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प्रदीप देवीशरण भट्ट
  • Male
  • हैदराबाद (तेलांगाना)
  • India
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प्रदीप देवीशरण भट्ट's Page

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प्रदीप देवीशरण भट्ट posted a blog post

सहर हो जाएगा

जिस्म तो नश्वर है, ये मिट जाएगाप्रेम पर अपना अमर हो जाएगा सोच मत खोया क्या तूने है यहाँएक लम्हा भी दहर हो जाएगा माना ये छोटा है पर धीरज तो धरबीज एक दिन ये शजर हो जाएगा भाग्य में जितना लिखा था मिल गयाअपना इसमें भी गुजर हो जाएगा जीस्त बेफिक्री में काटी है मगरमौत का उस पर असर हो जाएगा तिरगी से डर के क्यूँ रहना भलाआज या फ़िर कल सहर हो जाएगा सीख कुछ मेरे तजरबे से ‘प्रदीप’वरना तू भी दर बदर हो जाएगा                     मौलिक व अप्रकाशित…See More
yesterday
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post हम पंछी भारत के
"आद0 प्रदीप देवी शरण भट्ट जी सादर अभिवादन। इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार कीजिये"
yesterday
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post हम पंछी भारत के
"शुक्रिया समर जी"
Thursday
Samar kabeer commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post हम पंछी भारत के
"जनाब प्रदीप देवीशरण भट्ट जी आदाब,ग़ज़ल शिल्प,व्याकरण,बह्र,क़वाफ़ी पर अभी समय चाहती है,बहरहाल इसप्रस्तुति पर बधाई लें ।"
Monday
प्रदीप देवीशरण भट्ट posted a blog post

हम पंछी भारत के

जो हैं भूखे यहाँ ठहर जाएँशेष सब संग संग उड़ जाएँकमी नहीं यहाँ पे दानों क़ीहो जो बरसात मेरे घर आएँपेट भरता है चंद दानों सेफ़िर क्यूँ सहरा में घूमने जाएँलोग भारत के बहुत अच्छे हैंख़ुद से पहिले हमें हैं खिलवाएँमार कंकर भगाते हैं बच्चेफिर वही प्यार से हैं बुलावाएँप्रचंड गर्मी में जब तडपते हैंपानी हमको यहीं हैं पिलवाएँखेत खलिहान सौंधी सी ख़ुशबूछोड़ मिट्टी क़ो 'दीप' क्यूँ जाएँ. मौलिक व अप्रकाशित-प्रदीप देवीशरण भट्ट - 08:01:2020See More
Monday
Bhupender singh ranawat commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post मनुष्य और पयोनिधि
"Shandaar rachna"
Monday
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अमर प्रेम
"समर जी शुक्रिया, मैं अवश्य सज्ञांन (देखिए फिर गडबड हो गई) लूगाँ।"
Jan 9
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अमर प्रेम
"शुक्रिया सुरेंद्र जी"
Jan 9
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अमर प्रेम
"शुक्रिया लक्ष्मण जी, फोंट की ज़बरदस्त समस्या है टाइप करते करते अपने बदल जाता है, सुझाव के शुक्रिया"
Jan 9
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अहसास
"समर जी आभार आपका"
Jan 9
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अहसास
"शुक्रिया लक्ष्मण जी"
Jan 9
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अहसास
"शुक्रिया सुरेंद्र जी"
Jan 9
Samar kabeer commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अहसास
"जनब प्रदीप जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Jan 9
Samar kabeer commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अमर प्रेम
"जनाब प्रदीप जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें । जननब लक्ष्मण धामी जी की बात का संज्ञान लें । 'इससे पहले के तुम दर्पण निहारों' इस पंक्ति में 'निहारों' को "निहारो" कर लें । 'तुम्हें गाकर के मैं लोरी सुला…"
Jan 9
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post मनुष्य और पयोनिधि
"आ. भाई प्रदीप देवीशरण जी, रचना के 'फीचर्ड' होने पर हार्दिक बधाई ।"
Jan 9
Samar kabeer commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post मनुष्य और पयोनिधि
"जनाब प्रदीप जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Jan 9

Profile Information

Gender
Male
City State
हैदराबाद
Native Place
रुडकी (उत्तराखंड)
Profession
Government
About me
Superintendent in KVIC, हैदराबाद

प्रदीप देवीशरण भट्ट's Blog

सहर हो जाएगा

जिस्म तो नश्वर है, ये मिट जाएगा

प्रेम पर अपना अमर हो जाएगा

 

सोच मत खोया क्या तूने है यहाँ

एक लम्हा भी दहर हो जाएगा

 

माना ये छोटा है पर धीरज तो धर

बीज एक दिन ये शजर हो जाएगा

 

भाग्य में जितना लिखा था मिल गया

अपना इसमें भी गुजर हो जाएगा

 

जीस्त बेफिक्री में काटी है मगर

मौत का उस पर असर हो जाएगा

 

तिरगी से डर के क्यूँ रहना भला

आज या फ़िर कल सहर हो जाएगा

 

सीख कुछ मेरे…

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Posted on January 16, 2020 at 2:30pm

हम पंछी भारत के

जो हैं भूखे यहाँ ठहर जाएँ

शेष सब संग संग उड़ जाएँ

कमी नहीं यहाँ पे दानों क़ी

हो जो बरसात मेरे घर आएँ

पेट भरता है चंद दानों से

फ़िर क्यूँ सहरा में घूमने जाएँ

लोग भारत के बहुत अच्छे हैं

ख़ुद से पहिले हमें हैं खिलवाएँ

मार कंकर भगाते हैं बच्चे

फिर वही प्यार से हैं बुलावाएँ

प्रचंड गर्मी में जब तडपते हैं

पानी हमको यहीं हैं पिलवाएँ

खेत खलिहान सौंधी सी ख़ुशबू

छोड़ मिट्टी क़ो 'दीप' क्यूँ…

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Posted on January 9, 2020 at 5:30pm — 3 Comments

अहसास

क्या तुम्हें याद है प्रिय

जब मैं औऱ तुम बस यूँ ही

नदी के किनारे चलते चलते

एक छोर से दूसरे छोर तलक

एक दूजे का हाथो में लेकर हाथ

टहलते रहते थे नंगे पाँव!

 

तुम जल्दी ही थक जाती थीं

औऱ बैठ जाया करती थीं

बेंच पर दोनों हाथ टिकाकर

और टिका देती थीं सर बेंच पर

औऱ मैं यूँ ही टहलता रहता था

सिगरेट के कशों  के साथ !

 

हम दोनों घंटो निहारते रहते थे

एक दूसरे के चेहरे क़ो अपलक

कभी विस्तृत नीले…

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Posted on January 8, 2020 at 12:00pm — 6 Comments

अमर प्रेम

इससे पहले के तुम दर्पण निहारों

मैं इन केशों में इक वेणी लगा दूँ

 

लो रख दी बाँसुरी धरती पे मैंने

तुम्हें गाकर के मैं लोरी सुला दूँ

 

समीरण रुक गई है बहते बहते

कहो तो शाख पेडो की हिला दूँ

 

पवन से वेग की इच्छा अगर है

कहो तो अंक में लेकर झूला दूँ

 

सुगंधित हैं सुमन उपवन के सगरे

बताओ कौन सा मैं पुष्प ला दूँ

 

घटा आकाश में छाने को व्याकुल

कहो तो नयनों में तुमको बिठा…

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Posted on January 7, 2020 at 1:30pm — 6 Comments

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At 7:12am on November 21, 2018, Ahmed Maris said…

Good Day,
How is everything with you, I picked interest on you after going through your short profile and deemed it necessary to write you immediately. I have something very vital to disclose to you, but I found it difficult to express myself here, since it's a public site.Could you please get back to me on:( mrsstellakhalil5888@gmail.com ) for the full details.

Have a nice day
Thanks God bless.
Stella.

 
 
 

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