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नाथ सोनांचली
  • Male
  • वाराणसी, उत्तर प्रदेश
  • India
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Latest Activity

नाथ सोनांचली commented on नाथ सोनांचली's blog post मदिरा सवैया आधारित दो छन्द
"आद0 सौरभ पाण्डेय जी सादर प्रणाम रचना पर आपकी उपस्थिति किसी पुरस्कार से कम नहीं। हृदयतल से आभार प्रकट करता हूँ। सादर"
Jun 29

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on नाथ सोनांचली's blog post मदिरा सवैया आधारित दो छन्द
"वाह, हार्दिक बधाई स्वीकारें< आदरणीय नाथ सोनांचली जी.  आपके रचनाकर्म का उत्कर्ष दूसरे छन्द में ऊभर कर निखरा है.  शुभातिशुभ"
Jun 27
नाथ सोनांचली commented on नाथ सोनांचली's blog post पिता को समर्पित महाभुजंगप्रयात छन्द
"आद0 लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी सादर अभिवादन। रचना पर आपकी उपस्थिति और आत्मिक प्रतिक्रिया का हृदयतल से आभार"
Jun 22
नाथ सोनांचली commented on Sushil Sarna's blog post पितृ दिवस पर कुछ क्षणिकाएँ. . .
"आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। उत्तम क्षणिकाएं हुई हैं। बधाई स्वीकार कीजिये। एक मन में ऐसे ख़याल आया। पहली क्षणिका को ऐसे करें तो काँधे कोकाँधे नेकाँधा दियाइक अरसे के बादसृष्टि रो पड़ी"
Jun 22
नाथ सोनांचली commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post पिता - दोहे
"आद0 लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर" जी सादर अभिवादन पिता पर बढ़िया दोहावली हुई है।  पत्थर से व्यवहार में, अन्तस को रख नर्म हर इच्छा...  क्या कहने,, बहुत खूब।"
Jun 22
नाथ सोनांचली commented on नाथ सोनांचली's blog post गीत : कोई चाहे कुछ भी कह ले, जीवन पथ आसान नहीं है
"आद0 चेतन प्रकाश जी सादर अभिवादन। रचना पर आपकी गरिमामयी उपस्थिति और उत्साह बढ़ाती आत्मिक प्रतिक्रिया का हृदयतल से आभार।"
Jun 22
Chetan Prakash commented on नाथ सोनांचली's blog post गीत : कोई चाहे कुछ भी कह ले, जीवन पथ आसान नहीं है
"नमस्कार, भाई, नाथ सोनांचली, जीवन की अनिश्चितता और परिस्तिथियों के सापेक्ष मानव के असहाय होते भाग्य पर उसकी निर्भरता की विषय- वस्तु लेकर सार्थक गीत की सृष्टि की आपने, बधाई !"
Jun 22
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on नाथ सोनांचली's blog post पिता को समर्पित महाभुजंगप्रयात छन्द
"आ. भाई नाथ सोनांचली जी, सादर अभिवादन। सुन्दर छन्द हुए हैं । हार्दिक बधाई।"
Jun 22
नाथ सोनांचली posted a blog post

गीत : कोई चाहे कुछ भी कह ले, जीवन पथ आसान नहीं है

कोशिश  है जीवन  पाने कीसबकी चाह  प्रथम आने कीकई  करोड़ों  लड़ते   लेकिनकोई - कोई  विजयी  निकलेशेष  कहाँ जा खो जाते हैं, इसका  कुछ अनुमान नहीं हैकोई  चाहे कुछ भी  कह ले, जीवन पथ  आसान नहीं हैशाम  सुबह  या  जेठ  दुपहरी, भूख  मिटाते  जीवन  बीतेकल जैसा ही कल होगा क्या, इस असमंजस में हम जीतेरेत  सरीखे  अपने  सपने,  कब   ढह  जाए  नहीं  भरोसाजीने  की  उम्मीद  लिए  सब, बूँद  जहर  का  चेतन  पीतेदो  रोटी  पाने  की  ख़ातिर,  जीवन  सभी  खपाते लेकिनजीवन  ताश  सरीखा जिसके, अगले पल का भान नहीं हैकोई  चाहे  कुछ …See More
Jun 18
नाथ सोनांचली commented on Sushil Sarna's blog post मुक्तक ( आधार छंद - हंसगति )
"आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। इस छन्द को पहली बार पढ़ रहा हूँ। मस्त लगा। हृदयतल से आभार आपका। "
Jun 17
नाथ सोनांचली commented on नाथ सोनांचली's blog post पिता को समर्पित महाभुजंगप्रयात छन्द
"आद0 चेतन प्रकाश जी सादर अभिवादन। आपकी रचना पर उपस्थिति और आत्मिक प्रतिक्रिया से आह्लादित हूँ। आभार आपका"
Jun 17
Chetan Prakash commented on नाथ सोनांचली's blog post पिता को समर्पित महाभुजंगप्रयात छन्द
"नमस्कार, भाई, नाथ सोनांचली, बेहद सार्थक, सटीक भावों से ओत- प्रोत महाभुजंग प्रयात छंद लिखे, आपने । एतद्वारा आपको बधाई प्रेषित करता हूँ । आपके पिता, दीर्घायु हों !"
Jun 17
नाथ सोनांचली commented on नाथ सोनांचली's blog post मदिरा सवैया आधारित दो छन्द
"आद0 चेतन प्रकाश जी सादर अभिवादन। हृदयतल से आभार आपका"
Jun 17
Chetan Prakash commented on नाथ सोनांचली's blog post मदिरा सवैया आधारित दो छन्द
"आ. भाई, नाथ सोनांचली, मनभावन मदिरा सवैया छंदों की रचना की है, आपने, बधाई ! कदाचित भगण, भानस का अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प है!"
Jun 16
नाथ सोनांचली posted a blog post

मदिरा सवैया आधारित दो छन्द

1माँ गुरु थी पहली अपनी जिसका तप पावन ज्ञान लिखूँछाँव मिली जिस आँचल में उसको सब वेद पुरान लिखूँगर्भ  पला जिसके  तन में  उसको अपना भगवान लिखूँमात  सनेह  समान  यहाँ कुछ  और नहीं  उपमान लिखूँ2साजन  जो परदेश  गए  करके   मकरन्द  विहीन कलीअश्रु गिरें दिन रात यहाँ  बरसे  जस  सावन  की  बदलीबात रही दिल में जितनी दिल ने दिल से दिल में कह लीहाल  हुआ  दिल का अपने जस नीर बिना तड़पे मछलीनाथ सोनांचलीविधान : भानस ×7 + गुरु(मौलिक व अप्रकाशित)See More
Jun 15
नाथ सोनांचली commented on AMAN SINHA's blog post क्यों परेशान होता है तू
"आद0 अमन सिन्हा जी सादर अभिवादन।बढ़िया लिखा है आपने। बधाई स्वीकार कीजिये"
Jun 15

Profile Information

Gender
Male
City State
Varanasi
Native Place
Varanasi
Profession
Teacher
About me
I am a simple leaving man, having hobby to write poems

नाथ सोनांचली's Blog

गीत : कोई चाहे कुछ भी कह ले, जीवन पथ आसान नहीं है

कोशिश  है जीवन  पाने की

सबकी चाह  प्रथम आने की

कई  करोड़ों  लड़ते   लेकिन

कोई - कोई  विजयी  निकले

शेष  कहाँ जा खो जाते हैं, इसका  कुछ अनुमान नहीं है

कोई  चाहे कुछ भी  कह ले, जीवन पथ  आसान नहीं है

शाम  सुबह  या  जेठ  दुपहरी, भूख  मिटाते  जीवन  बीते

कल जैसा ही कल होगा क्या, इस असमंजस में हम जीते

रेत  सरीखे  अपने  सपने,  कब   ढह  जाए  नहीं  भरोसा

जीने  की  उम्मीद  लिए  सब, बूँद  जहर  का  चेतन  पीते

दो  रोटी  पाने  की …

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Posted on June 17, 2022 at 9:59pm — 2 Comments

मदिरा सवैया आधारित दो छन्द

1

माँ गुरु थी पहली अपनी जिसका तप पावन ज्ञान लिखूँ

छाँव मिली जिस आँचल में उसको सब वेद पुरान लिखूँ

गर्भ  पला जिसके  तन में  उसको अपना भगवान लिखूँ

मात  सनेह  समान  यहाँ कुछ  और नहीं  उपमान लिखूँ

2

साजन  जो परदेश  गए  करके   मकरन्द  विहीन कली

अश्रु गिरें दिन रात यहाँ  बरसे  जस  सावन  की  बदली

बात रही दिल में जितनी दिल ने दिल से दिल में कह ली

हाल  हुआ  दिल का अपने जस नीर बिना तड़पे मछली

नाथ…

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Posted on June 15, 2022 at 7:54am — 4 Comments

गीत (सोचना क्या, छोड़ना क्या, कुछ नहीं बस में हमारे)

तृप्ति भी मिलती नहीं औ द्वंद भी कुछ इस तरह है

सोचना क्या? छोड़ना क्या? कुछ नहीं बस में हमारे

साथ किसके क्या रहा है छोड़कर धरती गगन को

फूल  जो  भी  आज  हैं वे छोड़ देंगे कल चमन को

मौत  पर  होवें  दुखी  या  जन्म पर खुशियाँ मनाएँ

हार   से  हम  हार  जाएँ  या   लड़े  औ जीत जाएँ

ज़िन्दगी   के  राज़  गहरे   दूर   जितने   चाँद   तारे

सोचना क्या? छोड़ना क्या? कुछ नहीं बस में हमारे

हर  पतन  के  बाद  ही  होता जगत उत्थान  भी है

शांति  की  ही  गोद  में …

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Posted on June 13, 2022 at 11:10am — 6 Comments

मुक्तक (मदिरा सवैया आधारित)

बोझ पड़ा सिर पे घर का मन में घनघोर अशांति हुई

यौवन में तन वृद्ध हुआ अरु जर्जर मानस क्लांति हुई

बीत गए सुख चैन भरे दिन जो अब लौट नहीं सकते

बाल सफेद हुए सिर के मुख की सब गायब कांति हुई

जीवन के दिन  चार यहाँ  इसमें  उसमें  हम  त्रस्त हुए

अर्थ क्षुधा बुझती न कभी धन संचय में बस व्यस्त हुए

वक़्त नहीं मिलता जिसमें हम बैठ कहीं कुछ सोच सकें

बन्धु सखा हित वक़्त नहीं अब यूँ हम शुद्ध गृहस्थ हुए

नाथ सोनांचली

विधान -: भानस ×7…

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Posted on June 11, 2022 at 2:30pm

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At 7:03pm on April 11, 2019, Vivek Pandey Dwij said…
आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी आभार आप को इस उत्साह वर्धन के लिए।
At 7:39pm on November 20, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी ग़ज़ल "हाथ से सारे फिसल गए" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |

आपको प्रसस्ति पत्र यथा शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
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