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Rupam kumar -'मीत'
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  • Bihar
  • India
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Welcome, रुपम कुमार -'मीत'!

Latest Activity

अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post धूप से ओस की बूंदों ने गुज़ारिश नहीं की (-रूपम कुमार 'मीत')
"जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, ये ग़ज़ल आप "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-125 में पेश कर चुके हैं, दोबारा ब्लॉग पोस्ट में कैसे पेश कर सकते हैं। आप नियमानुसार मुख्य संपादक महोदय से उस 'तरही मुशायरा' वाली ग़ज़ल में संशोधन…"
yesterday
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post धूप से ओस की बूंदों ने गुज़ारिश नहीं की (-रूपम कुमार 'मीत')
"आ, लक्ष्मण धामी साहिब, प्रणाम। आपकी बात सहीह है, मत्ला ठीक नहीं काफ़िया आरिश की क़ैद हो रही है। मत्ला यूँ कर देता हूँ। धूप से ओस की बूंदों ने गुज़ारिश नहीं की मरना मंजूर था लड़ने की भी कोशिश नहीं की और 2122 1122 1122 112 (22) को हम 1122 1122 1122…"
Friday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post धूप से ओस की बूंदों ने गुज़ारिश नहीं की (-रूपम कुमार 'मीत')
"आ. भाई रूपम जी , सादर अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा है । थोड़ा और प्रयास करने पर और बेहतर हो सकती है । आपका कफिया आरिश की कैद में है देखिएगा।इस हिसाब से गजल खारिज हो रही है।धूप से ओस की बूंदों ने गुज़ारिश नहीं कीमरना मंजूर था जीने की सिफ़ारिश नहीं की…"
Thursday
Rupam kumar -'मीत' posted a blog post

धूप से ओस की बूंदों ने गुज़ारिश नहीं की (-रूपम कुमार 'मीत')

2122 / 1122 / 1122 / 112धूप से ओस की बूंदों ने गुज़ारिश नहीं कीमरना मंजूर था जीने की सिफ़ारिश नहीं की [1]एक ही शहर में हम दोनों का है घर फिर भीहमने इक दूसरे से मिलने की ख़्वाहिश नहीं की [2]ख़ुदा के सामने हर शख़्स बराबर है तभीकाफ़िरों के घरों पे संग की बारिश नहीं की [3]इतने खुद्दार थे हम अपने ही मालिक की तरफहाथ फैलाए मगर होंटों ने जुम्बिश नहीं की [4]इक सफ़ीना हुआ यूँ ग़र्क़ के सब डूब गएभागने के लिए मछली ने भी कोशिश नहीं की [5]काग़ज़ी रोटियों से भूख मिटाई है मगरअपनी ग़ुरबत की कभी हमने नुमाइश नहीं की [6]ये…See More
Thursday
Dr Ashutosh Mishra commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post सितारों के बिना ये आसमाँ अच्छा नहीं लगता (-रूपम कुमार 'मीत')
"बहुत उम्दा वाह"
Mar 28
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने मुबारकबाद पेश करता हूँ। एक अदना कोशिश की है, देखियेेगा।  दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे रक़ीब  मेरा  भला  कैसे  ये  दग़ा  न  करे …"
Mar 8
सालिक गणवीर commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"प्रिय  Rupam kumar -'मीतसादर अभिवादन एक बहतरीन ग़ज़ल के लिए बधाइयाँ स्वीकार करें,जैसा कि कबीर साहब ने कहा या तो जुल्फें कर लो या बिखरेगी कर लो,खुश रहो और यूँ ही लिखते रहो."
Mar 8
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आदरणीय समर कबीर साहिब, मैं और प्रयास करता हूँ, दिल से शुक्रिया"
Mar 6
Samar kabeer commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"'लगा के आग मेरे घर को फिर हवा न करे किया है जो मेरे दुश्मन ने वो सगा न करे' मुझे इनमें भी रब्त नहीं लगता ।"
Mar 6
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आदरणीय समर कबीर साहिब दंडवत प्रणाम, मत्ला यूँ कहे तो लगा के आग मेरे घर को फिर हवा न करे किया है जो मेरे दुश्मन ने वो सगा न करे मार्गदर्शन कीजिए साहिब,,"
Mar 6
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आ, लक्ष्मण धामी साहिब प्रणाम, ग़ज़ल पर आपकी आमद और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत शुक्रिया साहिब।"
Mar 6
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आदरणीय नीलेश जी, बहुत शुक्रिया हौसला अफ़ज़ाई का।"
Mar 6
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आ. भाई रूपम जी, अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बधाई ।"
Mar 6
निलेश बरई (नवाज़िश) commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आदरणीय रूपम साहब,बहुत ही उम्दः ग़ज़ल कही है आपने  बधाई स्वीकार करें इस ग़ज़ल के लिए .."
Mar 6
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आदरणीया अमिता तिवारी जी,, बहुत शुक्रिया आपका ग़ज़ल तक आई, और बालक का हौसला बढ़ाया।। आपका दिन शुभ हो। प्रणाम।"
Mar 5
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आदरणीय समर कबीर साहिब प्रणाम, बहुत दिन के बाद मैं इस मंच पर वापस आया हूँ, और आपकी इस्लाह बहुत ख़ुशी मिली, साहिब मत्ला मुझे ठीक लग रहा है, लेकिन शाइरी की समझ उतनी नहीं है मैं एक बार फिर कोशिश करता हूँ। तीसरे शेर में ऊला को दुरुस्त करना होगा वो मैंने…"
Mar 5

Profile Information

Gender
Male
City State
Motihari
Native Place
Bihar
Profession
Student
About me
मुझे तो सभी बोलते है कि लड़का भला भी नहीं तो बुरा भी नहीं है -'मीत'

Rupam kumar -'मीत''s Blog

धूप से ओस की बूंदों ने गुज़ारिश नहीं की (-रूपम कुमार 'मीत')

2122 / 1122 / 1122 / 112

धूप से ओस की बूंदों ने गुज़ारिश नहीं की

मरना मंजूर था जीने की सिफ़ारिश नहीं की [1]

एक ही शहर में हम दोनों का है घर फिर भी

हमने इक दूसरे से मिलने की ख़्वाहिश नहीं की [2]

ख़ुदा के सामने हर शख़्स बराबर है तभी

काफ़िरों के घरों पे संग की बारिश नहीं की [3]

इतने खुद्दार थे हम अपने ही मालिक की तरफ

हाथ फैलाए मगर होंटों ने जुम्बिश नहीं की [4]

इक सफ़ीना हुआ यूँ ग़र्क़ के सब डूब गए

भागने के लिए…

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Posted on April 8, 2021 at 5:00pm — 3 Comments

दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')

बह्र:- 1212 1122 1212 112

दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे

किया है जो मेरे दुश्मन ने वो सगा न करे [1]

उसे है इल्म बिछड़ने से लोग टूटते हैं

तभी वो मोतियों को डोर से जुदा न करे [2]

बुज़ुर्ग हो गया हूँ ज़िंदगी से इसलिए भी

वो देख भाल करे पर मेरी दवा न करे [3]

नहीं है ख़ौफ़ समंदर में डूबने का मुझे

मगर यूँ क़र्ज़ में मरना पड़े ख़ुदा न करे [4]

मुहाल है ज़मीं से आसमान तक का सफ़र

बुलंदियों पे यूँ जा कर कोई गिरा न…

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Posted on March 3, 2021 at 9:23am — 13 Comments

ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')

बह्र- 2122 1122 1122 22(112)

ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा

और हँसते हुए दुनिया से गुज़र जाऊँगा [1]

जो सिला मुझ को मिला है यहाँ सच बोलने से

अब तो मैं झूट ही बोलूँगा जिधर जाऊँगा [2]

रात को ख़्वाब में आऊँगा फ़रिश्ते की तरह

और आँखों से तेरी सुब्ह उतर जाऊँगा [3]

ख़ून छन छन के निकलता है कलेजे से मेरे

रोग ऐसा है कि कुछ रोज़ में मर जाऊँगा [4]

सामना होने पे पूछेगा तू , पहचाना मुझे?

गर मैं पहचान भी…

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Posted on October 15, 2020 at 5:30pm — 12 Comments

हम उनकी याद में रोए भी मुस्कुराए भी (~रूपम कुमार 'मीत')

बह्र- 1212 / 1122 / 1212 / 22 (112)

अज़ाब-ए-हिज्र में सुख-दुख के गीत गाए भी

हम उनकी याद में रोए भी मुस्कुराए भी [1]

ख़ुदा ने ख़ल्क़ किया है चराग़ जैसा हमें

वही जलाए हमें फिर वही बुझाए भी [2]

अजीब साल ये गुज़रा हमारी जिंदगी में

ख़ुदा करे न दुबारा कभी फिर आए भी [3]

हमारे यार का अंदाज़-ए-इश्क़ सबसे जुदा

कभी हँसाए वो हमको कभी रुलाए भी [4]

गुलाब जैसे लबों से वो हमको चूमता है

निशान प्यार के सीने से फिर मिटाए…

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Posted on September 27, 2020 at 1:00am — 17 Comments

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At 5:49pm on July 3, 2020, Chetan Prakash said…

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