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ऐसी ही रहना तुम (नवगीत)

जैसी हो

अच्छी हो

ऐसी ही रहना तुम

कांटो की बगिया में

तितली सी उड़ जाना

रस्ते में पत्थर हो

नदिया सी मुड़ जाना

भँवरों की…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 19, 2019 at 10:42am — 1 Comment

ग़ज़ल

जरुरी नहीं वो भला हो
अगर सच भी जो बोलता हो

रहे गुण सभी आदमी में
मुसीबत में तो काम का हो

बहुत जानता तो अच्छा
नहीं जानता क्या बुरा हो

हमेशा ही सच्चाई जीते
है कोई जो ना जानता हो

जो मारे है अंदर का रावण
उसी का ही बस दशहरा हो

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Added by dandpani nahak on October 18, 2019 at 11:30am — 2 Comments

अहसास की ग़ज़ल

1222   1222   1222   1222

मुहब्बत के नगर में आँसुओं के कारखाने है,

यहां रहकर पुराने जन्म के कर्ज़े चुकाने हैं.

सड़क पर आके देखों तो झुलस जाओगे शिद्दत से,

समाचारों में तो इस दौर के मौसम सुहाने हैं.

उतर आया अब आँखों में आंगन में भरा पानी,

मेरी चाहत के अफसाने में पटना के फसाने हैं.

फलक पर चाँद चाहे चौथ का हो या हो पूनम का,

हमें त्यौहार सब परदेस में तन्हा मनाने हैं.

कहाँ पे आके बिगड़ी ये कहानी…

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Added by Manoj kumar Ahsaas on October 17, 2019 at 8:51pm — 1 Comment

ग़ज़ल - चरागाँ इक मुहब्बत का जला दो तुम

1222 1222 1222

चरागाँ इक मुहब्बत का जला दो तुम,

अभी उन्वान रिश्ते को नया दो तुम ।

फ़ना ही हो गये जो इश्क़ कर बैठे,

ज़हर है ये,ज़हर ही तो पिला दो तुम ।

हया कायम रहे,कब तक मुहब्बत में,

ज़रा पर्दा शराफत का उठा दो तुम…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'सागर' on October 17, 2019 at 8:44pm — 5 Comments

ग़ज़ल: वक़्त की शतरंज पर किस्मत का एक मोहरा हूँ मैं।

2122 2122 2122 212
.
वक़्त की शतरंज पर किस्मत का एक मोहरा हूँ मैं। 
ज़िंदगी इतना भी ख़ुश मत हो, अभी ज़िंदा हूँ मैं। 
.
मैं ख़ुदा की हाज़िरी में भी न बदलूँगा बयान, 
तुझको हाज़िर और नाज़िर जानकार कहता हूँ मैं। 
.
एक ही घर में बसर करना मुहब्बत तो नहीं, 
आज भी तेरी ख़ुशी…
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Added by Balram Dhakar on October 16, 2019 at 10:00pm — 8 Comments

थामूँ तोरी बाँहे गोरी / तिन्ना छंद

2 2 2 2

चोरी-चोरी।
ओ री छोरी।
थामूँ तोरी।
बाँहे गोरी।

जागे नैना।
पूरी रैना।
खोएँ चैना।
भूले बैना।

आजा चूमूँ।
थोड़ा झूमूँ।
सांसे घोलूँ।
तेरा होलूँ।

- विमल शर्मा 'विमल'
स्वरचित

Added by विमल शर्मा 'विमल' on October 16, 2019 at 12:59pm — 3 Comments

स्वप्न-सृष्टि

 स्वप्न-सृष्टि

 

बुझते  दिन  का  सहारा  बनी 

गहन  गंभीर  अभागी  शाम

मन  में  अब  अपने  ही  पुराने  घाव  की

मौन  वेदना  की  गुथियाँ  समेटती

बूँद-बूँद  गलती

पहले  स्वयं  सरकती-सी  रात  की ओर

अंधेरा  होते  ही  फिर  घसीट लेती  है  रात

बेरहमी  से अपनी काली कोठरी  में …

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Added by vijay nikore on October 15, 2019 at 4:30am — 1 Comment

अहसास की ग़ज़ल

2×16

इश्क रुई के जैसा है पर,ग़म से रिश्ता मत कर लेना.

लेकर चलने में आफत हो इतना गिला मत कर लेना.

एक समय ऐसा आता है, सूरज भी मुरझा जाता है,

चार दिनों की गर्दिश में तुम दामन मैला मत कर लेना.

लाख बहाने पास है उसके, अब तो खफा होने के मुझसे,

किंतु मना लेने में उसको अना को रुसवा मत कर लेना.

सबसे अच्छे शब्दों में तुम अपनी बात बता सकते हो,

लेकिन कोई समझ भी लेगा इसका भरोसा मत कर लेना.

व्याकुल माता बचपन से ही बच्चों को…

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Added by Manoj kumar Ahsaas on October 15, 2019 at 2:01am — 3 Comments

ज़िन्दगी का वह हिस्सा

अनपेक्षित तज्रिबों को  लीलती हुई

मन में सहसा उठते घिरते

उलझी रस्सी-से खयालों को ठेलती

गलियाँ पार करती  चली आती थी तुम

तब साथ तुम्हारा था

साहस हमारा

तुम्हारी मनोहर महक

थी दमकती हवाओं का उत्साह

और तुम्हारे चेहरे की चमक 

थी हमारी शाम की अजब रोशनी

और मैं ...

तुम्हारी बातें सुनते नहीं थकता था

हँसी के पट्टे पर कूदते-खेलते

बीच हमारे कोई सरहदें

सीमाएँ न थीं

समय के पल्लू में…

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Added by vijay nikore on October 14, 2019 at 9:23am — 7 Comments

कविता(मुक्तछंद) - डटे रहो

डटे रहो तुम अपने पथ पर,

इक दिन दुनिया ये डोलेगी ।

जल,थल और आकाश में जनता,

तेरी ही बोली बोलेगी ।।

कभी डरो ना असफलता से,

स्वाद तुम्हें जो जीत का चखना ।

व्यंग्य करें कितने ही…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'सागर' on October 13, 2019 at 6:19pm — 1 Comment

अहसास की ग़ज़ल

1222     1222      122

जमाने भर की बातें सोचता हूँ

मगर मैं खुद में अब कितना बचा हूँ

सुहानी भोर किस्मत में नहीं है

भला मैं रात भर क्यों जागता हूँ

मुहब्बत एक हरजाई का घर है

मैं उस घर से निकाला जा चुका हूँ

तरफदारी से तेरी क्या है हासिल

मैं अपनों में अकेला पड़ गया हूँ

गुजारी जिंदगी सारी जहाँ पर

मैं अब उस शहर में बिल्कुल नया हूँ

तुझे आवाज देने का सबब है

मैं अब तन्हाई से डरने लगा…

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Added by Manoj kumar Ahsaas on October 13, 2019 at 4:28pm — 4 Comments

किस्से हैं, कहानी है

किस्से हैं , कहानी है

दुनिया अनजानी है

कोई कब आएगा ?

कोई कब जाएगा ?

कौन जानता भला ?

केवल रवानी है

किस्से हैं - -

अभी तो यहीं था

कैसे चला गया ?

बार-बार दोहराती

बात पुरानी है

किस्से हैं - -

ख़ाली ही आया धा

ख़ाली विदा हुआ

बार -बार पाने की

ज़िद , दीवानी है

किस्से हैं - -

निर्मोही देह में

मोह पोसा गया

पाया न मनभाया

नित- नित कोसा गया

फिर…

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Added by Usha Awasthi on October 12, 2019 at 9:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल- ज़िन्दगी में

2212 122 2212 122

थम ही नहीं रही है,रफ़्तार ज़िन्दगी में ।

हर दर्द की दवा है,बस प्यार ज़िन्दगी में ।।

बैठो न चुप दबाके, तुम राज़ सारे दिल के ।

जज़्बात का ज़रूरी,इज़हार ज़िन्दगी में ।।

माशूक़ से कलह का,यूं ग़म न कीजियेगा…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'सागर' on October 12, 2019 at 9:00pm — 2 Comments

माँ .....

माँ .....

सुनाता हूँ

स्वयं को

मैं तेरी ही लोरी माँ

पर

नींद नहीं आती

गुनगुनाता हूँ

तुझको

मैं आठों पहर

पर

तू नहीं आती

पहले तो तू

बिन कहे समझ जाती थी

अपने लाल की बात

अब तुझे क्यूँ

मेरी तड़प

नज़र नहीं आती

मेरे एक-एक आँसू पर

कभी

तेरी जान निकल जाती थी माँ

अब क्यूँ अपने पल्लू से

पोँछने मेरे आँसू

तू

तस्वीर से

निकल नहीं…

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Added by Sushil Sarna on October 12, 2019 at 8:27pm — 4 Comments

नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ (६६)

(१२२२ १२२२ १२२ )

.

नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ

ख़ुदाया मैं भी कुछ खुशियाँ मना लूँ

**

मुझे भी तो अता कर चन्द मौक़े

ख़ुदा मैं भी तो जीवन का मज़ा लूँ

**

मुहब्बत में तिरी है जीत पक्की

भला फिर किसलिए सिक्का उछालूँ

**

हवा जब खुशबुएँ बिखरा रही है

ख़लल क्यों काम में बेकार डालूँ

**

पुराने दोस्त क्या कम हैं किसी से…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on October 12, 2019 at 10:30am — 5 Comments

वो ईश तो मौन है ...

वो ईश तो मौन है ...

नैनों के यथार्थ को

शब्दों के भावार्थ को

श्वास श्वास स्वार्थ को

अलंकृत करता कौन है

वो ईश तो मौन है

रिश्तों संग परिवार को

छोरहीन संसार को

नील गगन शृंगार को

अलंकृत करता कौन है

वो ईश तो मौन है

अदृश्य जीवन डोर को

सांझ रैन और भोर को

जीवन के हर छोर को

अलंकृत करता कौन है

वो ईश तो मौन है

कौन चलाता पल पल को

कौन बरसाता बादल को

नील व्योम के आँचल को…

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Added by Sushil Sarna on October 11, 2019 at 6:23pm — 2 Comments

प्यार

 फूलो की

वादियों से गुजरते हुए

तमाम खिली रौनकों के बीच  

हठात वह

मन को खींच लेता है

एक अदना सा फूल

 

जिसके आगे

हो जाते है

आसमान  के सितारे फीके

नीरस लगते है

प्रकृति  के सारे उपादान

  

बेचैन मन को

तब निखिल ब्रह्मांड में

यदि  कुछ भाता है

तो सिर्फ वही

अदना सा फूल

 

बन जाता है जब

अपनी सहजता और सादगी में

साधारण सा वह

अपने  ही…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 11, 2019 at 2:05pm — 3 Comments

कविता-हिम्मत तो ज़रा कर

राहों की इन मुश्किलों से,इंसा तू न डर । 

पानी है तुझे मंजिल,हिम्मत तो ज़रा कर ।।

कि जाना है तुझे अभी,फ़लक से भी आगे । 

दुनिया ये सारी फिर,पीछे तेरे भागे ।।

छोटी-छोटी हारों से,ना खुद को दुखी कर ।

पानी है…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'सागर' on October 10, 2019 at 10:30pm — 2 Comments

जाते हो बाजार पिया (नवगीत)

जाते हो बाजार पिया तो 

दलिया ले आना

आलू, प्याज, टमाटर 

थोड़ी धनिया ले आना

आग लगी है सब्जी में 

फिर भी किसान भूखा

बेच दलालों को सब 

खुद…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 10, 2019 at 10:05pm — 11 Comments

ग़ज़ल..डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था-बृजेश कुमार 'ब्रज'

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212   1212    1212    1212



निगाह  में उदासियां  छुपा हुआ अज़ाब था

डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था

दिखी नहीं कली कहीं ख़ुशी से कोई झूमती

लबों लबों कराह और आँख आँख आब था

चमन में छा रही थीं बेशुमार बदहवासियां

न  टेसुओं  पे नूर था  न सुर्खरू  गुलाब था

मिला न साथ दे सका जो चाहिए मिला नहीं

थी चार दिन की ज़िंदगानी दर्द बेहिसाब था

फ़ुज़ूल थे सवाल और चीखना फ़ुज़ूल…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 10, 2019 at 12:30pm — 7 Comments

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