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gumnaam pithoragarhi
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gumnaam pithoragarhi commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कालिख दिलों के साथ में ठूँसी दिमाग में - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"वाह भाई साहब वाह , बहुत खूब ..."
23 hours ago
gumnaam pithoragarhi commented on gumnaam pithoragarhi's blog post गजल
"आप दोनो का बहुत बहुत शुक्रिया ....में कुछ सुधार करता हूं ... धन्यवाद मेरी जानकारी में वृद्धि करने के लिए ....."
23 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on gumnaam pithoragarhi's blog post गजल
"//सुनहरे की मात्रा गणना 212 ही होगी ॥ शायद ॥ 122 नहीं  । // सु+नह+रा = 1 2 2 .. यगणात्मक शब्द है यह. सुन+हरा नहीं उच्चारित करते. तो मात्रा भार 2 2 की तरह नहीं ले सकते"
Tuesday
gumnaam pithoragarhi commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post भोर सुख की निर्धनों ने पर कहीं देखी नहीं -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर'
"वाह अच्छा है मुसाफिर साहब ॥ वाह "
Tuesday
gumnaam pithoragarhi commented on gumnaam pithoragarhi's blog post गजल
"धन्यवाद दोस्तो ..   आपके सलाह सुझाव का स्वागत है । सुनहरे की मात्रा गणना 212 ही होगी ॥ शायद ॥ 122 नहीं  । "
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on gumnaam pithoragarhi's blog post गजल
"आ. भाई गुमनाम जी , सादर अभिवादन। सुन्दर गजल हुई है। हार्दिक वधाई। हिन्दी में "वहम" बोले जाने के बावजूद इसे गजल में 21 पर लिए जाने का मत प्रचलन में है। इस हिसाब से इसे यू लिखकर आप सबको संतुष्ट कर सकते हैं। वह्म जैसी  लगे  वो भरी…"
Tuesday
अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी commented on gumnaam pithoragarhi's blog post गजल
"जनाब गुमनाम पिथौरागढ़ी जी आदाब, एक ग़ैर मानूस (अप्रचलित) बह्र पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें, मगर... ग़ज़ल अभी समय चाहती है। मतला और सभी सानी मिसरों में 'जेब' की तक़्तीअ आपने कैसे की, सही लफ़्ज़ वह्म (वहम) का वज़्न 21 है…"
Monday
gumnaam pithoragarhi posted a blog post

गजल

212  212  212  22 इक वहम सी लगे वो भरी सी जेब साथ रहती मेरे अब फटी सी जेब ख्वाब देखे सदा सुनहरे दिन के आँख खुलते मिली बस कटी सी जेब चैन आराम सब खो दिया तुमने पास रक्खी भला क्यों बड़ी सी जेब शहर में तेज है धूप नफरत की हर गली मे मिली कुछ भुनी सी जेब रब , खुदा , राम के नाम पर हम तोसिर्फ पाते रहे अधजली सी जेब आँख मे मोतिया * पड़ गया शायद अब नजर आएगी बस हंसी सी जेब मौलिक और अप्रकाशित  गुमनाम .. See More
Monday
gumnaam pithoragarhi commented on अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी's blog post ग़ज़ल (जबसे तुमने मिलना-जुलना छोड़ दिया)
"वाह शानदार गजल हुई है वाह .. "
Monday
gumnaam pithoragarhi commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post एक अनबुझ प्यास लेकर जी रहे हैं -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"वाह खूब वाह बहुत बहुत बधाई ।  चेतन जी ने सही कहा 2122  2122  2122  .. "
Jul 1
gumnaam pithoragarhi commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कभी तो पढ़ेगा वो संसार घर हैं - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"वाह मुसाफिर साहब खूब गजल हुई है । बधाई "
Jul 1
gumnaam pithoragarhi commented on अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी's blog post ग़ज़ल (... तमाशा बना दिया)
"शानदार गजल हुई है बधाई .. "
Jul 1
gumnaam pithoragarhi commented on Sushil Sarna's blog post गज़ल - ज़ुल्फ की जंजीर से ......
"मंजिलों के पास आ के दूर मंजिल हो गई .. मंजिलों के बजाय  // मंजिल ॥  किया जा सकता है क्या  शानदार गजल हुई है वाह .. "
May 25
gumnaam pithoragarhi commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये
"वाह बहुत खूब गजल हुई है । बधाई .. "
May 25
gumnaam pithoragarhi commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल-अपना है कहाँ
"वाह बहुत खूब गजल हुई है है .। बहुत खूब .. "
May 21
gumnaam pithoragarhi commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल-अपना है कहाँ
"वाह बहुत खूब गजल हुई है है .। बहुत खूब .. "
May 21

Profile Information

Gender
Male
City State
pithoragarh
Native Place
pithoragarh
Profession
teaching
About me
sahity ki dunia me jana pahachana naam hona chahta hoon............

gazal

धड़कता है गुनगुनाता है बतियाता है लेकिन

ख़त कि तरह मोबईल महकता नहीं है

--------------------------------------------------------------

मज़हब की किताबों के पैगाम बदल देते हैं

नानक और ईसा के नाम बदल देते हैं

फिर न होगी शिकायत किसी को ज़माने में

लाओ पैगम्बर से राम बदल देते हैं

----------------------------------------------------------------------------

ऐ वाइज़ तू क्यों फिकर में रहता है

सारा निज़ाम उसकी नज़र में रहता है

सिर्फ दैरो हरम नहीं ठिकाना उसका

हर जर्रे में वो हर बशर में रहता है

 

 

 

अप्रकाशित व मौलिक -------------------------------------

Comment Wall (5 comments)

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At 1:22pm on March 24, 2015, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीय गुमनाम जी ..महेनी का सक्रीय सदस्य चुने जाने पर मेरी तरफ से भी हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

At 2:50pm on March 19, 2015, Krish mishra 'jaan' gorakhpuri said…

भाई गुमनाम जी 'महीने का सक्रिय सदस्य' के रूप में आप को देखकर अपार हर्ष हो रहा है! बहुत बहुत बधाईयां!!

At 8:22pm on March 15, 2015, maharshi tripathi said…

आ.गुमनाम पिथौरागढ़ी जी आपको विगत माह का सक्रिय सदस्य चुने जाने पर हार्दिक बधाई |

At 12:40pm on March 15, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय
गुमनाम पिथौरागढ़ी जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 10:46pm on January 28, 2015, vijay said…
गुमनाम जी इस ग़ज़ल पर कोई काम हो तो बताएं
आपकी पिछली टिप्पणी से साहस मिला
धन्यवाद

Gumnaam pithoragarhi's Blog

गजल

212  212  212  22 

इक वहम सी लगे वो भरी सी जेब 

साथ रहती मेरे अब फटी सी जेब 

ख्वाब देखे सदा सुनहरे दिन के 

आँख खुलते मिली बस कटी सी जेब 

चैन आराम सब खो दिया तुमने 

पास…

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Posted on July 4, 2022 at 9:30am — 5 Comments

अब क्या करें

२१२२ २१२२ २१२

जिस्म चाँदी का हुआ अब क्या करें
उम्र निकली बेवफा अब क्या करें

इश्क़ पहला जो हुआ वो इश्क़ था
इश्क़ तो है गुमशुदा अब क्या करें

याद की अल्बम पलटकर देख ली
दिन हुए वो लापता अब क्या करें

किस तरह बच पाएगी अस्मत यहाँ
हर तरफ है खौफ सा अब क्या करें

उम्र की सारी तहें भी खोल दीं
खत मिले कुछ बेपता अब क्या करें

गुमनाम पिथौरगढ़ी


स्वरचित व अप्रकाशित

Posted on February 19, 2021 at 6:36pm — 6 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

ज़ख्म मेरे जब कभी तुम पर बयाँ हो जाएंगे 

सामने के सब नज़ारे बेजुबाँ  हो जाएंगे 

हाथ में  पत्थर नहीं कुछ ख्वाब दो कुछ काम दो 

हाथ ये नापाक के  कठपुतलियाँ हो जाएंगे 

खेलने दो आज इनको फ़िक्र सारी छोड़कर 

ज़िन्दगी उलझा ही देगी जब जवाँ हो जायेंगे 

जब कभी अफवाह उठ्ठे तुम यकीं करना नहीं 

झूठ की इस आग में ही घर धुवां हो जायेंगे 

ये सफर तन्हा नहीं है साथ गम यादें तेरी 

गम…

Continue

Posted on July 31, 2018 at 5:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल .....

22  22  22  22  

गाता जाए एक दिवाना

दुनिया यारो पागलखाना

परदेश बनाया घर लेकिन

घर मे कम है एक सयाना

इससे आगे सोच ना पाऊं

बीबी बच्चे और ठिकाना

केक खिलाया साल बढ़ाए

भूल गया पर उम्र घटाना

एक शिगूफा छोड़ेगा फिर

अबके राजा भौत सयाना

मौलिक व अप्रकाशित

Posted on June 16, 2018 at 5:52pm — 10 Comments

 
 
 

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