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सालिक गणवीर
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सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post जिसको हम ग़ैर समझते थे...(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद'साहिबआदाबग़ज़ल पर आपकी मौजूदगी और हौसला अफजाई के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ."
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on सालिक गणवीर's blog post जिसको हम ग़ैर समझते थे...(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)
"आदरणीय सालिक गणवीर साहिब, नमस्कार। बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है जनाब, आपको इस पर ख़ूब सारी दाद और हार्दिक बधाई।"
yesterday
सालिक गणवीर posted a blog post

जिसको हम ग़ैर समझते थे...(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

2122 1122 1122 22जिसको हम ग़ैर समझते थे हमारा निकला उससे रिश्ता तो कई साल पुराना निकला (1)हम भी हरचंद गुनहगार नहीं थे लेकिन बे-क़ुसूरों में फ़क़त नाम तुम्हारा निकला (2)हम जिसे क़ैद समझते थे बदन में अपने वक़्त आया तो वो आज़ाद परिंदा निकला (3)जान पर खेल के जाँ मेरी बचाई उसने मैं जिसे समझा था क़ातिल वो मसीहा निकला (4)दोस्तो जान छिड़कता था जो कल तक मुझ पर आज वो शख़्स मेरे ख़ून का प्यासा निकला (5)एक ही दिन में मिरा ज़र्द हुआ है चहरा जिस्म से ख़ून मगर कल तो ज़रा सा निकला (6)वक़्त के साथ बड़ा होगा यही सोचा था दिल मगर…See More
Thursday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post रस्ते की बात है न ये रहबर की बात है...(ग़ज़ल-सालिक गणवीर)
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी ' मुसाफिर   'सादर अभिवादनग़ज़ल पर आपकी मौजूदगी और हौसला अफजाई के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ."
Wednesday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post रस्ते की बात है न ये रहबर की बात है...(ग़ज़ल-सालिक गणवीर)
"आदरणीय अमीरूद्दीन 'अमीर'साहिबआदाबग़ज़ल पर आपकी मौजूदगी और हौसला अफजाई के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ."
Wednesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सालिक गणवीर's blog post रस्ते की बात है न ये रहबर की बात है...(ग़ज़ल-सालिक गणवीर)
"आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । बेहतरीन गजल हुई है । हार्दिक बधाई स्वीकारें ।"
Wednesday
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on सालिक गणवीर's blog post रस्ते की बात है न ये रहबर की बात है...(ग़ज़ल-सालिक गणवीर)
"जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, शानदार ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। मक़्ता लाजवाब है। सादर। "
Tuesday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post रस्ते की बात है न ये रहबर की बात है...(ग़ज़ल-सालिक गणवीर)
"आदरणीय भाई रवि भसीन 'शाहिद'सादर अभिवादनग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हृदयतल से आभार व्यक्त करता हूँ. सब आपकी नज़र-ए-इनायत का कमाल एवं जनाब. सप्रेम."
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on सालिक गणवीर's blog post रस्ते की बात है न ये रहबर की बात है...(ग़ज़ल-सालिक गणवीर)
"आदरणीय सालिक गणवीर साहिब, लाजवाब ग़ज़ल हुई है जनाब, बधाई स्वीकार करें। तीसरे और चौथे शे'र के लिए विशेष दाद।"
Tuesday
सालिक गणवीर commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post मेरे ही प्यार में पगी आई. - ग़ज़ल
"भाई बसंत कुमार शर्मा जी सादर अभिवादन उम्दा ग़ज़ल कही है आपने जनाब,दाद और मुबारकबाद स्वीकार करें."
Tuesday
सालिक गणवीर commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post है जो कुछ भी धरती का - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' ( गजल)
"भाई लक्ष्मण धामी जी सादर अभिवादन सुंदर ग़ज़ल पाठकों तक पहुँचाने के लिए हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें."
Tuesday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post उनके ख़्वाबों पे ख़यालात पे रोना आया.(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)
"भाई ब्रजेश कुमार 'ब्रज' जीसादर अभिवादनग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हृदयतल से आभार व्यक्त करता हूँ. सादर एवं सप्रेम."
Tuesday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post लोग घर के हों या कि बाहर के...(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)
"मुहतरमा डिंपल शर्मा जीसादर अभिवादनग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हृदयतल से आभार व्यक्त करता हूँ. सादर एवं सप्रेम."
Tuesday
सालिक गणवीर commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post एक नया दस्तूर (ग़ज़ल - शाहिद फिरोज़पुरी)
"भाई रवि भसीन 'शाहिद' साहिब आदाब बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है आपने. दाद और मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए हुजूर. ख़ास दाद मतले और मकते के लिए."
Tuesday
सालिक गणवीर posted a blog post

रस्ते की बात है न ये रहबर की बात है...(ग़ज़ल-सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212रस्ते की बात है न ये रहबर की बात है पा लेना मंज़िलों को मुक़द्दर की बात हैये बोरिया की है मिरे बिस्तर की बात है फूलों की सेज मिलना मुक़द्दर की बात हैउस वाक़िये का ज़िक्र मुनासिब नहीं यहाँ चल घर पे चलके बात करें घर की बात हैकब कौन किसके शाने पे चढ़ जाए क्या पता ऊपर पहुँचना भी तो सुअवसर की बात हैसब की क़लम से एक ही क़िस्सा निकलता था आज़ादी छिन गई थी छिहत्तर की बात हैबरसात मॉनसून की उसको थी ले उड़ी छत आपकी नहीं मेरे छप्पर की बात हैहाकिम ने दे दी आज इजाज़त कि काट दो दर-अस्ल वो जनाब मिरे सर की…See More
Tuesday
सालिक गणवीर commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post सितारों के बिना ये आसमाँ अच्छा नहीं लगता
"प्रिय रूपम कुमार बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है आपने, शैर दर शैर दाद और मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ. फीचर ब्लॉग ग़ज़ल चस्पा हुई है, इसके लिए अलग से असीमित बधाईयाँ."
Monday

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhilai, Chhattisgarh
Native Place
Bhilai
Profession
Retired from SAIL,as a Senior Electrical engineer
About me
Reading,writing and photography were my hobbies and after retirement I am totally indulged to fulfill my dreams.

सालिक गणवीर's Blog

जिसको हम ग़ैर समझते थे...(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

2122 1122 1122 22

जिसको हम ग़ैर समझते थे हमारा निकला

उससे रिश्ता तो कई साल पुराना निकला (1)

हम भी हरचंद गुनहगार नहीं थे लेकिन

बे-क़ुसूरों में फ़क़त नाम तुम्हारा निकला (2)

हम जिसे क़ैद समझते थे बदन में अपने

वक़्त आया तो वो आज़ाद परिंदा निकला (3)

जान पर खेल के जाँ मेरी बचाई उसने

मैं जिसे समझा था क़ातिल वो मसीहा निकला (4)

दोस्तो जान छिड़कता था जो कल तक मुझ पर

आज वो शख़्स मेरे ख़ून का प्यासा निकला…

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Posted on August 13, 2020 at 4:29pm — 2 Comments

रस्ते की बात है न ये रहबर की बात है...(ग़ज़ल-सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212

रस्ते की बात है न ये रहबर की बात है

पा लेना मंज़िलों को मुक़द्दर की बात है

ये बोरिया की है मिरे बिस्तर की बात है

फूलों की सेज मिलना मुक़द्दर की बात है

उस वाक़िये का ज़िक्र मुनासिब नहीं यहाँ

चल घर पे चलके बात करें घर की बात है

कब कौन किसके शाने पे चढ़ जाए क्या पता

ऊपर पहुँचना भी तो सुअवसर की बात है

सब की क़लम से एक ही क़िस्सा निकलता था

आज़ादी छिन गई थी छिहत्तर की बात…

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Posted on August 10, 2020 at 11:55pm — 6 Comments

लोग घर के हों या कि बाहर के...(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

(2122 1212 22/122)

लोग घर के हों या कि बाहर के

प्यार करिएगा उनसे जी भर के

जाने क्या कह दिया है क़तरे ने

हौसले पस्त हैं समंदर के

जिस्म पर जब कोई निशाँ ही नहीं

कौन देखेगा ज़ख़्म अंदर के

दोस्ती उन से कर ली दरिया ने

जो थे दुश्मन कभी समंदर के

एक शीशे से ख़ौफ़ खाते हैं

लोग जो लग रहे थे पत्थर के

एक बस माँ को बाँट पाए नहीं

घर के टुकड़े हुए बराबर के

गरचे हर घर की है कहानी…

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Posted on August 2, 2020 at 3:30pm — 15 Comments

उनके ख़्वाबों पे ख़यालात पे रोना आया.(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

(2122 1122 1122 22/112)

उनके ख़्वाबों पे ख़यालात पे रोना आया

अब तो मत पूछिये किस बात पे रोना आया

देखता कौन भरी आँखों को बरसातों में

फिर से आई हुई बरसात पे रोना आया

आप चाहें तो जो दो दिन में सुधर सकते हैं

उन बिगड़ते  हुए हालात पे रोना आया

मुद्दतों जिनके जवाबात को तरसा हूँ मैं

आज कुछ ऐसे सवालात पे रोना आया

मुझको मालूम था अंजाम यही होना है

जीत रोने से हुई मात पे रोना आया

दिन…

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Posted on July 29, 2020 at 12:00pm — 13 Comments

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