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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"
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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Page

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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post अतुकांत कविता : आजादी (गणेश बाग़ी)
"आदरणीय बागी सर.........रचना को ओबीओ के सौहार्द के निमित्त मंच से हटा कर आपने बहुत उत्तम कार्य किया है। चूँकि भावनाएँ ही हैं जो हमें एक दूसरे से जोड़ती हैं...अतः आपका यह निर्णय स्वागत योग्य है। हाँ एक बात है कि मैंने एक मुक्तक, इस प्रकरण का ज्ञान…"
Feb 7
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post अतुकांत कविता : आजादी (गणेश बाग़ी)
"आदरणीय नवीन सर, सहिष्णुता ही अपेक्षित है......सादर"
Feb 4
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post अतुकांत कविता : आजादी (गणेश बाग़ी)
"आदरणीय नवीन त्रिपाठी जी 1. आप यह सुझाव देने को स्वतंत्र हैं कि ओबीओ मंच पर साम्प्रदायिक प्रहार करने वाली रचना न भेजी जाए, किन्तु 2. क्या भेजी जाए इसका सुझाव अनुचित है, क्योंकि 3. यह रचनाकार की निजी स्वतंत्रता का हनन है, यह उसकी मर्जी वह किन…"
Feb 4
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post अतुकांत कविता : आजादी (गणेश बाग़ी)
"इस रचना पर श्रेष्ठजनों के विचारों के बीच उपस्थित हूँ... 1. ओबीओ मंच की अपनी परम्परा सबसे महत्वपूर्ण है 2. हमें अपने बच्चों को सुधारना चाहिए......न कि पड़ोसी के बच्चे को.....बेहतर यह होता है कि हम अपनी कमियों की ओर ध्यान दें.......पर धर्म की कमियों…"
Feb 3
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

ईंटा पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा---ग़ज़ल

22 22 22 22 22 22 2 ईंटें पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगासुन; तेरे शीशे के घर पर सब बरसाऊँगाफूँक-फाँक कर वर्ग विभाजन वाला हर अध्यायक्या है सनातन सब को यह अहसास कराऊँगाजान रहा, जग की रानी है मुद्रा-माया धारीकिन्तु मनुज से प्रीत ज़रूरी रोज़ सिखाऊँगामठ अधिपति को पूज रहे, जबकि नहीं हो निर्बलवायु-अनल से युक्त बली हो, याद धराऊँगातीव्र प्रज्ज्वलित शब्द हैं मेरे ताप भयंकर हैकिंतु स्वर्ण-मन-शोधन को मैं यूँ ही जलाऊँगामौलिक अप्रकाशित See More
Jan 23
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Saurabh Pandey's blog post ग़ज़ल - पत्थरों से रही शिकायत कब ? // --सौरभ
"आदरणीय अग्रज को सादर प्रणाम  एक बहुत मारक गजल से मंच को जाग्रत करने के लिए बहुत साधुवाद  अब दिखेगी भला कभी हममें..आपसी वो हया जो थी हममें ?...................जनता भी अब बोल रही है, उनको बस यह खलता है        …"
Jan 22
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Saurabh Pandey's blog post ग़ज़ल - पत्थरों से रही शिकायत कब ? // --सौरभ
"आदरणीय अग्रज को सादर प्रणाम  एक बहुत मारक गजल से मंच को जाग्रत करने के लिए बहुत साधुवाद  अब दिखेगी भला कभी हममें.. आपसी वो हया जो थी हममें ?...................जनता भी अब बोल रही है, उनको बस यह खलता है तुष्टिकरण विष-फसल उगा कर जिनका धंधा…"
Jan 22
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post तू भी निजाम नित नया मत अब कमाल कर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"पर्दा बहुत सलीके से मकसद पे डाल कर वो लाये सबको देखिए घर से निकाल कर।१। कितना अहित किया है यूँ अपने ही देश का लोगों ने उसके नाम  पर  पत्थर उछाल कर।२। बहुत खूब सर "
Jan 22
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post इच्छाओं का भार नहीं धर----ग़ज़ल
"आदरणीय बाउजी समर कबीर आदरणीय अग्रज सौरभ पांडे जी आप दोनों का भी इस गजल को आशीर्वाद नहीं मिला "
Jan 22
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post ईंटा पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा---ग़ज़ल
"आदरणीय लक्ष्मण सर बहुत बहुत आभार"
Sep 26, 2019
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post ईंटा पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा---ग़ज़ल
"आ. भाई पंकज जी, सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई ।"
Sep 19, 2019
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post ईंटा पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा---ग़ज़ल
"अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें । ईंटा पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा' इस मिसरे में 'ईंटा' को "ईंटें" कर लें ।"
Sep 10, 2019
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post आईना टूट न जाए मग़र ये ध्यान रहे----------ग़ज़ल
"आदरणीय बाऊजी प्रणाम सुधारता हूँ"
Sep 9, 2019
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post आईना टूट न जाए मग़र ये ध्यान रहे----------ग़ज़ल
"अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'यूँ ही मुनियों नें विधाता नहीं लिखा तुम कोशेष जब कुछ न रहे तब भी तू नदान रहे' इस शैर में शुतरगुरबा दोष देखें "
Sep 7, 2019

Profile Information

Gender
Male
City State
Azamgarh
Native Place
Azamgarh
Profession
Teaching

Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog

ईंटा पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा---ग़ज़ल

22 22 22 22 22 22 2 

ईंटें पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा

सुन; तेरे शीशे के घर पर सब बरसाऊँगा

फूँक-फाँक कर वर्ग विभाजन वाला हर अध्याय

क्या है सनातन सब को यह अहसास कराऊँगा

जान रहा, जग की रानी है मुद्रा-माया धारी

किन्तु मनुज से प्रीत ज़रूरी रोज़ सिखाऊँगा

मठ अधिपति को पूज रहे, जबकि नहीं हो निर्बल

वायु-अनल से युक्त बली हो, याद धराऊँगा

तीव्र प्रज्ज्वलित शब्द हैं मेरे ताप भयंकर है

किंतु स्वर्ण-मन-शोधन को मैं…

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Posted on September 9, 2019 at 11:00am — 2 Comments

आईना टूट न जाए मग़र ये ध्यान रहे----------ग़ज़ल

2122 1122 1212 112

तुम हसीं हो ये भले ही तुम्हें गुमान रहे

आईना टूट न जाए मग़र ये ध्यान रहे

पाँव मन्ज़िल की तरफ रख सँभल सँभल के ज़रा

एक दिल भी है तेरी राह में ये ध्यान रहे

तू ज़माने से रहे बे-ख़बर नहीं कहता

किन्तु इस दिल के भजन पर भी तेरा कान रहे

तेरी साँसों के हर-इक गीत में रहूँ शामिल

ताल सुर नाद ये पंकज ही तेरी तान रहे

पूछ मत नींद सुकूँ का हिसाब आशिक़ से

आशिक़ी कैसी अगर ध्यान में ज़ियान…

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Posted on August 29, 2019 at 9:30am — 2 Comments

तुम मेरे ख़ाबों के गुलशन में मिलो------ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

तुम मेरे ख़ाबों के गुलशन में रहो हक़ है तुम्हें

मुझ से जब चाहो ख़यालों में मिलो हक़ है तुम्हें

तुम को तकने की ख़ता, नींदें गँवाने की सज़ा

बदला आँखों से मेरी ऐसे ही लो हक़ है तुम्हें

बस तुम्हारा नाम हर पल जप रहा है मेरा दिल

मेरे सीने से लगो तुम भी सुनो हक़ है तुम्हें

कल्पना के व्योम में जितना मेरा विस्तार है

वह क्षितिज पूरा तुम्हारा, तुम उड़ो हक़ है तुम्हें

शब्द सारे भाव हर लय ताल…

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Posted on August 6, 2019 at 10:45am — 8 Comments

हर नफ़र इस शह्र का कुछ इस तरह बस जी रहा--------ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

लड़खड़ाती साँस डगमग आस व्याकुल मन सदा

हर नफ़र इस शह्र का कुछ इस तरह बस जी रहा

अनगिनत सपने सजा कर, चाहते निंदिया नयन

रात भर बेचैनियों की, है ग़ज़ब देखो प्रथा

पत्थर-ओ-फ़ौलाद की दीवारें मुझ को चुभ रहीं

आप यदि अपने महल में खुश हैं फिर तो वाह वा

सृष्टि की हर एक रचना का अलग इक सत्य है

कैसे लिख दूँ एक है व्यवहार जल औ आग का

फूल की डाली कली से फुसफुसा कर कह गई

ओढ़ ले काँटे सुरक्षा का यही है…

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Posted on July 25, 2019 at 4:00pm — 4 Comments

Comment Wall (7 comments)

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At 10:57am on August 24, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय पंकज कुमार मिश्रा जी आदाब बहुत बहुत शुक्रिया
At 1:01am on August 7, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय पंकज कुमार मिश्रा जी आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें
At 4:23pm on February 28, 2016, kanta roy said…

स्वागत आपका तहेदिल आदरणीय पंकज जी।  

At 6:34pm on October 26, 2015, kanta roy said…

महीने के सक्रीय सदस्य चुने जाने के इस गौरव पल के  लिए ढेरों बधाई आपको आदरणीय पंकज जी।  

At 11:27pm on October 15, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

पंकज कुमार मिश्रा 'वात्स्यायन' जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
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सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 5:35pm on August 7, 2015, Ravi Shukla said…

स्‍वागत है पंकज जी आपका

At 11:39am on July 26, 2015, Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" said…
सभी लोगों का सादर अभिवादन
 
 
 

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