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वादे पर चन्द दोहे .......

वादे पर चन्द दोहे : ....

मीठे वादे दे रही, जनता को सरकार ।

गली-गली में हो रहा, वादों का व्यापार ।1।

जीवन भर नेता करे, बस कुर्सी से प्यार ।

वादों के व्यापार में, पलता भ्रष्टाचार ।2।

जनता को ही लूटती,जनता की सरकार ।

जम कर देखो हो रहा, वादों का व्यापार ।3।

जनता जाने झूठ है, नेता की हर बात ।

झूठे वादों को मगर, माने वो सौगात ।4।

भाषण में प्रवीण जो ,नेता वही महान ।

वादों से वो भूख का, करता सदा निदान…

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Added by Sushil Sarna on October 17, 2021 at 4:33pm — No Comments

ग़ज़ल - फिर ख़ुद को अपने ही अंदर दफ़्न किया

वज़्न - 22 22 22 22 22 2

उनसे मिलने का हर मंज़र दफ़्न किया

सीपी-आँखों में इक गौहर दफ़्न किया

दिल ने हर पल याद किया है उनको ही

जिनको अक़्ल ने दिल में अक्सर दफ़्न किया

ख़्वाब उनकी क़ुर्बत के टूटे तो हमने

इक तुरबत को घर कहकर घर दफ़्न किया

उनका शाद ख़याल आने पर भी हमने

कब अपने अंदर का मुज़तर दफ़्न किया

मुझमें ज़िंदा हैं मेरे अजदाद सभी

मौत सुनो तुमने बस पैकर दफ़्न किया

ग़ैर-मुजस्सम…

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Added by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 16, 2021 at 8:59pm — No Comments

अपने दोहे .......

अपने  दोहे .......

पत्थर को पूजे मगर, दुत्कारे इन्सान ।

कैसे ऐसे जीव का, भला करे भगवान ।1।

पाषाणों को पूजती, कैसी है सन्तान ।

मात-पिता की साधना, भूल गया नादान ।2।

पूजा सारी व्यर्थ है, दुखी अगर माँ -बाप ।

इससे बढ़कर  सृृष्टि में , नहीं दूसरा  पाप।3।

सच्ची पूजा का नहीं, समझा कोई अर्थ ।

बिना कर्म संंसार में,अर्थ सदा है व्यर्थ ।4।

मन से जो पूजा करे, मिल जाएँ भगवान ।

पत्थर के भगवान में, आ जाते हैं प्रान…

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Added by Sushil Sarna on October 16, 2021 at 3:21pm — 4 Comments

ग़ज़ल (ग़ज़ल में ऐब रखता हूँ...)

1222 - 1222 - 1222 - 1222

ग़ज़ल में ऐब रखता हूँ  कि वो इस्लाह कर जाते 

फ़क़त इक दाद देने  कम ही आते हैं गुज़र जाते 

न हो उनकी नज़र तो बाँध भी पाता नहीं मिसरा 

ग़ज़ल हो नज़्म हो अशआर मेरे सब बिखर जाते

हुई  मुद्दत  नहीं  मैं भी  'मुरस्सा' नज़्म कह पाया 

ग़ज़ल पे सरसरी नज़रों से ही वो भी गुज़र जाते

अरूज़ी  हैं  अदब-दाँ  वो  हमें  बारीक-बीनी  से 

न देते इल्म की दौलत  तो कैसे हम निखर जाते

मिले…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 14, 2021 at 6:10pm — 16 Comments

ग़ज़ल (दिलों से ख़राशें हटाने चला हूँ )

122 - 122 - 122 - 122

(भुजंगप्रयात छंद नियम एवं मात्रा भार पर आधारित ग़ज़ल का प्रयास) 

दिलों  में उमीदें  जगाने  चला हूँ 

बुझे दीपकों को जलाने चला हूँ 

कि सारा जहाँ देश होगा हमारा 

हदों के निशाँ मैं मिटाने चला हूँ 

हवा ही मुझे वो  पता  दे गयी है 

जहाँ आशियाना बसाने चला हूँ

चुभा ख़ार सा था निगाहों में तेरी 

तुझी से निगाहें  मिलाने चला हूँ

ख़तावार  हूँ  मैं  सभी दोष …

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 14, 2021 at 3:13pm — 29 Comments

ग़ज़ल नूर की - तमन्नाओं को फिर रोका गया है

तमन्नाओं को फिर रोका गया है

बड़ी मुश्किल से समझौता हुआ है.

.

किसी का खेल है सदियों पुराना

किसी के वास्ते मंज़र नया है.

.

यही मौक़ा है प्यारे पार कर ले

ये दरिया बहते बहते थक चुका है.

.

यही हासिल हुआ है इक सफ़र से  

हमारे पाँव में जो आबला है.

.

कभी लगता है अपना बाप मुझ को  

ये दिल  इतना ज़ियादा टोकता है.

.

नहीं है अब वो ताक़त इस बदन में

अगरचे खून अब भी खौलता है.

.

हम अपनी आँखों से ख़ुद देख आए

वहाँ बस…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 14, 2021 at 9:00am — 12 Comments

विदाई के वक़्त बेटी के उद्गार

छोड़ बसेरा  बचपन का  अब, दूजे  घर को जाना है

रीत बनी है इस जग की जो, उसको मुझे निभाना है

लेकिन मन  में प्रश्न  बहुत हैं, उनमें  पापा  खोने दो

पल  भर में मैं  हुई पराई, मुझको  खुल कर रोने दो

घर आँगन  की मधुर सुवासित, पापा मैं कस्तूरी थी

जन्मी थी तो बोले थे तुम, बिटिया बहुत जरूरी थी

कल तक  तेरी  ही गोदी  में, पापा मैं तो सोती थी

तुम्हे न पाती थी जब घर में, मार  दहाड़े  रोती थी

भूल गए क्यों सारी बातें, मुझसे क्यों मुँह…

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Added by नाथ सोनांचली on October 13, 2021 at 10:52am — 8 Comments

ग़ज़ल -सूनी सूनी चश्म की फिर सीपियाँ रह जाएँगी

वज़्न - 2122 2122 2122 212

ज़ीस्त की शीरीनियों से दूरियाँ रह जाएँगी

बिन तुम्हारे महज़ मुझ में तल्ख़ियाँ रह जाएँगी

वक़्त-ए-रुख़सत अश्क के गौहर लुटाएँगी बहुत

सूनी सूनी चश्म की फिर सीपियाँ रह जाएँगी

रेत पर लिख कर मिटाई हैं जो तुमने मेरे नाम

ज़ह्न में महफ़ूज़ ये सब चिट्ठियाँ रह जाएँगी

बातें मूसीक़ी-सी तेरी हैं मगर कल मेरे साथ

गुफ़्तगू करती हुई ख़ामोशियाँ रह जाएँगी

एक घर हो घर में तुम हो तुमसे सारी…

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Added by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 11, 2021 at 8:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल - मिश्कात अपने दिल को बनाने चली हूँ मैं

वज़्न -221 2121 1221 212

हस्ती में उसकी ख़ुद को मिलाने चली हूँ मैं

यानी कि अपने आप को पाने चली हूँ मैं

दरिया सिफ़त हूँ आब है मुझ में उसी का और

जानिब उसी की प्यास बुझाने चली हूँ मैं

रौशन चराग़ सा वो रहे मुझ में इसलिए

मिश्कात* अपने दिल को बनाने चली हूँ मैं

जिस ख़ाक से बनी हूँ फ़ना उस में ख़ुद को कर

मिट्टी वजूद अपना बचाने चली हूँ मैं

जब वो है मेरे गिर्द हवा-सा तो किस लिए

अपने क़रीब उस को बुलाने चली हूँ मैं

रहकर बदन की क़ैद में…

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Added by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 10, 2021 at 5:42pm — 7 Comments

ग़ज़ल: किसी कँवल का हंसीं ख़ाब देखने के लिये

1212 1122 1212 112

किसी कँवल का हंसीं ख़ाब देखने के लिये

किसी के हुस्न का सैलाब देखने के लिये

कहाँ थे देखो सनम हम कहाँ चले आये

वो गुलबदन वो आब ओ ताब देखने के लिये

न जाने कब से हक़ीक़त की थी तलब हमको

न जाने कब से थे बेताब देखने के लिये

छुआ तो जाना हर इक ख़ाब था धुंआ यारो

बचा न कुछ भी याँ नायाब देखने के लिये

करीब जा के हर एक चीज खोयी है हमने

लुटे हैं खुद को ही ईजाब देखने के…

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Added by Aazi Tamaam on October 10, 2021 at 12:15pm — 5 Comments

ग़ज़ल: संगदिल गर ज़िन्दगी है उस से टकराना भी क्या ...!

संगदिल गर ज़िन्दगी  है उससे टकराना भी क्या ।

फोड़कर सर अपना यारो रोना चिल्लाना भी क्या ।।

ज़िन्दगी गर है चुनौती मुँह छिपाकर जीना क्या ।

हाथ  दो - दो होने  दो फिर सच को झुठलाना भी क्या 

कीमती आँसू हैं तेरे वो निशाँ जुल्म ओ सितम, 

बंद दरवाजों के आगे  सर वो फुड़वाना भी  क्या ।

कर खुदा की  बन्दगी  और एहतराम उसका  कर ले, 

लोग  ही क़मज़र्फ हैं गर उनको जतलाना भी  क्या ।

नोंचनी  लाशें हैं उनको कौम को है…

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Added by Chetan Prakash on October 10, 2021 at 7:25am — No Comments

मुक्तक (आधार छंद - रोला )

मुक्तक

आधार छंद - रोला

10-10-21

छूट गए सब संग ,देह से साँसें छूटी ।

झूठी देकर आस, जगत ने खुशियाँ लूटी ।

रिश्तों के सब रंग ,बदलते हर पल जग में -

कैसे कह दें श्वास ,देह से कैसे टूटी ।

---------------------------------------------------

बहके-बहके नैन, करें अक्सर मनमानी ।

जीने के दिन चार, न बीते कहीं जवानी ।

अक्सर होती भूल, प्यार की रुत जब आती -

भर देती है शूल, जवानी मैं नादानी  ।

सुशील सरना…

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Added by Sushil Sarna on October 9, 2021 at 4:38pm — 4 Comments

ग़ज़ल

22, 22, 22, 22,

1)कितनी बातें करते हो तुम

ख़ाली बातें करते हो तुम

2)तुमको कोई मरज़ है क्या बस

अपनी बातें करते हो तुम

3) सीधा बंदा हूँ क्यों मुझसे

उल्टी बातें करते हो तुम

4)छुप कर मिलने क्यों आऊँ मैं

ख़ाली बातें करते हो तुम

5)होने लगता है कुछ दिल में

जब भी बातें करते हो तुम

6) चाँद सितारों से क्या अब भी

मेरी बातें करते हो…

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Added by Md. Anis arman on October 7, 2021 at 8:42pm — 1 Comment

हे राम (लघुकथा)-

मोहन दास जब यमराज के सामने पहुंचे,"मोहन जी, जब आपको गोलियाँ लग गयीं और आप लगभग मरणासन्न हो गये तो उस वक्त राम को पुकारने का क्या तात्पर्य था?”

"महोदय, आप मेरे "हे राम" उच्चारण का अर्थ शायद समझ नहीं सके।

"क्या इसमें भी कोई गूढ़ रहस्य है? मेरे विचार से तो यह एक मरते हुए व्यक्ति द्वारा अपने इष्ट देव से अपनी रक्षा हेतु मात्र एक याचना…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 7, 2021 at 11:30am — 5 Comments

ग़ज़ल-रो पड़ेगा....बृजेश कुमार 'ब्रज'

1222     1222      122   

मिलेगा और  मिल  कर रो पड़ेगा

मुझे  देखेगा  तो  घर  रो  पड़ेगा



न जाने क्यों कहाँ खोया रहा हूँ

मेरी  आहट पे ही दर   रो पड़ेगा



मुझे  वो  भूल  जाने  के  लिये ही

करेगा  याद  अक़्सर  रो  पड़ेगा



हँसी मुस्कान होंठों  पे  सजाकर

कोई  इंसान  अंदर  रो  पड़ेगा



भले  ही  मौत  दे  देगा  मुझे पर

वो क़ातिल और खंज़र रो पड़ेगा



तुम्हारी आँख  से आँसू बहे गर

यहाँ  'ब्रज' में समंदर रो…
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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 5, 2021 at 3:00pm — 10 Comments

श्रध्दांजलि

बेमौसम पतझड़ आया हो जैसे

पेड़ से झड़ते पत्तों-सी थर्राती

परिक्लांत पक्षी की पुकार

बींधती कराह-सी

सारी हवा में घुल गई

शोक समाचार को सुनते ही

आज अचानक

हवा जहाँ कहीं भी थी

वहीं की वहीं रूक गई

कि जैसे वह दिवंगत आत्मा

मेरे मित्र

केवल तुम्हारी माँ ही नहीं, वह तो

सारी सृष्टि की माँ रही

पेड़, पत्ते, पक्षी, मुझको, तुमको

एक संग सभी को

आज अनाथ कर गई

 

पुनर्जन्म सच है यदि तो कैसे कह…

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Added by vijay nikore on October 3, 2021 at 3:00pm — 1 Comment

ग़ज़ल नूर की - जिस दिन से इकतरफ़ा रिश्ता टूट गया

जिस दिन से इकतरफ़ा रिश्ता टूट गया 

सुनते हैं वो पागल लड़का टूट गया.

.

थामा ही था हाथ तुम्हारा मैंने बस

और अचानक मेरा सपना टूट गया.

.

अब ये आँखें कोई ख्वाब नहीं बुनतीं

पिछली नींद में मेरा करघा टूट गया.

.

अपने लालच को तुम काबू में रक्खो

वो देखो इक और सितारा टूट गया.

.

एक ज़रा सी बात से बातें यूँ बिगडीं

फिर तो जैसे हर समझौता टूट गया.

.

आप अदू से दूर हुए ये नेमत है

बिल्ली की क़िस्मत से छींका टूट गया.

.

कह…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 3, 2021 at 9:30am — 17 Comments

कैसे कैसे लोग यहाँ -(गजल)-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



छीन के उनका पूरा बचपन कैसे कैसे लोग यहाँ

काट रहे हैं  अपना  जीवन  कैसे कैसे लोग यहाँ।२।

*

पाने को यूँ नित्य शिखर को साथी देखो दौड़े जो

कर बैठे औरों  को  साधन  कैसे  कैसे लोग यहाँ।२।

*

स्वार्थ सधे तो अपनों से भी झूठ छिपाने साथी यूँ

कीचड़ को कह  देते  चन्दन कैसे कैसे लोग यहाँ।३।

*

साध न पाये यार सियासत उस खुन्नस में देखो तो

बाँट रहे हैं मन का …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 3, 2021 at 6:30am — 10 Comments

शास्त्री जी

अगर राष्ट्रपिता के नाम से महात्मा गांधी को याद किया जाता है वही उजास की लकीर बिखेरने। वाले नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में शास्त्री जी को याद किया जाता है। संपूर्ण भारतीयता का उदाहरण शास्त्री जी के विषय में राम मनोहर लोहिया जी ने कहा था कि भारतीयता को जो तीन कसौटियाँ भाषा भूसा और भवन बांधी थी, शास्त्री जी उसका स्पष्ट प्रतिबिंब हैं। सादगी प्रिय शास्त्री जी करूणामयी अग्रगामी सोच वाले ऐसे दार्शनिक प्रधानमंत्री थे जिनके संस्कार व नैतिकता व्यक्तिवाद और परिवारवाद से परे थी। अपने पद व प्रतिष्ठा…

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Added by babitagupta on October 2, 2021 at 3:28pm — 3 Comments

ग़ज़ल-घर बसाना था

2122 / 1212 / 22





1

दिल का रिश्ता यूँ भी निभाना था

फिर से रूठा ख़ुदा मनाना था

2

चार ईंटें टिका के निस्बत की

आदमीयत का घर बसाना था…

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Added by Rachna Bhatia on October 2, 2021 at 12:23pm — 7 Comments

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