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सालिक गणवीर
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सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय समर कबीर साहब आदाब मेरे ब्लॉग की सारी ग़ज़लों पर आपकी इस्लाह और मार्ग दर्शन मिला है. ये ग़ज़ल आपकी नज़र में नहीं आई है ,मोहतरम. जनाब एक दफ्अ पढ़ लें तो आगे कुछ लिखने की हिम्मत जुटाऊँ."
Tuesday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)
"आदरणीय अमीरुद्दीन ख़ान साहब आदाब ग़ज़ल पर उपस्थिति एवं सराहना के लिए हृदय से आभार."
Tuesday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)
"आदरणीय समर कबीर साहब आदाब ग़ज़ल पर उपस्थिति एवं सराहना के लिए हृदय से आभार. जनाब क्या सस्ते और मंहगे में कोई रब्त नहीं?फ़िर भी आपकी इस्लाह पर मतला बदलने की कोशिश करता हूँ."
Tuesday
सालिक गणवीर posted a blog post

ग़ज़ल ( अंधी गली के मोड़ पर.....)

 (221 2121  1221 212)अंधी गली के मोड़ पे सूना मकान हैतन्हा-सा आदमी अब इस घर की शान हैहमसे उन्होंने आज तलक कुछ नहीं कहाहर बार उससे पूछा है जो बेज़बान हैहालात-ए- माज़ूर यक़ीनन हुये बुरेऊपर चढ़ाई है वहीं नीचे ढलान हैबदक़िस्मती का ये भी नमूना तो देखियेगड्ढे नहीं मिले थे जहाँ पर खदान हैमरने के बाद भी तो फ़राग़त नहीं मिलीसारे बदन पे बोझ है मिट्टी लदान है*मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Tuesday
अमीरुद्दीन खा़न "अमीर " commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)
"जनाब भाई सालिक गणवीर जी, आदाब। वाह क्या ख़ूब ग़ज़ल कही है। दिल में उतरने और इन्सानी जज़्बात बयां करने वााली रचना के लिये तहे-दिल से मुबारकबाद पेश करता हूँ ।"
Monday
Samar kabeer commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)
"जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें । मतले के दोनों मिसरे अलग अलग हैं उनमें रब्त पैदा नहीं हो सका, देखियेगा ।"
Monday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( अंधी गली के मोड़ पर.....)
"आदरणीय समर कबीर साहब . आदाबग़ज़ल पर उपस्थिति एवं सराहना के लिए हृदय से आभार.आपके मार्गदर्शन और स्नेह  की मुझे सख्त ज़रूरत है. आपकी इस्लाह पर तुरंत अमल कर आपको सूचित करता हूँ.ईद की मुबारकबाद कुबूल फरमायें."
Monday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( अंधी गली के मोड़ पर.....)
"आदरणीय भाई डा.छोटे लाल सिंह जी.ग़ज़ल पर उपस्थिति एवं सराहना के लिए हृदय से आभार."
Monday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी.ग़ज़ल पर उपस्थिति एवं सराहना के लिए हृदय से आभार."
Monday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)
"आदरणीय भाई डा.छोटे लाल सिंह जी.ग़ज़ल पर उपस्थिति एवं सराहना के लिए हृदय से आभार."
Monday
डॉ छोटेलाल सिंह commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( अंधी गली के मोड़ पर.....)
"सारे वदन पर बोझ है मिट्टी लदान हैं, हकीकत को बयां करती बहुत ही दमदार गजल आदरणीय गणवीर साहब बहुत बहुत बधाई"
Monday
डॉ छोटेलाल सिंह commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)
"आदरणीय सालिक गणवीर साहब कमाल की गजल प्रस्तुत की आपने,न बन पाया तेरे जैसा कभी मैं ,बहुत सुंदर मन मगन हो गया बधाई कुबूल कीजिए"
Monday
Samar kabeer commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( अंधी गली के मोड़ पर.....)
"जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें । मतले के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,देखियेगा । 'हर बार उनसे पूछा है जो बेज़बान है' इस मिसरे में 'उनसे' की जगह "उससे" कर लें ,'उनसे' के…"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)
"आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । उम्दा गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Sunday
सालिक गणवीर posted a blog post

ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)

(1222 1222 122)नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं बशर हूँ ,था बहुत मंहगा कभी मैंअभी जिसने रखा है घर से बाहर उसी के दिल में रहता था कभी मैंजिसे कहते हो तुम भी झोपड़ी अब मिरा घर है वहीं पर था कभी मैंवहाँ पर क़ैद कर रक्खा है उसने जहाँ देता रहा पहरा कभी मैंसड़क पर क़ाफिला है साथ मेरे नहीं इतना रहा तन्हा कभी मैंमुझे भी तुम अगर तिनका बनाते हवा के साथ उड़ जाता कभी मैंबनाया है मुझे सागर उसीने हुआ करता था इक सहरा कभी मैंमैं जैसा हूँ सदा वैसा रहूँगा न बन पाया तिरे जैसा कभी मैं*मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Sunday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( अंधी गली के मोड़ पर.....)
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर अभिवादन ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और सराहना के लिए आपका ह्रदय से आभार."
Sunday

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhilai, Chhattisgarh
Native Place
Bhilai
Profession
Retired from SAIL,as a Senior Electrical engineer
About me
Reading,writing and photography were my hobbies and after retirement I am totally indulged to fulfill my dreams.

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ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)

(1222 1222 122)

नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं

बशर हूँ ,था बहुत मंहगा कभी मैं

अभी जिसने रखा है घर से बाहर

उसी के दिल में रहता था कभी मैं

जिसे कहते हो तुम भी झोपड़ी अब

मिरा घर है वहीं पर था कभी मैं

वहाँ पर क़ैद कर रक्खा है उसने

जहाँ देता रहा पहरा कभी मैं

सड़क पर क़ाफिला है साथ मेरे

नहीं इतना रहा तन्हा कभी मैं

मुझे भी तुम अगर तिनका बनाते

हवा के साथ उड़ जाता कभी…

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Posted on May 24, 2020 at 8:30am — 8 Comments

ग़ज़ल ( अंधी गली के मोड़ पर.....)

 (221 2121  1221 212)

अंधी गली के मोड़ पे सूना मकान है

तन्हा-सा आदमी अब इस घर की शान है

हमसे उन्होंने आज तलक कुछ नहीं कहा

हर बार उससे पूछा है जो बेज़बान है

हालात-ए- माज़ूर यक़ीनन हुये बुरे

ऊपर चढ़ाई है वहीं नीचे ढलान है

बदक़िस्मती का ये भी नमूना तो देखिये

गड्ढे नहीं मिले थे जहाँ पर खदान है

मरने के बाद भी तो फ़राग़त नहीं मिली

सारे बदन पे बोझ है मिट्टी लदान है

*मौलिक एवं…

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Posted on May 21, 2020 at 6:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल ( हम सुनाते दास्ताँ फिर ज़िन्दगी की....)

( 2122 2122 2122 )

हम सुनाते दास्ताँ फिर ज़िन्दगी की

काश हम भी काटते फसलें ख़ुशी की

अब चुरा लो शम्स की भी धूप सारी

कोई तो बदलो  ये सूरत तीरगी की

जानवर अब हैं ज़ियादा जंगलों में

नस्ल घटती जा रही है आदमी की

हैं अंधेरे घर में अपने क़ैद सारे

कौन खींचेगा लकीरें रौशनी की

जो भी हो सागर मिलेगा तिश्नगी को

बाढ़ ले जाये हमें अब तो नदी की

आंखेंं फट जाएँगी हैरत से…

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Posted on May 15, 2020 at 7:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल ( तिजारत कैसे की जाए.....)

1222 1222 1222 1222

तिजारत कैसे की जाए हुआ है फैसला जब से

बड़ी किल्लत है पानी की लहू सस्ता हुआ जब से

मशीनें अब यहाँ पर और महंगी क्यों नहीं होंगी?

वतन में मुफ़्त ही इंसान भी मिलने लगा जब से

हमारा शह्र छोटा था मगर मिलता नहीं था वो

हमें अक्सर बुलाता है नयी दिल्ली गयाा जब से

समय के साथ कम होगी यही हम सोच बैठे थे

ये दूरी कम नहीं होती मिटा है फासला जब से

नयी शक्लें दिखाता था कभी जब सामने आया

नहीं जाता…

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Posted on May 9, 2020 at 5:00pm — 17 Comments

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