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बृजेश कुमार 'ब्रज'
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on SALIM RAZA REWA's blog post जनाबे मीर के लहजे की नाज़ुकी कि तरह - सलीम रज़ा रीवा
"वाह क्या कहने बेहतरीन ग़ज़ल कही है सलीम साहब..बधाई"
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on रामबली गुप्ता's blog post वागीश्वरी सवैया-रामबली गुप्ता
"वाह जी वाह आदरणीय गुप्ता जी खूब छंद निभाया है सुन्दर सरस.."
Apr 19
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"बेहतरीन शब्दों को बड़े ही सलीके से पिरोया है कविता में..वाह"
Apr 19
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"वाह बहुतखूब ग़ज़ल कही है आदरणीय..बधाई"
Apr 19
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"वाह बड़ी ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय..बहुत बहुत बधाई"
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"उत्तम सन्देशप्रद रचना आदरणीय..बधाई"
Apr 19
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post क्षणिकाएँ :
"वाह आदरणीय उम्दा सारगर्भित रचना..बधाई"
Apr 19
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post पलकों पे ठहर जाता है - ग़ज़ल
"बड़ी ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीय शर्मा जी..बधाई"
Apr 19
SALIM RAZA REWA commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल...मुझे तू याद मत कर- बृजेश कुमार 'ब्रज'
"ब्रिजेश की ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद, मोहतरम समर साहब सही कह रहे हैं, दोष का कारण आपका रदीफ़ है......."
Apr 18
amod shrivastav (bindouri) commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post नवगीत-वेदना तुझको बुलाऊँ-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"वाहः बहुत सुंदर प्रस्तुति  आदरणीय"
Apr 17
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post नवगीत-वेदना ने नेत्र खोले-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"आपका हार्दिक धन्यवाद आदरणीय फूल सिंह जी..सादर"
Apr 17
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post नवगीत-वेदना तुझको बुलाऊँ-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"बहुत बहुत आभार आदरणीय तेजवीर सिंह जी..सादर"
Apr 17
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल...मुझे तू याद मत कर- बृजेश कुमार 'ब्रज'
"शतुर्गुरबा का ख्याल था मुझे बस थोड़ा संशय था।बहुत बहुत आभार आदरणीय समर कबीर जी..फ़िलहाल में इसे पटल से हटा लेता हूँ..सादर"
Apr 17
Samar kabeer commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल...मुझे तू याद मत कर- बृजेश कुमार 'ब्रज'
"जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन ग़ज़ल अभी और समय चाहती है,बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें । 'तुम्हारे अश्क़  हैं मोती इन्हें बरबाद  मत करमेरा क्या है मेरे हमदम  मुझे तू याद मत…"
Apr 17
PHOOL SINGH commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post नवगीत-वेदना ने नेत्र खोले-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"रातरानी खिलखिलाईरुत रचाती है सगाई आ गया मौसम बसंती प्रीत पंछी ले हिंडोले वेदना ने नेत्र खोले ब्रिजेश जी, सुंदर रचना बधाई स्वीकारें|"
Apr 15

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Male
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noida
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jhansi

बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog

नवगीत-वेदना तुझको बुलाऊँ-बृजेश कुमार 'ब्रज'

छा रहा नभ में अँधेरा

जुगनुओं  ने सूर्य घेरा

नेह भावों से  निचोड़ूँ  दीप  मैं घर घर  जलाऊँ

वेदना तुझको बुलाऊँ

रो दिए वीरान पनघट

टूट के बिखरे हुए घट

हैं बहुत मुश्किल समय के ये थपेड़े सह न पाऊँ 

वेदना तुझको बुलाऊँ

अश्रुओं से सिक्त वीणा

न कहूँ अंतस की पीड़ा 

रिक्त भावों से पड़े तो किस तरह ये गीत गाऊँ

वेदना तुझको बुलाऊँ…

Continue

Posted on April 7, 2019 at 10:30am — 7 Comments

नवगीत-वेदना ने नेत्र खोले-बृजेश कुमार 'ब्रज'

वेदना ने नेत्र खोले

रात ने उर लौ लगाई
चांदनी कुछ मुस्कुराई
आज फिर चन्दा गगन में बादलों के बीच डोले
वेदना ने नेत्र खोले

रातरानी खिलखिलाई
रुत रचाती है सगाई
आ गया मौसम बसंती प्रीत पंछी ले हिंडोले
वेदना ने नेत्र खोले

ओ बटोही देश आजा
छोड़कर परदेश आजा
टेरती कोयल सलोनी मन पपीहा नित्य बोले
वेदना ने नेत्र खोले
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Posted on March 20, 2019 at 6:11pm — 8 Comments

ग़ज़ल... जिस रास्ते पे उनकी मन्ज़िलें नहीं

बह्र ए मीर
अब तक रहे भटकते उजड़े दयार में
अब कौन बसा आन दिले बेक़रार में

जिस रास्ते पे  उनकी मन्ज़िलें  नहीं
उस  राह में  खड़े  हैं  इन्तज़ार  में

बेकार  हर सदा है कितना पुकारता
ये कौन सो रहा है गुमसुम मज़ार में

उस फूल को ख़िज़ायें ले के कहाँ गईं
जिस फूल को चुना था लाखों हजार में

ऐ मीत इस कदर भी मत आज़मा मुझे
आ जाये न कमी 'ब्रज' के ऐतबार में
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Posted on January 3, 2019 at 2:30pm — 4 Comments

गीत-युगों से जुदा हैं नदी के किनारे-बृजेश कुमार 'ब्रज'

उन्हें कौन पूछे उन्हें कौन तारे

युगों से जुदा हैं नदी के किनारे

उदासी उदासी उदासी घनेरी

विरह वेदना प्रीत की है चितेरी

अँधेरे खड़े द्वार पे सिर झुकाये

तभी रात ने स्वप्न इतने सजाये

उसी रात को छल गये चाँद तारे

युगों से जुदा हैं नदी के किनारे

लगी रात की आँख भी छलछलाने

अँधेरा मगर बात कोई न माने

क्षितिज पे कहीं मुस्कुराया सवेरा

तभी रूठ कर चल दिया है अँधेरा

नजर रोज सुनसान राहें बुहारे

युगों से जुदा हैं नदी के…

Continue

Posted on December 21, 2018 at 4:30pm — 10 Comments

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At 6:59pm on October 24, 2017, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

स्वागत है आदरणीय ,  आपको मित्र के रूप में पाना मेरा सौभाग्य है .

At 11:43pm on November 17, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

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