For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (16,606)

पुरानी पहचान-लघुकथा

"अरे, उस भलेमानस के पास जाना है, चलिए मैं ले चलता हूँ", सामने वाले व्यक्ति ने जब उससे यह कहा तो उसे एकबारगी भरोसा ही नहीं हुआ. अव्वल तो लोग आजकल किसी का पता जानते ही नहीं, अगर जानते भी हैं तो एहसान की तरह बताते हैं. और राकेश के बारे में उसकी राय तो भलेमानस की बिलकुल ही नहीं थी.

चंद साल ही तो हुए हैं जब राकेश उसकी टोली का सबसे खतरनाक सदस्य हुआ करता था. किसी को भी मारना पीटना हो, धमकाना हो या वसूली करनी हो तो राकेश सबसे आगे रहता था. और इसी वजह से उसे एक प्राइवेट फाइनेंस कंपनी में नौकरी भी…

Continue

Added by विनय कुमार on April 25, 2019 at 7:14pm — No Comments

महाभुजंगप्रयात छंद में पहली रचना

नहीं वक़्त है ज़िन्दगी में किसी की, सदा भागते ही कटे जिन्दगानी
कभी डाल पे तो कभी आसमां में, परिंदों सरीखी सभी की कहानी
ख़ुशी से भरे चंद लम्हे मिले तो, गमों की मिले बाद में राजधानी
सदा चैन की खोज में नाथ बीते, किसी का बुढ़ापा किसी की जवानी।।

शिल्प-लघु-गुरु-गुरु (यगण)×8 

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on April 25, 2019 at 6:47am — No Comments

नफ़स की धुन नही थमीं...

परिवार :-

हजज़ मुरब्बा मक़बूज

अरकान :-  मुफाइलुन मुफाइलुन (1212-1212)

मुझे  उसी  से प्यार हो ।।

जो तीर दिल के पार हो ।।

पहाड़ जैसी' जिंदगी ।

कोई तो दाबे'दार हो।।

सवाल  बस मेरा यही ।

अदब ओ ऐतबार हो।।

नफ़स की  धुन नहीं थमीं ।

कोई भी कितना यार हो।।

फ़क़त…

Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on April 24, 2019 at 11:19pm — No Comments

जाल .... ( 4 5 0 वीं कृति)

जाल .... ( 4 5 0 वीं कृति)

बहती रहती है

एक नदी सी

मेरे हाथों की

अनगिनित अबोली रेखाओं में

मैं डाले रहता हूँ एक जाल

न जाने क्या पकड़ने के लिए

हाथ आती हैं तो बस

कुछ यातनाएँ ,दुःख और

काँच की किर्चियों सी

चुभती सच्चाईयाँ

डसते हैं जिनके स्पर्श

मेरे अंतस में बहती

जीत और हार की धाराओं को

काले अँधेरों में भी मुझे

अव्यक्त अभियक्तियों के रँग

वेदना के सुरों पर

नृत्य करते नज़र आते हैं

नदी

हाथों की…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 24, 2019 at 1:24pm — No Comments

एक ग़ज़ल मनोज अहसास

22  22  22  22  22  22  22  2

एक ताज़ा ग़ज़ल

आदमी सोच के कुछ चलता है,दुनिया में हो जाता कुछ।

मानव की इच्छाएं कुछ है, अर मालिक का लेखा कुछ ।

अपने अपने दुख के साये मैं हम दोनों जिंदा है ,

तू क्या समझे,मैं क्या समझूं, तेरा कुछ है, मेरा कुछ ।

दुनिया के ग़म ,रब की माया और सियासत की बातें ,

खुद से बाहर आ सकता तो, इन पर भी लिख देता।

एक जरा सी बात हमारी हैरानी का कारण है,

ख्वाब में हमने कुछ देखा था ,आंख खुली तो…

Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on April 23, 2019 at 10:51pm — 1 Comment

पत्ता परिवर्तन / लघुकथा

वह ताश की एक गड्डी हाथ में लिए घर के अंदर चुपचाप बैठा था कि बाहर दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने दरवाज़ा खोला तो देखा कि बाहर कुर्ता-पजामाधारी ताश का एक जाना-पहचाना पत्ता फड़फड़ा रहा था। उस ताश के पत्ते के पीछे बहुत सारे इंसान तख्ते लिए खड़े थे। उन तख्तों पर लिखा था, "यही है आपका इक्का, जो आपको हर खेल जितवाएगा।"

 

वह जानता था कि यह पत्ता इक्का नहीं है। वह खीज गया, फिर भी पत्ते से उसने संयत स्वर में पूछा, "कल तक तो तुम अपनी गड्डी छोड़ गद्दी पर बैठे थे, आज इस खुली सड़क में फड़फड़ा…

Continue

Added by Chandresh Kumar Chhatlani on April 23, 2019 at 10:20pm — 1 Comment

लड़की (लघुकथा)

अम्मा को चारपाई पर लेटे देख बिटिया किशोरी भी उसके बगल में लेट गई और दोनों हाथों से उसे घेर कर कसकर सीने से लगाकर चुम्बनों से अपना स्नेह बरसाने लगी। इस नये से व्यवहार से अम्मा हैरान हो गई। उसने अपनी दोनों हथेलियों से बिटिया का चेहरा थामा और फ़िर उसकी नम आंखों को देख कर चौंक गई। कुछ कहती, उसके पहले ही बिटिया ने कहा :



"अम्मा तुम ज़मीन पे चटाई पे लेट जाओ!"



जैसे ही वह लेटी, किशोरी अपनी अम्मा के पैर वैसे ही दाबने लगी, जैसे अम्मा अपने मज़दूर पति के अक्सर दाबा करती…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 23, 2019 at 6:19pm — 1 Comment

गरीबी न दे ऐ खुदा जिंदगी में-रामबली गुप्ता

महाभुजंगप्रयात सवैया

कड़ी धूप या ठंड हो जानलेवा न थोड़ी दया ये किसी पे दिखाती।
कि लेती कभी सब्र का इम्तिहां और भूखा कभी रात को ये सुलाती।।
जरूरी यहाँ धर्म-कानून से पूर्व दो वक्त की रोटियाँ हैं बताती।
गरीबी न दे ऐ खुदा! जिंदगी में कि इंसान से ये न क्या क्या कराती?

शिल्प-लघु गुरु गुरु(यगण)×8

रचनाकार- रामबली गुप्ता

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on April 23, 2019 at 5:23pm — 1 Comment

प्रतीक्षा लौ ...

प्रतीक्षा लौ ...

जवाब उलझे रहे

सवालों में

अजीब -अजीब

ख्यालों में

प्रतीक्षा की देहरी पर

साँझ उतरने लगी

बेचैनियाँ और बढ़ने लगीं

ह्रदय व्योम में

स्मृति मेघ धड़कने लगे

नैन तटों से

प्रतीक्षा पल

अनायास बरसने लगे

सवाल

अपने गर्भ में

जवाबों को समेटे

रात की सलवटों पर

करवटें बदलते रहे

अभिव्यक्ति

कसमसाती रही

कौमुदी

खिलखिलाती रही

संग रैन के

मन शलभ के प्रश्न

बढ़ते रहे

जवाब…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 22, 2019 at 6:25pm — 5 Comments

"ओ आली, कौन अली; कौन महाबली?" (लघुकथा) :

छकपक ... छकपक ... करती आधुनिक रेलगाड़ी बेहद द्रुत गति से पुल पर से गुजर रही थी। नीचे शौच से फ़ारिग़ हो रहे तीन प्रौढ़ झुग्गीवासी बारी-बारी से लयबद्ध सुर में बोले :



पहला :



"रेल चली भई रेल चली; पेल चली उई पेल चली!"



दूसरा :



"खेल गई रे खेल गई; खेतन खों तो लील गई!"



फ़िर तीसरा बोला :



"ठेल चली; हा! ठेल चली; बहुतन खों तो भूल चली!"



दूर खड़े अधनंगे मासूम तालियां नहीं बजा रहे थे; एक-दूसरे की फटी बनियान पीछे से पकड़ कर छुक-छुक…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 22, 2019 at 3:32pm — No Comments

कनक मंजरी छंद "गोपी विरह"

कनक मंजरी छंद "गोपी विरह"

तन-मन छीन किये अति पागल,

हे मधुसूदन तू सुध ले।

श्रवणन गूँज रही मुरली वह,

जो हम ली सुन कूँज तले।।

अब तक खो उस ही धुन में हम,

ढूंढ रहीं ब्रज की गलियाँ।

सब कुछ जानत हो तब दर्शन,

देय खिला मुरझी कलियाँ।।

द्रुम अरु कूँज लता सँग बातिन,

में यह वे सब पूछ रही।

नटखट श्याम सखा बिन जीवित,

क्यों अब लौं, निगलै न मही।।

विहग रहे उड़ छू कर अम्बर,

गाय रँभाय रही सब हैं।

हरित सभी ब्रज के तुम पादप,

बंजर…

Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 22, 2019 at 10:54am — 2 Comments

आम चुनाव और समसामायिक संवाद (लघुकथाएं) :

(1).चेतना :



ग़ुलामी ने आज़ादी से कहा, "मतदाता सो रहा है, उदासीन है या पार्टी-प्रत्याशी चयन संबंधी किसी उलझन में है, उसे यूं बार-बार मत चेताओ; हो सकता है वह अपने मुल्क में किसी ख़ास प्रभुत्व या किसी तथाकथित हिंदुत्व या किसी इमरजैंसी के ख़्वाब बुन रहा हो!"

आज़ादी ने उसे जवाब दिया, "नहीं! हमारे मुल्क का मतदाता न तो सो रहा है; न ही उदासीन है और न ही किसी उलझन में है! उसे चेताते रहना ज़रूरी है! हो सकता है कि वह तुष्टीकरण वाली सुविधाओं, योजनाओं, क़ानूनों से आज़ादी का मतलब भूल गया हो या…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 21, 2019 at 3:30pm — 1 Comment

कोई तो दीद के क़ाबिल है आया

1222-1222-122

श'हर  में शोर ये  फैला हुआ है ।।

पडोसी गाँव में मुजरा हुआ है।।

कोई तो दीद के क़ाबिल  है आया ।

यहाँ दो दिन से ही परदा हुआ है।।

वतन की आबरू कैसे बचाए।

म'सलतन आज ही सौदा हुआ है।।

जरा देखूं सराफ़त छोड़ कर के ।

सुना है नाम कुछ अच्छा हुआ है।।

अजां पढ़ ले या बुत की आरती को ।

सभी कुछ आज…

Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on April 21, 2019 at 10:47am — 1 Comment

अधूरी सी ज़िंदगी ....

अधूरी सी ज़िंदगी ....

कुछ

अधूरी सी रही

ज़िंदगी

कुछ प्यासी सी रही

ज़िंदगी

चलते रहे

सीने से लगाए

एक उदास भरी

ज़िंदगी

जीते रहे

मगर अनमने से

जाने कैसे

गुफ़्तगू करते

कट गयी

अधूरी सी ज़िंदगी

ढूंढते रहे

कभी अन्तस् में

कभी जिस्म पर रेंगते

स्पर्शों में

कभी उजालों में

कभी अंधेरों में

निकल गई छपाक से

जाने कहाँ

हमसे हमारी

अधूरी सी ज़िंदगी

बरसती रही…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 20, 2019 at 7:26pm — 2 Comments

सभी कुछ बता दिया - ग़ज़ल

मापनी २२१२ १२१ १२२ १२१२ 

हमने रखा न राज़ सभी कुछ बता दिया

खिड़की से आज उसने भी परदा हटा दिया

 

बंजर जमीन दिल की’ हुई अब हरी-भरी

सींचा है उसने प्रेम से’ गुलशन बना दिया

 

जज्बात मेरे’ दिल के’ मचलते चले…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2019 at 9:00pm — 2 Comments

गज़ल - दिगंबर नास्वा - 4

१२२२ १२२२ १२२ 

उदासी से घिरी तन्हा छते हैं

कई किस्से यहाँ के घूरते हैं

 

परिंदों के परों पर घूमते हैं

हम अपने घर को अकसर ढूंढते हैं

 

नहीं है इश्क पतझड़ तो यहाँ क्यों

सभी के दिल हमेशा टूटते हैं

 

मेरा स्वेटर कहाँ तुम ले गई थीं

तुम्हारी शाल से हम पूछते हैं

 

नए रिश्तों में कितनी भी हो गर्मी

कहाँ रिश्ते पुराने छूटते हैं

 

कभी तो राख़ हो जाएंगी यादें

तुम्हे सिगरेट समझ कर फूंकते…

Continue

Added by दिगंबर नासवा on April 19, 2019 at 8:22pm — 4 Comments

सीढ़ी हो उनके वास्ते कुर्सी की राह पर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/ २१२१/२२२/१२१२



लेकर  शराब  साड़ियाँ  मतदान  कीजिए

फिर पाँच साल जिन्दगी हलकान कीजिए।१।



देता है जो भी सीख  ये  तुमको चुनाव में

फूलों से  ऐसे  नेता  का  सम्मान कीजिए।२।



बाँटेंगे  जात  धर्म  की  सरहद  में  खूब वो

मत खाक उनका आप ये अरमान कीजिये।३।



सीढ़ी हो उनके  वास्ते  कुर्सी  की राह पर

हर लक्ष्य उनका आप ही परवान कीजिए।४।



सेवक हैं उनको आप मत…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 19, 2019 at 8:04pm — 5 Comments

कुण्डलिया छंद-

1-

नेता आपस में लड़ें, रोज जुबानी जंग।

मर्यादाएँ हो रहीं, इस चुनाव में भंग।।

इस चुनाव में भंग, सभी ने गरिमा खोई।

फैलाकर उन्माद, परस्पर नफरत बोई।।

जनता का इस बार, बनेगा वही चहेता।

जो कर सके विकास, चाहिए ऐसा नेता।।

2-

बातें बेसिरपैर कीं, नेता करते रोज।

मर्यादाएँ तोड़कर, दिखलाते हैं ओज।।

दिखलाते हैं ओज, मंच से देते गाली।

खुद की ठोकें पीठ,बजावें खुद ही ताली।।

संसद में जो लोग, चलाते मुक्के लातें।

गरिमा के विपरीत, वही करते हैं…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on April 19, 2019 at 10:00am — 1 Comment

एल.ओ.सी (लघुकथा)

रविवार सवेरे 7:00 बजे।
चाय की पहली चुस्की ली ही थी कि अखबार में छपे एक चित्र ने ध्यान खींच लिया। एक आँख जिसमें खुली पलकों के नीचे पुतली की बजाय सलाखें थी और उन सलाखों को एक हाथ ने थाम रखा था। कितने ही क्षण मैं हाथ में कप लिए उस चित्र को एकटक देखता रहा। इच्छाओं से जुड़े सपनों को कितनी ही बार सलाखों के पीछे बंद कर दिया जाता है।
सवेरे 9:00 बजे।
नाश्ता नहीं खा पाया, वही चित्र आँखों के सामने घूम रहा है। बचपन से नौकर-चाकरों और केअर टेकर के साथ ही रहा। डैडी  को…
Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 18, 2019 at 11:22pm — 2 Comments

अहीर छंद "प्रदूषण"

अहीर छंद "प्रदूषण"

बढ़ा प्रदूषण जोर।

इसका कहीं न छोर।।

संकट ये अति घोर।

मचा चतुर्दिक शोर।।

यह दावानल आग।

हम सब पर यह दाग।।

जाओ मानव जाग।

छोड़ो भागमभाग।।

मनुज दनुज सम होय।

मर्यादा वह खोय।।

स्वारथ का बन भृत्य।

करे असुर सम कृत्य।।

जंगल करत विनष्ट।

सहे जीव-जग कष्ट।।

प्राणी सकल…

Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 18, 2019 at 1:18pm — 5 Comments

Monthly Archives

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

विनय कुमार posted a blog post

पुरानी पहचान-लघुकथा

"अरे, उस भलेमानस के पास जाना है, चलिए मैं ले चलता हूँ", सामने वाले व्यक्ति ने जब उससे यह कहा तो उसे…See More
37 minutes ago
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Sushil Sarna's blog post प्रतीक्षा लौ ...
"आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बहुत बेहतरीन और भावपूर्ण रचना पर बधाई स्वीकार कीजिये"
3 hours ago
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post लड़की (लघुकथा)
"आद0 शेख शहज़ाद उस्मानी साहब सादर अभिवादन।बढ़िया लघुकथा लिखी आपने। बधाई स्वीकार कीजिये"
3 hours ago
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on रामबली गुप्ता's blog post गरीबी न दे ऐ खुदा जिंदगी में-रामबली गुप्ता
"आद0 रामबली जी सादर अभिवादन। वाह क्या बेहतरीन छंद लिखा है बन्धु, बहुत बढ़िया। विषय भी दिल को छूता…"
3 hours ago
amod shrivastav (bindouri) replied to Tilak Raj Kapoor's discussion ग़ज़ल-संक्षिप्‍त आधार जानकारी-4 in the group ग़ज़ल की कक्षा
"आ तिलक राज साहब, आ समर साहब, आ विनस भाई साहब  प्रणाम  सर मुझे काफ़िया को लेकर जानकारी…"
7 hours ago
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' posted a blog post

महाभुजंगप्रयात छंद में पहली रचना

नहीं वक़्त है ज़िन्दगी में किसी की, सदा भागते ही कटे जिन्दगानीकभी डाल पे तो कभी आसमां में, परिंदों…See More
10 hours ago
amod shrivastav (bindouri) posted a blog post

नफ़स की धुन नही थमीं...

परिवार :- हजज़ मुरब्बा मक़बूज अरकान :-  मुफाइलुन मुफाइलुन (1212-1212)मुझे  उसी  से प्यार हो ।।…See More
10 hours ago
दिगंबर नासवा commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल मनोज अहसास
"अच्छी ग़ज़ल हुई है मनोज जी ... "
23 hours ago
दिगंबर नासवा commented on दिगंबर नासवा's blog post गज़ल - दिगंबर नास्वा - 4
"बहुत आभार है लक्ष्मण जी ..."
23 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post अधूरी सी ज़िंदगी ....
"आदरणीय  narendrasinh chauhan जी सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार।"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post प्रतीक्षा लौ ...
"आदरणीय  narendrasinh chauhan जी सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार।"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post प्रतीक्षा लौ ...
"आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , ... सृजन के भावों आत्मीय प्रशंसा से अलंकृत करने का दिल से आभार।"
yesterday

© 2019   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service