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रवि भसीन 'शाहिद'
  • Male
  • Ferozepur, Punjab
  • India
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रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"आदरणीय Dr. Vijai Shanker साहिब, आपकी ज़र्रा-नवाज़ी और हौसला-अफ़ज़ाई के लिए बेहद शुक्रगुज़ार हूँ।"
6 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post न इतने सवाल कर- ग़ज़ल
"आदरणीय बसंत कुमार शर्मा साहिब, जो बह्र आपने इस्तेमाल की है वो ये है:मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़221 / 2121 / 1221 / 212 ये बहुत ही मशहूर बह्र है, और इसमें कई लाजवाब ग़ज़लें हैं, जैसे:अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहाजिस दिल पे नाज़ था मुझे वो…"
6 hours ago
Dr. Vijai Shanker commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"शानदार प्रस्तुति , बहुत बहुत बधाई , आदरणीय रवि भसीन शाहिद जी , सादर।"
10 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' posted a blog post

चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)

212  /  1222  /  212  /  1222दुनिया के गुलिस्ताँ में फूल सब हसीं हैं परएक मुल्क ऐसा है जो बला का है ख़ुद-सरलाल जिसका परचम है इंक़लाब नारा हैज़ुल्म करने में जिसने सबको जा पछाड़ा हैइस जहान का मरकज़ ख़ुद को गो समझता हैराब्ता कोई दुनिया से नहीं वो रखता हैअपनी सरहदों को वो मुल्क चाहे फैलानाइसलिए वो हमसायों से है आज बेगानाबात अम्न की करके मारे पीठ में खंजरऔर रहनुमा उसके झूट ही बकें दिन भरइंसाँ की तरक़्क़ी में जिसका कुछ नहीं हिस्साबे-हयाई में लेकिन क्या मुक़ाबला उसकाहै वो मुल्क आमादा बस लहू बहाने परवो बशर को…See More
16 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post न इतने सवाल कर- ग़ज़ल
"आदरणीय बसंत कुमार शर्मा साहिब, बहुत ख़ूब ग़ज़ल कही आपने, इस पर दाद और मुबारकबाद क़ुबूल करें। हुज़ूर, अगर आप बह्र भी लिख दें तो इस मंच पर सीखने वालों को आसानी होगी। कुछ अलफ़ाज़ में नुक़्ते छूट गए हैं, जैसे: बग़ैर, ख़ाक, ख़ुद, ख़याल, ख़ुश्बू, और यक़ीन।"
17 hours ago
Samar kabeer commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"ठीक है, एडिट कर दें ।"
19 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद''s blog post was featured

चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)

212  /  1222  /  212  /  1222दुनिया के गुलिस्ताँ में फूल सब हसीं हैं परएक मुल्क ऐसा है जो बला का है ख़ुद-सरलाल जिसका परचम है इंक़लाब नारा हैज़ुल्म करने में जिसने सबको जा पछाड़ा हैइस जहान का मरकज़ ख़ुद को गो समझता हैराब्ता कोई दुनिया से नहीं वो रखता हैअपनी सरहदों को वो मुल्क चाहे फैलानाइसलिए वो हमसायों से है आज बेगानाबात अम्न की करके मारे पीठ में खंजरऔर रहनुमा उसके झूट ही बकें दिन भरइंसाँ की तरक़्क़ी में जिसका कुछ नहीं हिस्साबे-हयाई में लेकिन क्या मुक़ाबला उसकाहै वो मुल्क आमादा बस लहू बहाने परवो बशर को…See More
19 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' साहिब, आप से निरंतर मिल रहे प्रोत्साहन के लिए तह-ए-दिल से शुक्रिया पेश करता हूँ।"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहिब, आपकी नवाज़िश और भरपूर हौसला-अफ़ज़ाई के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"जी, मुझसे ग़लती से उस्ताद-ए-मुहतरम समर कबीर साहिब की टिप्पणी delete हो गई है, जिसके लिए उस्ताद जी से और सभी साथियों से बेहद माज़रत चाहता हूँ। उनकी तमाम इस्लाह और सारी हिदायात मैंने नीचे अपने जवाब में डाल दी हैं।"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"आदरणीय उस्ताद-ए-मुहतरम Samar kabeer साहिब, सादर प्रणाम! आपकी बहुमूल्य इस्लाह के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया! सर, कुछ बदलाव करने का प्रयास किया है: /और रहनुमाँ उसके झूट ही बकें दिन भर'रहनुमाँ' को 'रहनुमा' कर…"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( आएगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी...)
"आदरणीय सालिक गणवीर साहिब, नमस्कार। बहुत अच्छे अशआर हुए हैं जनाब, मुबारकबाद क़ुबूल करें। बस ग़ज़ल का मतला थोड़ा खटक रहा है। /आयेगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभीहँस,खेल,मुस्कुरा तू किसी से न डर अभी/आदरणीय, सब्र उस चीज़ के लिए करने की सलाह दी जाती है जिसे पाने…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"आ. भाई रवि भसीन जी, सादर अभिवादन । इस अति उत्तम रचना के लिए ढेरों बधाइयाँ ।"
Saturday
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"मुहतरम जनाब रवि भसीन 'शाहिद' जी। इस ज़बरदस्त प्रस्तुति और  जज़्बे के लिए आपको सलाम पेश करता हूँ, उस्ताद मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब व अन्य गुणीजनों के आशीर्वाद उपरांत आपकी यह रचना मील का पत्थर होने जा रही है। मेरी भी शुभकामनाएं स्वीकार…"
Friday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"जी कृप्या पहली पंक्ति यूँ पढ़ें: दुनिया के गुलिस्ताँ में फूल सब हसीं हैं पर"
Friday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post मौत से कह दो न रोके -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' भाई, इस लाजवाब ग़ज़ल पर आपको दाद और मुबारकबाद पेश करता हूँ!"
Friday

Profile Information

Gender
Male
City State
Punjab
Native Place
Ferozepur
Profession
Teacher
About me
Passionate about Urdu poetry and music, an English and IELTS trainer by profession, author of a book of short stories 'And That's the Whole Story'

रवि भसीन 'शाहिद''s Blog

चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)

212  /  1222  /  212  /  1222

दुनिया के गुलिस्ताँ में फूल सब हसीं हैं पर

एक मुल्क ऐसा है जो बला का है ख़ुद-सर

लाल जिसका परचम है इंक़लाब नारा है

ज़ुल्म करने में जिसने सबको जा पछाड़ा है

इस जहान का मरकज़ ख़ुद को गो समझता है

राब्ता कोई दुनिया से नहीं वो रखता है

अपनी सरहदों को वो मुल्क चाहे फैलाना

इसलिए वो हमसायों से है आज बेगाना

बात अम्न की करके मारे पीठ में खंजर

और रहनुमा उसके झूट ही बकें दिन भर

इंसाँ की तरक़्क़ी…

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Posted on July 3, 2020 at 1:00am — 10 Comments

ग़ज़ल (वही मंज़र है और मैं) - शाहिद फ़िरोज़पुरी

बहरे मज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ महज़ूफ़

221  / 2121  / 1221 /  212

बद-हालियों का फिर वही मंज़र है और मैं

इक आज़माइशों का समंदर है और मैं [1]

अरमान दिल के दिल में घुटे जा रहे हैं सब

महरूमियों का एक बवंडर है और मैं…

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Posted on June 16, 2020 at 11:54am — 18 Comments

ये जो कुछ ख़्वाब पाल बैठे हैं (ग़ज़ल)

ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून महज़ूफ़ मक़तू'अ

2122 / 1212 / 22

ये जो कुछ ख़्वाब पाल बैठे हैं

जान आफ़त में डाल बैठे हैं [1]

दिल से हम को निकाल बैठे हैं

देखिए पुर-मलाल बैठे हैं [2]

कह चुके हैं हमें वो जाने को

फिर भी देखो मजाल बैठे हैं [3]

बढ़ गए आगे सब हुनर वाले

हम यहीं बे-कमाल बैठे हैं [4]

अब ज़रूरत नहीं सलाहों की

हम तो सिक्का उछाल बैठे हैं [5]

मेरे और उनके दरमियाँ जाने

कितने ही माह-ओ-साल बैठे हैं…

Continue

Posted on June 8, 2020 at 12:30pm — 14 Comments

उस बेवफ़ा से (ग़ज़ल)

221 / 2121 / 1221 / 212

उस बेवफ़ा से दिल का लगाना बहुत हुआ

मजबूर दिल से हो ये बहाना बहुत हुआ [1]

छोड़ो ये ज़ख़्म-ए-दिल का फ़साना बहुत हुआ

ये आशिक़ी का राग पुराना बहुत हुआ [2]

चलते ही चलते दूर निकल आये इस क़दर

ख़ुद से मिले हुए भी ज़माना बहुत हुआ [3]

ख़ुद से भी कोई रोज़ मुलाक़ात कीजिये

ये दूसरों से मिलना मिलाना बहुत हुआ [4]

तस्कीन दे न पाएँगे काग़ज़ पे कुछ निशाँ

लिख लिख के उसका नाम मिटाना बहुत हुआ [5]

अब इक…

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Posted on May 24, 2020 at 10:32am — 8 Comments

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At 5:13pm on March 1, 2020,
प्रधान संपादक
योगराज प्रभाकर
said…

आपकी ज़र्रानवाज़ी का तह-ए-दिल से शुक्रिया मोहतरम जनाब रवि भसीन 'शाहिद' साहिब. 

 
 
 

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