dec 16, 2019
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'हर इक सू से सदा ए सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।सुना है इस वतन को बेटियां अच्छी नहीं लगतीं' मतले का भाव स्पष्ट नहीं,और ऊला मिसरे में 'सिसकियाँ' हिन्दी भाषा…"
Dec 9, 2019
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल

2122 2122 2122 212कुछ मुहब्बत कुछ शरारत और कुछ धोका रहा ।हर अदा ए इश्क़ का दिल तर्जुमा करता रहा ।।याद है अब तक ज़माने को तेरी रानाइयाँ ।मुद्दतों तक शह्र में चलता तेरा चर्चा रहा ।।पूछिए उस से भी साहिब इश्क़ की गहराइयाँ ।जो किताबों की तरह पढ़ता कोई चहरा रहा ।।वो मेरी पहचान खारिज़ कर गया है शब के बाद ।जो मेरे खाबों में आकर गुफ्तगू करता रहा ।।साजिशें रहबर की थीं या था मुकद्दर का कसूर ।ये मुसाफ़िर रहगुज़र में बारहा लुटता रहा ।।वो परिंदा क्या बताएगा फ़लक की दास्ताँ ।जो कफ़स के दरमियाँ हालात से लड़ता रहा…See More
Dec 9, 2019
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर साहब तहेदिल से बहुत बहुत शुक्रिया"
Dec 9, 2019
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 प्रदीप देवीशरण भट्ट साहब तहेदिल से बहुत बहुत शुक्रिया"
Dec 9, 2019
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 सुशील सरना साहब तहेदिल से बहुत बहुत शुक्रिया।"
Dec 9, 2019
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई नवीन जी, उम्दा गजल हुई है । हार्दिक बधाई।"
Dec 7, 2019
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"नवीन जी सम सामयिक अच्छी रचना के लिए बधाई। "ये नीलामी ये पी एस यू का नाटक बंद भी कर दो   हमारे मुल्क में ये चोरियाँ अच्छी नही लगती""
Dec 6, 2019
Sushil Sarna commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"हर इक सू से सदा ए सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।सुना है इस वतन को बेटियां अच्छी नहीं लगतीं ।। न जाने कितने क़ातिल घूमते हैं शह्र में तेरे ।यहाँ कानून की खामोशियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।। वाह आज के नंगे यथार्थ को कितनी संजीदगी से आपने अपनी ग़ज़ल में पेश किया…"
Dec 5, 2019
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल

ग़ज़लहर इक सू से सदा ए सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।सुना है इस वतन को बेटियां अच्छी नहीं लगतीं ।।न जाने कितने क़ातिल घूमते हैं शह्र में तेरे ।यहाँ कानून की खामोशियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।।सियासत के पतन का देखिये अंजाम भी साहब ।दरिन्दों को मिली जो कुर्सियां अच्छी नहीं लगतीं।।वो सौदागर है बेचेगा यहाँ बुनियाद की ईंटें ।बिकीं जो रेल की सम्पत्तियां अच्छी नहीं लगतीं ।।बिकेगी हर इमारत अब विदेशी बोलियों पर क्या ।तुम्हें तो जगमगाती बस्तियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।।ये नीलामी ये पी एस यू का नाटक बन्द कर दीजै ।हमारे…See More
Dec 4, 2019
दिगंबर नासवा commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"एक अच्छा प्रयास है आपका ... मेरी बहुत बधाई ..."
Nov 21, 2019
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई शवीन जी, गजल का अच्छा प्रयास हुआ है । हार्दिक बधाई।"
Nov 20, 2019
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, तरही ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें । 'नहीं यूँ ही दीवाने आए हरम तक । इशारा तेरा भी हुआ मुख़्तसर है' भाव की दृष्टि से इस शैर के सानी मिसरे में 'भी' शब्द भर्ती का है,और क़ाफ़िया भी उचित…"
Nov 16, 2019

Profile Information

Gender
Male
City State
Kanpur , Uttar Pradesh
Native Place
Basti
Profession
Govt. Service
About me
I am a poet and trained astrologer. Write geet and ghazal.

Naveen Mani Tripathi's Blog

ग़ज़ल

1212 1122 1212 22

हमारे इल्म  का  वो  क़द्रदान  थोड़ी है ।

हमें  दे  रोटियां  कोई  महान  थोड़ी है ।।

उसे है बेचना हर ईंट इस इमारत की ।

हुज़ूर मुफ़्त में वो मिह्रबान थोड़ी है ।।

विकास सब का हो और साथ भी रहे सबका ।

ये राजनीति है पक्की ज़ुबान थोड़ी है ।।

लुढ़क रहे हैं ख़ज़ाने ये फ़िक्र कौन करे…

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Posted on December 17, 2019 at 2:49pm — 1 Comment

ग़ज़ल

2122 1212 22

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मत  कहो  आप  दौरे   गुरबत   है ।

चश्मेतर  हूँ  ये   वक्ते  फुरकत  है ।।

कुछ तो भेजी खुदा ने  आफ़त है ।

ये  तबस्सुम  है  या  क़यामत  है ।।

उसकी किस्मत को दाद  देता  हूँ ।

जिसको हासिल तुम्हारी कुर्बत है ।।

अलविदा  मत  कहें  हुजूर  अभी ।

बज़्म   को  आपकी  ज़रूरत  है ।।

इश्क़  में  क्या …

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Posted on December 16, 2019 at 12:30pm — 1 Comment

ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

कुछ मुहब्बत कुछ शरारत और कुछ धोका रहा ।

हर अदा ए इश्क़ का दिल तर्जुमा करता रहा ।।

याद है अब तक ज़माने को तेरी रानाइयाँ ।

मुद्दतों तक शह्र में चलता तेरा चर्चा रहा ।।

पूछिए उस से भी साहिब इश्क़ की गहराइयाँ ।

जो किताबों की तरह पढ़ता कोई चहरा रहा ।।

वो मेरी पहचान खारिज़ कर गया है शब के बाद ।

जो मेरे खाबों में आकर गुफ्तगू करता रहा ।।

साजिशें रहबर की थीं या था मुकद्दर का कसूर ।

ये मुसाफ़िर…

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Posted on December 9, 2019 at 12:33am

ग़ज़ल

ग़ज़ल

हर इक सू से सदा ए सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।

सुना है इस वतन को बेटियां अच्छी नहीं लगतीं ।।

न जाने कितने क़ातिल घूमते हैं शह्र में तेरे ।

यहाँ कानून की खामोशियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।।

सियासत के पतन का देखिये अंजाम भी साहब ।

दरिन्दों को मिली जो कुर्सियां अच्छी नहीं लगतीं।।

वो सौदागर है बेचेगा यहाँ बुनियाद की ईंटें ।

बिकीं जो रेल की सम्पत्तियां अच्छी नहीं लगतीं ।।

बिकेगी हर इमारत…

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Posted on December 4, 2019 at 2:02am — 7 Comments

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At 11:34am on September 29, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय नवीन मणी त्रिपाठी जी ग़ज़ल तक आने का शुक्रिया आपने समय निकला इसके लिए ह्रदय से शुक्रगुज़ार हूँ हौसला बढ़ने का बहुत बहुत शुक्रिया!
At 10:44am on May 8, 2019, TEJ VEER SINGH said…

जन्मदिन की हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी साहब जी।

At 6:32am on August 5, 2018, Kishorekant said…

लाजवाब रचना केलिये आपको बहुत बहुत बधाइयाँ आदरणीय नविनमणी त्रिपाठी जी  ,

At 2:14am on May 8, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें!

 
 
 

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