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Sheikh Shahzad Usmani
  • Male
  • SHIVPURI M.P.
  • India
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Deepak Sharma Kuluvi replied to Sheikh Shahzad Usmani's discussion जुगत (बाल-लघुकथा/बाल-कहानी) in the group बाल साहित्य
"really wonderful sir Deepak kuluvi"
May 12
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-61 (विषय: प्रकृति)
"आदाब। रचना पटल पर प्रथम उपस्थिति और इस प्रोत्साहक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीया बबीता गुप्ता साहिबा।"
Apr 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-61 (विषय: प्रकृति)
"आदाब। सर, मेरी दृष्टि में यह एक बेहतरीन लघुकथा ही नहीं, यह बेहतरीन बालमन की लघुकथा भी है। "
Apr 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-61 (विषय: प्रकृति)
"'रस वाया वाइरस!' (लघुकथा) : एक आकस्मिक गठित समिति की आकस्मिक सभा इधर हो रही थी, तो दूसरी उधर। इधर वाइरस दल 'अ' के मानव बैठे हुए थे, सो उधर प्राकृतिक या प्रायोगिक या प्रायोजित दल 'ब' के विषाणु बैठे हुए थे। अनुभव और…"
Apr 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-61 (विषय: प्रकृति)
"आदाब। विषयांतर्गत कथानक पुराना है लेकिन नई सदी के साथ सदा सजीव व नया रूप लिये हुए है। इस सदी के हालात से रूबरू कराती प्रवाहमय रचना। हार्दिक बधाई जनाब सतविंदर कुमार राणा साहिब। ख़ुदा क़सम, यह कहने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं है है कि इस वर्ग में अब…"
Apr 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-61 (विषय: प्रकृति)
"आदाब। आपकी यह लघुकथा आपसे अपरिचित पाठकों को भी यह अहसास करा देगी कि आप एक प्रतिष्ठित कथाकार और बालमन-कथा-सृजक हैं। कोरोना वाइरस प्रकोप और महामारी काल की विशिष्ट लॉकडाउन अवधि में मानव जगत का लक्ष्मणरेखा तक सीमित हो जाना ज़मीन से लेकर ओज़ोन परत के सुराख़…"
Apr 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-61 (विषय: प्रकृति)
"आदाब। मनुष्य की उम्र कुछ भी हो। पुरुष और स्त्री के नैसर्गिक (प्राकृतिक) गुण कहीं न कहीं से प्रेरित या इग्नाइट होकर जोश या उभार पर आ जाते हैं सारे ग़िले-शिकवे भूलते-भुलाते हुए। विषयांतर्गत बहुत ही गहराई वाला दिलचस्प सृजन हुआ है। हार्दिक बधाई मुहतरमा…"
Apr 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-61 (विषय: प्रकृति)
"आदाब। शुभप्रभात। एक आश्चर्यचकित कर देने वाली समसामयिक विषयांतर्गत बेहतरीन और उम्दा परिकल्पना वाली सकारात्मक संदेशवाहक रचना के साथ आपने महत्वपूर्ण विषय पर आधारित गोष्ठी का बढ़िया आग़ाज़ किया है आपने मुहतरम जनाब मनन कुमार सिंह साहिब।  हार्दिक बधाई।…"
Apr 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"आदरणीय सर, मंच संचालक महोदय जनाब योगराज प्रभाकर साहिब के छोटे भाई जनाब रमेश साहिब की आकस्मिक मृत्यु से बहुत दुःख हुआ है| विनम्र श्रद्धांजलि।"
Apr 29
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"सादर नमस्कार। रचना पटल पर समय देकर मुझे यूं प्रोत्साहित करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया भाई सतविंदर राणा साहिब।"
Mar 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"आदाब। सांकेतिक शैली में वर्तमान परिदृश्य को बढ़िया संदेश के साथ शाब्दिक किया है आपने। हार्दिक बधाई जनाब मनन कुमार सिंह साहिब। सामान्य पाठक शैली समझने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं।"
Mar 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"आदाब। उपरोक्त सभी टिप्पणियों से स्पष्ट हो गया है कि सहभागिता के लिए शीघ्रता की गई है। हो सके तो बाद में इसे सम्पादित कर दीजिएगा आदरणीया अर्चना त्रिपाठी जी।"
Mar 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"सादर नमस्कार आदरणीय सर जी। रचना पटल पर त्वरित उपस्थिति व मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। धरोहरों का ज़िक्र देश की पहचानों व विरासतों के इशारों में किया गया है। /जयकारे/ से आशय दुनिया में हमारे देश की धरोहरों/विरासतों की प्रशंसा से,…"
Mar 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"आदाब। ये अन्य बाहर वाले ही तो सब गड़बड़ करते हैं। वरना इतनी बढ़िया तरीक़े से समझाने वालों के बीच में बाधक स्वर गूंजने पर भी मसाइल हल हो जाते हैं। अंतिम पंचपंक्ति की तरह ही समझाने वाले का कोई न कोई संवाद/बात भटकते लोगों के सीधे दिल और दिमाग़ पर असर कर…"
Mar 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"आदाब। आपकी इस समीक्षा से हम सभी बहुत लाभांवित हुए। हार्दिक धन्यवाद आदरणीय महेंद्र कुमार साहिब।"
Mar 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"आदाब। आपकी इस समीक्षा से हम सभी बहुत लाभांवित हुए। हार्दिक धन्यवाद आदरणीय रवि प्रभाकर साहिब।"
Mar 31

Profile Information

Gender
Male
City State
Shivpuri M.P.
Native Place
Shivpuri
Profession
Radio Announcer
About me
A Private School- teacher, Freelancer and a Casual Radio Announcer. Simlple living, high thinking, fond of reading and writing.

Sheikh Shahzad Usmani's Blog

दिल के हाल सुने दिलवाला (लघुकथा)

"अपनी पैरों से रौंदें, दूजी जो भा जाये!"



"घर की मुर्ग़ी दाल बराबर; नयी पीढ़ी को कौन समझाये!"



अपनापन त्याग कर ख़ुदग़र्ज़ी, मनमर्ज़ी, दोगलापन, पागलपन, बचकानापन दिखाती अपने मुल्क की नई पीढ़ी की सोच और पलायन-गतिविधियों पर दो बुजुर्गों ने अपनी-अपनी राय यूं ज़ाहिर की।



"... 'ओल्ड इज़ गोल्ड' कहावत को छोड़ो जी; ओल्ड इज़ सोल्ड! नई पीढ़ी है सो बोल्ड! उन्हें ज़मीनी स्टोरीज़ टोल्ड हों या अनटोल्ड! हम बुड्ढे तो हुए क्लीन-बोल्ड!" उनमें से एक ने दूसरे से कहा, लेकिन ख़ुद के…

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Posted on March 10, 2020 at 2:34pm — 4 Comments

हिताय और सुखाय (संस्मरण)

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Posted on November 23, 2019 at 1:00pm — 7 Comments

फ़िर वही राग (क्षणिकायें)

दीये बनते, बिकते, जलते हैं

पेट पालते हैं

दीपक तले अंधेरा

फ़िर वही रात, वही सबेरा!

दीये पालते हैं, दीये पलते हैं

विरासत पलती है

दीपक तले अंधेरा

फ़िर वही बात, वही बखेड़ा!

विरासत पालती है, विरासत पलती है

उद्योग पलते हैं; राजनीति पलती है

लोकतंत्र पलता है

दीपक तले अंधेरा

फ़िर वही धपली, वही राग!

स्वच्छता पालती है, स्वच्छता पलती है

नारे-पोस्टर पलते हैं, भाषण पलते हैं

दीपक तले अंधेरा

फ़िर वही चाल, वही…

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Posted on October 25, 2019 at 6:46am — 5 Comments

दीये पलते हैं...! (लघुकथा)

दीपावली के चंद रोज़ पहले से ही त्योहार सा माहौल था उस कच्चे से घर में। सब अपने पालनहार बनाने में जुटे हुए थे; कोई मिट्टी रौंद रहा था, कोई पहिया चला-चला कर उसके केंद्र पर मिट्टी के लौंदों को त्योहार मुताबिक़ सुंदर आकार दे रहा था। वह उन्हें धूप में कतारबद्ध जमाती जा रही थी। लेकिन अपने-अपने काम में तल्लीन और सपनों में खोये अपनों को देख कर उसे अजीब सा सुकून मिल रहा था हर मर्तबा माफ़िक़। एक तरफ़ उसकी सास; दूसरी तरफ़ समय के पहिये संग कुम्हार का पैतृक पहिया चलाता उसका पति दीपक और उसके कंधों पर झूलता…

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Posted on October 22, 2019 at 10:40pm — 3 Comments

Comment Wall (13 comments)

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At 12:50am on October 5, 2018, mirza javed baig said…

आली जनाब शहज़ाद उस्मानी साहिब आदाब, 

मुझे अपनी दोस्तों की फ़ेहरिस्त में जोड़ने का शुक्रिया 

At 6:43am on July 2, 2018, राज़ नवादवी said…

"आदरणीय Sheikh Usmani साहब, तरही मुशायरे में मेरी ग़ज़ल में शिरकत का दिल से शुक्रिया. समयाभाव था, कमेंट बॉक्स बंद हो चुका है. इसलिए यहाँ से आभार प्रकट कर रहूँ हूँ.सादर "

At 11:59am on April 12, 2018, MD SHAFIQUE ASHRAF said…

जी बहूत  बहुत शुक्रिया जनाब ... नया हूँ .... थोड़ा सीखने का मौका दीजिये  

At 10:23am on January 8, 2017, Dr Ashutosh Mishra said…
आदरणीय शेख भाई जी आपके मित्रों की सूची में खुद को शामिल पाकर मैं सुखद अनुभूति कर रहा हूँ आपकी लघु कथाएं इस मंच पर मेरे बिशेष आकर्षण का केंद्र है आपकी हर लघु कथा मैं पढता हूँ आपकी कलम सृजन के नए आयाम स्थापित करती रहे ऐसी अपनी शुभकामनाओं के साथ सादर
At 8:23pm on August 5, 2016, pratibha pande said…

आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ  आदरणीय उस्मानी जी  ,आपका रचनाकर्म हर दिन नई बुलंदियां छुएँ ,ये कामना करती हूँ 

At 7:30am on June 20, 2016, सुरेश कुमार 'कल्याण' said…
श्रद्धेय शेख शहजाद उस्मानी साहब ये सब तो आप जैसे मित्रों के सहयोग से ही हुआ है और आशा करता हूं कि भविष्य में भी मेरा मार्गदर्शन करते रहेंगे। हृदय की गहराईयों से धन्यवाद ।
At 8:42am on May 24, 2016, महिमा वर्मा said…

आभार आपका आ.शेख उस्मानी सर जी,अभी जानकारी  पूरी नहीं है ,तो आपको जवाब देने में देर हो गई.पुनः आभार आपका .

At 2:11pm on May 1, 2016, pratibha pande said…

मित्रता के लिए आभार 

At 8:41am on November 18, 2015, pratibha pande said…

हार्दिक आभार आपका आदरणीय 

At 9:27am on November 4, 2015, kanta roy said…

देखी वफ़ा-ए-फ़ुरसत-ए-रंज-ओ-निशात-ए-दहर

ख़मियाज़ा यक दराज़ी-ए-उमर-ए-ख़ुमार था---- 

मिर्ज़ा ग़ालिब साहब का ये शेर आज आपके लिए
असीम शुभकामनाएँ आपको आदरणीय शहजाद जी।

 

 
 
 

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