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बृजेश कुमार 'ब्रज'
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आशीष यादव commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-जैसा जग है वैसा ही हो जाऊँ तो
"बहुत सुंदर गजल हुई है। काबिल-ए-तारीफ है। बधाई स्वीकार कीजिए।"
Aug 26
आशीष यादव commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post गीत-तस्वीर तुम्हारी
"अहा! बहुत सुंदर गीत। बधाई स्वीकार कीजिए आदरणीय।"
Aug 26
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post गीत-तस्वीर तुम्हारी
"आदरणीय समीर जी उत्साहवर्धन भरे शब्दों के लिए आपका शुक्रिया...सादर"
Aug 24
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post गीत-तस्वीर तुम्हारी
"बहुत बहुत आभार आदरणीय धामी जी....सादर"
Aug 24
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post एकाकी मन........
"बढ़िया कविता आदरणीय सरना जी...."
Aug 22
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post काँटों से बिँध फूल को आते - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"बढ़िया ग़ज़ल हुई आदरणीय धामी जी..."
Aug 22
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on सालिक गणवीर's blog post हर सम्त अँधेरा है इसे दूर भगाओ...(ग़ज़ल-सालिक गणवीर)
"अच्छी ग़ज़ल कही है ज़नाब सालिक जी बधाई"
Aug 22
बृजेश कुमार 'ब्रज' posted a blog post

गीत-तस्वीर तुम्हारी

सभी पंक्तियाँ 16-16 मात्राभार के क्रम मेंघर के किस कोने में रख के भूल गया तस्वीर तुम्हारीरोज सवेरे से सिर धुनते शाम ढले तक याद संभाली एक सिरा न हाथ में आया टुकड़े टुकड़े रात खंगालीआँगन ढूढ़ा कमरा ढूढ़ा ढूढ़ लिए दालान अटारी घर के किस कोने में रख के भूल गया तस्वीर तुम्हारीदेख पपीहे की अकुलाहट आसमान में बादल आये बुलबुल छेड़े खूब तराना भँवरे फूलों पे मंडरायेतू भी कोयल बड़ी निठुर है क्या समझेगी पीर हमारी घर के किस कोने में रख के भूल गया तस्वीर तुम्हारीखोना पाना हँसना रोना जीवन के सब खेल तमाशे मैंने गीतों…See More
Aug 22
Samar kabeer commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post गीत-तस्वीर तुम्हारी
"जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब, अच्छा गीत लिखा आपने, बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 21
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दो चार रंग छाँव के हमने बचा लिए - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"बढ़िया ग़ज़ल कही आदरणीय धामी जी..सादर"
Aug 19
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post स्वतंत्रता दिवस पर कुछ दोहे :
"वाह बहुत ही सुन्दर दोहे आदरणीय.."
Aug 19
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post आज़ादी के पुनीत पर्व पर वीर रस की कविता
"बहुत सुन्दर भवप्रिय रचना आदरणीय..."
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"सुन्दर कविता..बधाई आदरणीया"
Aug 19
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Madhu Passi 'महक''s blog post यूँ ख़यालों में सनम आने लगे हैं...(ग़ज़ल मधु पासी 'महक')
"जैसा कि आदरणीय समर जी ने कहा...प्रयास वाकई में अच्छा आदरणीया..शुभकामनाएं"
Aug 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post गीत-तस्वीर तुम्हारी
"आ. भाई बृजेश कुमार जीी, सादर अभिवादन । सुन्दद गीत हुआ है । हार्दिक बधाई।"
Aug 19
बृजेश कुमार 'ब्रज' posted blog posts
Aug 19

Profile Information

Gender
Male
City State
noida
Native Place
jhansi

बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog

गीत-तस्वीर तुम्हारी

सभी पंक्तियाँ 16-16 मात्राभार के क्रम में

घर के किस कोने में रख के

भूल गया तस्वीर तुम्हारी

रोज सवेरे से सिर धुनते

शाम ढले तक याद संभाली

एक सिरा न हाथ में आया

टुकड़े टुकड़े रात खंगाली

आँगन ढूढ़ा कमरा ढूढ़ा

ढूढ़ लिए दालान अटारी

घर के किस कोने में रख के

भूल गया तस्वीर तुम्हारी

देख पपीहे की अकुलाहट

आसमान में बादल आये

बुलबुल छेड़े खूब तराना

भँवरे फूलों पे मंडराये

तू भी कोयल बड़ी…

Continue

Posted on August 18, 2020 at 11:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल-जैसा जग है वैसा ही हो जाऊँ तो

बह्र-ए-मीर
पतझर में भी गीत बसंती गाऊँ तो
जैसा जग है वैसा ही हो जाऊँ तो

अंदर का अँधियारा क्या छट जायेगा
कोशिश करके बाहर दीप जलाऊँ तो

शायद लौट चले आएं रूठे पलछिन
फूलों से जो उनकी राह सजाऊँ तो

कार्य हमारे भी सारे सध जायेंगे
सुविधा शुल्क लिये ये हाथ बढ़ाऊँ तो

जग सारा देखेगा 'ब्रज' के पांव फटे
जो चादर के बाहर पग फैलाऊँ तो


(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Posted on August 14, 2020 at 10:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल-चाँद के चर्चे आसमानों में

लंबे अंतराल के बाद एक ग़ज़ल के साथ
2122 1212 22

चाँद के चर्चे आसमानों में
और मेरे सभी फसानों में

अय हवा बख्श दे अभी ये लौ
हैं अँधेरे गरीबखानों में

हम सुख़नवर से पीर ज़िंदा है
दर्द का मोल क्या दुकानों में

आँखों में आँसुओं का डेरा है
ख्वाब हैं क़ैद मर्तबानों में

पंछियों के लिए सदा रखना
कोई उम्मीद आबदानों में

दिल जला 'ब्रज' जरा सुकूँ आये
रौशनी भी रहे मकानों में
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Posted on August 8, 2020 at 3:16pm — 2 Comments

ग़ज़ल..डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था-बृजेश कुमार 'ब्रज'

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212   1212    1212    1212



निगाह  में उदासियां  छुपा हुआ अज़ाब था

डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था

दिखी नहीं कली कहीं ख़ुशी से कोई झूमती

लबों लबों कराह और आँख आँख आब था

चमन में छा रही थीं बेशुमार बदहवासियां

न  टेसुओं  पे नूर था  न सुर्खरू  गुलाब था

मिला न साथ दे सका जो चाहिए मिला नहीं

थी चार दिन की ज़िंदगानी दर्द बेहिसाब था

फ़ुज़ूल थे सवाल और चीखना फ़ुज़ूल…

Continue

Posted on October 10, 2019 at 12:30pm — 8 Comments

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At 6:59pm on October 24, 2017, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

स्वागत है आदरणीय ,  आपको मित्र के रूप में पाना मेरा सौभाग्य है .

At 11:43pm on November 17, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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