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Usha Awasthi
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Usha Awasthi posted a blog post

वे ही सन्त होते हैं

करो कितना विवेचनशैलियों , पांडित्य का, लेकिनभावों के धरातल पर हीगौतम बुद्ध बनते हैंहुए तर्कों , वितर्कों से परेवे शुद्ध हो गएप्रकृति के सब प्रपंचों से निरुद्ध , प्रबुद्ध हो गएजो खेलें दूसरों की गरिमा सेउन्मत्त होते हैंसदा जो प्रेम से भरपूरवे ही सन्त होते हैंमौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Thursday
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post तुझसे ही धोखे खाए हैं
"मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब,निवेदन है कि रचना के साथ उसकी विधा भी लिख दिया करें,पाठकों को आसानी होती है,कृपया बताने का कष्ट करें कि ये रचना किस विधा में है?"
Sep 1
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Aug 29
Usha Awasthi posted a blog post

तुझसे ही धोखे खाए हैं

सबसे ज्यादा ज़िन्दगी तुझसे ही धोखे खाए हैंजब किया विश्वास तबतूने कहर बरपाए हैंसबसे - -दीप आशा का लिएजब - जब उमंगित मैं खड़ीद्वार जो नैराश्य के आकर सतत खटकाए हैंसबसे - -मत समझना तू हरा देगीमुझे ऐ ज़िन्दगीहमने ही तो कूट प्रश्नों केगिरह सुलझाए हैंसबसे - -परत दर परतों के पीछेकितना ही छुपती फिरेपर तेरे झूठे मुखौटेहमने ही विलगाए हैंसबसे - -मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Aug 28
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post कहें किससे व्यथा ?
"प्रणाम, हार्दिक धन्यवाद।"
Aug 28
dandpani nahak commented on Usha Awasthi's blog post कहें किससे व्यथा ?
"आदरणीया उषा अवस्थी जी प्रणाम, बहुत अच्छी रचना है हार्दिक बधाई स्वीकार करें"
Aug 27
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post कहें किससे व्यथा ?
"हार्दिक धन्यवाद आपका।"
Aug 27
pratibha pande commented on Usha Awasthi's blog post कहें किससे व्यथा ?
"वाह  बहुत सुन्दर भाव। हार्दिक बधाई आदरणीया ऊषा अवस्थी जी"
Aug 27
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post कहें किससे व्यथा ?
"आदाब,धन्यवाद आपका।"
Aug 27
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post कहें किससे व्यथा ?
"मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 25
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Aug 22
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Aug 22
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Aug 22
Usha Awasthi posted a blog post

कहें किससे व्यथा ?

तुम हुए जो व्यस्त अभिभावक कहें किससे व्यथा? हो गए कितने अकेले  क्या तुम्हे यह भी पता? जिन्दगी की राह में तुम तो निकल आगे गए वे गहन अवसाद, द्वन्दों में उलझ कर रह गए सहन कर पाए न वे  संतान की ये बेरुखी बेसहारा , ढलती वय थक कर, हताशा में फंसी तुम उन्हे कुछ वक्त दो प्यार दो , संतृप्ति दो जिन्दगी जीने को कुछ आधार कण रससिक्त दो पुष्प फिर आशीष के तुम पर बरस ही जाएंगे कवच बन संसार के संताप से टकराएंगे मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Aug 22
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post श्रमेव जयते
"प्रोत्साहन हेतु आप सबका आभार।"
Aug 10
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post श्रमेव जयते
"मुहतरमा ऊषा जी आदाब,दोहों का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें । अंतिम दोहे की पहली पंक्ति की मात्रा एक बार गिन लें ।"
Aug 8

Profile Information

Gender
Female
City State
Lucknow
Native Place
Uttar Pradesh
Profession
Author

ब्राहम्ण

उषा अवस्थी

मान दिया होता यदि तुमने
ब्राम्हण को , सुविचारों को
सदगुण की तलवार काटती
निर्लज्जी व्यभिचारों को

उसको काया मत समझो ,
ज्ञान विज्ञान समन्वय है
द्वैत भाव से मुक्त, जितेन्द्रिय
सत्यप्रतिज्ञ , समुच्चय है

कर्म , वचन , मन से पावन
वह ब्रम्हपथी , समदर्शी है
नहीं जन्म से , सतत कर्म से
तेजस्वी , ब्रम्हर्षि है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Usha Awasthi's Blog

वे ही सन्त होते हैं

करो कितना विवेचन

शैलियों , पांडित्य का, लेकिन

भावों के धरातल पर ही

गौतम बुद्ध बनते हैं

हुए तर्कों , वितर्कों से परे

वे शुद्ध हो गए

प्रकृति के सब प्रपंचों से 

निरुद्ध , प्रबुद्ध हो गए

जो खेलें दूसरों की गरिमा से

उन्मत्त होते हैं

सदा जो प्रेम से भरपूर

वे ही सन्त होते हैं

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on September 18, 2019 at 10:30pm

तुझसे ही धोखे खाए हैं

सबसे ज्यादा ज़िन्दगी 
तुझसे ही धोखे खाए हैं
जब किया विश्वास तब
तूने कहर बरपाए हैं
सबसे - -

दीप आशा का लिए
जब - जब उमंगित मैं खड़ी
द्वार जो नैराश्य के 
आकर सतत खटकाए हैं
सबसे - -

मत समझना तू हरा देगी
मुझे ऐ ज़िन्दगी
हमने ही तो कूट प्रश्नों के
गिरह सुलझाए हैं
सबसे - -

परत दर परतों के पीछे
कितना ही छुपती फिरे
पर तेरे झूठे मुखौटे
हमने ही विलगाए हैं
सबसे - -

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on August 28, 2019 at 9:51pm — 1 Comment

कहें किससे व्यथा ?

तुम हुए जो व्यस्त

अभिभावक कहें किससे व्यथा?

हो गए कितने अकेले 

क्या तुम्हे यह भी पता?



जिन्दगी की राह में

तुम तो निकल आगे गए

वे गहन अवसाद, द्वन्दों

में उलझ कर रह गए



सहन कर पाए न वे 

संतान की ये बेरुखी

बेसहारा , ढलती वय

थक कर, हताशा में फंसी



तुम उन्हे कुछ वक्त दो

प्यार दो , संतृप्ति दो

जिन्दगी जीने को कुछ

आधार कण रससिक्त दो



पुष्प फिर आशीष के

तुम पर बरस ही जाएंगे

कवच बन संसार…

Continue

Posted on August 22, 2019 at 9:50pm — 6 Comments

श्रमेव जयते

उद्मम करते जो सदा
कर्मनिष्ठ , मतिधीर
वे सम्पन्न समाज की 
रखते नींव , प्रवीर

श्रमेव जयते में सदा
जिनका है विश्वास
उनके ही श्रम विन्दु से 
ले वसुन्धरा श्वास

मेहनत भी एक साधना
नहीं कोई यह भोग
लक्ष्य केन्द्रित वृत्ति ही
बन जाए फिर योग

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on August 6, 2019 at 7:00pm — 3 Comments

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At 9:12am on November 21, 2018, Ahmed Maris said…

Good Day,
How is everything with you, I picked interest on you after going through your short profile and deemed it necessary to write you immediately. I have something very vital to disclose to you, but I found it difficult to express myself here, since it's a public site.Could you please get back to me on:( mrsstellakhalil5888@gmail.com ) for the full details.

Have a nice day
Thanks God bless.
Stella.

At 6:29am on August 5, 2018, Kishorekant said…

सुन्दर रचना केलिये हार्दिक अभिनंदन सुश्री उषा अवस्थिजी ।

At 9:01pm on September 9, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए....

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है.

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