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Nilesh Shevgaonkar's Blog (173)

ग़ज़ल नूर की- दर्द है तो कभी दवा है ये



दर्द है तो कभी दवा है ये,

इश्क़ है या कि मोजज़ा है ये.

.

जो बिख़रने का सिलसिला है ये

ख़ुशबू होने ही की सज़ा है ये.

.

हम जो रोते हैं कुफ़्र होता है

मज़हब-ए-इश्क़ में मना है ये.

.

अपनी ताक़त को वो समझता है  

हुस्न के साथ मसअला है ये.

.

ख़त भला तेरा मैं जलाऊँगा?

आँसुओं से भभक गया  है ये.

.

हम तो फिरऔन इसको कहते हैं

ये समझता रहे ख़ुदा है ये. 

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ग़म यहीं है यहीं कहीं होगा

तेरे देखे से छुप…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on September 29, 2022 at 11:30am — 17 Comments

ग़ज़ल नूर की- ज़ुल्फ़ों को ज़ंजीर बना कर बैठ गए

.

ज़ुल्फ़ों को ज़ंजीर बना कर बैठ गए

किस किस को हम पीर बना कर बैठ गए.

.

यादें हम से छीन के कोई दिखलाओ

लो हम तो  जागीर बना कर बैठ गए.  

.

दुनिया की तस्वीर बनानी थी हम को

हम तेरी तस्वीर बना कर बैठ गए.  

.

मौक़ा रख कर भेजा था नाकामी में

आप जिसे तक़दीर बना कर बैठ गए.

.

मैंने कॉपी में इक चिड़िया क्या मांडी

दुनिया वाले तीर बना कर बैठ गए.

.

चलती फिरती मूरत देख के हम नादाँ

मंदिर की तामीर बना कर बैठ गए.

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हँसते…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on January 23, 2022 at 9:02am — 1 Comment

ग़ज़ल नूर की- कहीं ये उन के मुख़ालिफ़ की कोई चाल न हो

.

कहीं ये उन के मुख़ालिफ़ की कोई चाल न हो

सो चाहते हैं कि उन से कोई सवाल न हो.

.

कोई फ़िराक़ न हो और कोई विसाल न हो

उठे वो मौज कि अपना हमें ख़याल न हो.   

.

तेरी तलब में हमें वो मक़ाम पाना है

कि लुट भी जाएँ तो लुट जाने का मलाल न हो.

.

हमें सफ़र जो ये बख़्शा है क्या बने इसका

न हो उरूज अगर इस में या ज़वाल न हो.

.

बशर न हो तो ख़ुदा भी न हो जहाँ में कोई 

न हो जहाँ में ख़ुदा तो कोई वबाल न हो.

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मैं चाहता हूँ ये दुनिया वहाँ…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on January 12, 2022 at 9:00am — 4 Comments

ग़ज़ल नूर की - उस के नाम पे धोखे खाते रहते हो

,

उस के नाम पे धोके खाते रहते हो

फिर भी उस के ही गुण गाते रहते हो.

.

उस के आगे बोल नहीं पाते हो तुम

मैं बोलूँ तो हाथ दबाते रहते हो.

.

कोई नया इस दुनिआ में कब आता है

तुम ही जा कर वापस आते रहते हो.

.

तुम को वापस अपने घर भी जाना है

क्यूँ दुनिआ से लाग  लगाते रहते हो.

.

अक्सर मिलता है वो इन्साँ पूजता है 

वो जिस को तुम ख़ुदा बताते रहते हो.

.

वाइज़ जी क्या तुम ने वो सब सीख लिया 

हम को जो कुछ तुम समझाते रहते…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on December 27, 2021 at 8:30am — 8 Comments

ग़ज़ल नूर की- कहीं से उड़ के परिन्दे कहीं पे उतरे हैं

कहीं से उड़ के परिन्दे कहीं पे उतरे हैं  

ख़ुदा से हो के ख़फ़ा हम ज़मीं पे उतरे हैं.

.

तुम्हारे ढब से मिली बारहा जो रुसवाई  

हर एक बात पे हाँ से नहीं पे उतरे हैं.

.

हमारी आँखों की झीलें भी इक ठिकाना है     

तुम्हारी यादों के सारस यहीं पे उतरे हैं.

.

हमारी फ़िक्र से नीचे फ़लक मुहल्ला है  

ये शम्स चाँद सितारे वहीं पे उतरे हैं.  

.

हज़ारों बार ज़मीं ने ये माथा चूमा है

उजाले सजदों के मेरे जबीं पे उतरे हैं.  

.

निलेश "नूर"…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on December 22, 2021 at 10:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल नूर की --- ग़म-ए-फ़िराक़ से गर हम दहक रहे होते

.

ग़म-ए-फ़िराक़ से गर हम दहक रहे होते

तो आफ़ताब से बढ़कर चमक रहे होते.

.

बदन की सिगड़ी के शोलों पे पक रहे होते

वो मेरे साथ अगर सुब्ह तक रहे होते.

.

तेरी शुआओं को पीकर बहक रहे होते

मेरी हवस को मेरे होंट बक रहे होते.

.

सुकून मिलता हमें काश जो ये हो जाता

कि हम भी यार के दिल की कसक रहे होते.   

.

तेरी नज़र से उतरना भी एक नेमत है

वगर्न: आँखों में सब की खटक रहे होते.

.

लबों का रस हमें मिलता तो शह’द होते हम

अगर जो…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on December 10, 2021 at 6:31pm — 20 Comments

ग़ज़ल नूर की - मेरी ज़ीस्त की कड़ी धूप ने मुझे रख दिया है निचोड़ कर

.

मेरी ज़ीस्त की कड़ी धूप ने मुझे रख दिया है निचोड़ कर,

अभी शाम ढलने ही वाली थी कोई चल दिया मुझे छोड़ कर.

.

मैं था मुब्तिला किसी ख़ाब में किसी मोड़ पर ज़रा छाँव थी

उसे ये भी रास न आ सका सो जगा गया वो झंझोड़ कर.

.

मेरे दिल में अक्स उन्हीं का था उन्हें ऐतबार मगर न था 

कभी देखते रहे तोड़ कर कभी दिल की किरचों को जोड़ कर.   

.

जो  किताब ए ज़ीस्त में  शक्ल थी वो जो नाम था मुझे याद है  

वो जो पेज फिर न मैं पढ़ सका जो रखा था मैने ही मोड़ कर.  …

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Added by Nilesh Shevgaonkar on November 18, 2021 at 5:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल नूर की - क्या ही तुझ में ऐब निकालूँ क्या ही तुझ पर वार करूँ

क्या ही तुझ में ऐब निकालूँ क्या ही तुझ पर वार करूँ

ये तो न होगा फेर में तेरे अपनी ज़ुबाँ को ख़ार करूँ.

.

हर्फ़ों से क्या नेज़े बनाऊँ क्या ही कलम तलवार करूँ

बेहतर है मैं ख़ुद को अपनी ग़ज़लों से सरशार करूँ.

.

ग़ालिब ही के जैसे सब को इश्क़ निकम्मा करता है

लेकिन मैं भी बाज़ न आऊँ जब भी करूँ दो चार करूँ.

.

चन्दन हूँ तो अक्सर मुझ से काले नाग लिपटते हैं

मैं भी शिव सा भोला भाला सब को गले का हार करूँ.

.

सब से उलझना तेरी फ़ितरत और मैं इक आज़ाद मनक…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on November 9, 2021 at 3:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल नूर की - ज़ुल्म सहना छोड़ कर इन्कार करना सीख ले

ज़ुल्म सहना छोड़ कर इन्कार करना सीख ले

है अगर ज़िन्दा पलटकर वार करना सीख ले.   

.

एक नुस्ख़ा जो घटा देता है हर दुःख की मियाद

सच है जैसा वैसा ही स्वीकार करना सीख ले.

.

मज़हबों के खेल में होगी ये दुनिया और ख़राब 

अपने रब का दिल ही में दीदार करना सीख से.

.

तन है इक शापित अहिल्या चेतना के मार्ग पर

राम सी ठोकर लगा.. उद्धार करना सीख ले.

.

नफ़रतों की बलि न चढ़ जाए तेरी मासूमियत

मान इन्सानों को इन्सां प्यार करना सीख ले.

.

लग न…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on November 7, 2021 at 7:30pm — 15 Comments

ग़ज़ल नूर की - हाँ में हाँ मिलाइये

हाँ में हाँ मिलाइये
वर्ना चोट खाइए.
.
हम नया अगर करें
तुहमतें लगाइए.
.
छन्द है ये कौन सा
अपना सर खुजाइये
.
मीर जी ख़ुदा नहीं
आप मान जाइए.
.
कुछ नये मुहावरे
सिन्फ़ में मिलाइये.
.
कोई तो दलील दें
यूँ सितम न ढाइए.
.
हम नये नयों को अब
यूँ न बर्गलाइये.
.
नूर है वो नूर है
उस से जगमगाइए.    .
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Added by Nilesh Shevgaonkar on November 5, 2021 at 8:32pm — 9 Comments

ग़ज़ल नूर की - ग़ज़लों का आनन्द समझ में आ जाए

ग़ज़लों का आनन्द समझ में आ जाए

काश तुन्हें यह छन्द समझ में आ जाए.

.

संस्कृत से फ़ारस का नाता जान सको

लफ्ज़ अगर गुलकन्द समझ में आ जाए.

.

रस की ला-महदूदी को पहचानों गर

फूलों का मकरन्द समझ में आ जाए.

.

दिल में जन्नत की हसरत जो जाग उठे

हों कितना पाबन्द समझ में आ जाए.

.

भीषण द्वंद्व मैं बाहर का भी जीत ही लूँ

पहले अन्तर-द्वन्द समझ में आ जाए.

.

मन्द बुद्धि का मन्द समझ में आता है

अक्ल-मन्द का मन्द समझ में आ जाए.…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on November 1, 2021 at 6:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल नूर की - तमन्नाओं को फिर रोका गया है

तमन्नाओं को फिर रोका गया है

बड़ी मुश्किल से समझौता हुआ है.

.

किसी का खेल है सदियों पुराना

किसी के वास्ते मंज़र नया है.

.

यही मौक़ा है प्यारे पार कर ले

ये दरिया बहते बहते थक चुका है.

.

यही हासिल हुआ है इक सफ़र से  

हमारे पाँव में जो आबला है.

.

कभी लगता है अपना बाप मुझ को  

ये दिल  इतना ज़ियादा टोकता है.

.

नहीं है अब वो ताक़त इस बदन में

अगरचे खून अब भी खौलता है.

.

हम अपनी आँखों से ख़ुद देख आए

वहाँ बस…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 14, 2021 at 9:00am — 20 Comments

ग़ज़ल नूर की - जिस दिन से इकतरफ़ा रिश्ता टूट गया

जिस दिन से इकतरफ़ा रिश्ता टूट गया 

सुनते हैं वो पागल लड़का टूट गया.

.

थामा ही था हाथ तुम्हारा मैंने बस

और अचानक मेरा सपना टूट गया.

.

अब ये आँखें कोई ख्वाब नहीं बुनतीं

पिछली नींद में मेरा करघा टूट गया.

.

अपने लालच को तुम काबू में रक्खो

वो देखो इक और सितारा टूट गया.

.

एक ज़रा सी बात से बातें यूँ बिगडीं

फिर तो जैसे हर समझौता टूट गया.

.

आप अदू से दूर हुए ये नेमत है

बिल्ली की क़िस्मत से छींका टूट गया.

.

कह…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 3, 2021 at 9:30am — 17 Comments

ग़ज़ल नूर की -ख़ुद को ऐसे सँवार कर जागा

ख़ुद को ऐसे सँवार कर जागा

यानी उस को पुकार कर जागा.   

.

एक अरसा गुज़ार कर जागा

ख्व़ाब में ख़ुद से हार कर जागा.

.

तेरी दुनिया बहुत नशीली थी

जिस्म को अपने पार कर जागा.

.

आंखें तस्वीर की बिगाड़ी थीं   

उनका काजल सुधार कर जागा.

.

ख़ुद-परस्ती में मैं उनींदा था  

फिर अना अपनी मार कर जागा.

.

शम्स ने तीरगी पहन ली थी

सुब’ह चोला उतार कर जागा.

.

रात भर आईने की आँखों में

दर्द अपने उभार कर जागा. …

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Added by Nilesh Shevgaonkar on June 15, 2021 at 9:30am — 8 Comments

ग़ज़ल नूर की - दिल लगाएँ, दिल जलाएँ, दिल को रुसवा हम करें

दिल लगाएँ, दिल जलाएँ, दिल को रुसवा हम करें

चार दिन की ज़िन्दगी में और क्या क्या हम करें?

.

एक दिन बौनों की बस्ती से गुज़रना क्या हुआ

चाहने वो यह लगे क़द अपना छोटा हम करें.

.

हाथ बेचे ज़ह’न बेचा और फिर ईमाँ बिका  

पेट की ख़ातिर भला अब और कितना हम करें?

.

चाहते हैं हम को पाना और झिझकते भी हैं वो  

मसअला यानी है उनका ख़ुद को सस्ता हम करें.

.

इक सितम से रू-ब-रु हैं पर ज़ुबां ख़ुलती नहीं

ये ज़माना चाहता है उस का चर्चा हम करें.…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on June 8, 2021 at 12:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल नूर की- मेरी आँखों में तुम को ख़ाब मिला?

मेरी आँखों में तुम को ख़ाब मिला?

या निचोडे से  सिर्फ आब मिला.

.

सोचने दो मुझे समझने दो

जब मिला बस यही जवाब मिला.

.

दिल ने महसूस तो किया उस को   

पर न आँखों को ये सवाब मिला.

.

मैकदे में था जश्न-ए-बर्बादी

जिस में हर रिन्द कामयाब मिला.

.

इतना अच्छा जो मिल गया हूँ मैं

इसलिए कहते हो “ख़राब मिला.”

.

“नूर” चलने से पहले इतना कर

अपने हर कर्म का…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 31, 2020 at 10:01am — 12 Comments

ग़ज़ल- नूर की .. शेख़ ओ बरहमन में यारी रहेगी

जो शेख़ ओ बरहमन में यारी रहेगी

जलन जलने वालों की जारी रहेगी.

.

मियाँ जी क़वाफ़ी को समझे हैं नौकर  

अना का नशा है ख़ुमारी रहेगी.  

.

गले में बड़ी कोई हड्डी फँसी है

अभी आपको बे-क़रारी रहेगी.

.

हुज़ूर आप बंदर से नाचा करेंगे

अकड आपकी गर मदारी रहेगी.

.

हमारे ये तेवर हमारे रहेंगे

हमारी अदा बस हमारी रहेगी.

.

हुज़ूर इल्तिजा है न हम से उलझिये

वगर्ना यूँ ही दिल-फ़िगारी रहेगी.

.

ग़ज़ल “नूर” तुम पर न ज़ाया करेंगे …

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 29, 2020 at 6:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल नूर की- जिन की ख़ातिर हम हुए मिस्मार; पागल हो गये

जिन की ख़ातिर हम हुए मिस्मार; पागल हो गये

उन से मिल कर यूँ लगा बेकार पागल हो गये.

.

सुन के उस इक शख्स की गुफ़्तार पागल हो गये

पागलों से लड़ने को तैयार पागल हो गये.

.

छोटे लोगों को बड़ों की सुहबतें आईं  न रास

ख़ुशबुएँ पाकर गुलों से ख़ार पागल हो गये.

.

थी दरस की आस दिल में तो भी कम पागल न थे

और जिस पल हो गया दीदार; पागल हो गये.

.

एक ही पागल था मेरे गाँव में पहले-पहल

रफ़्ता रफ़्ता हम सभी हुशियार पागल हो गये.

.

इल्तिजा थी…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 15, 2020 at 3:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल नूर की- ख़ूब इतराते हैं हम अपना ख़ज़ाना देख कर

ख़ूब इतराते हैं हम अपना ख़ज़ाना देख कर

आँसुओं पर तो कभी उन का मुहाना देख कर.

.

ग़ैब जब बख्शे ग़ज़ल तो बस यही कहता हूँ मैं  

अपनी बेटी दी है उसने और घराना देख कर. 

.

साँप डस ले या मिले सीढ़ी ये उस के हाथ है,

हम को आज़ादी नहीं चलने की ख़ाना देख कर.

.

इक तजल्ली यक-ब-यक दिल में मेरे भरती गयी

एक लौ का आँधियों से सर लड़ाना देख कर.

.

ऐसे तो आसान हूँ वैसे मगर मुश्किल भी हूँ

मूड कब…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 3, 2020 at 12:37pm — 7 Comments

ग़ज़ल नूर की- तुम्हें लगता है रस्ता जानता हूँ

तुम्हें लगता है रस्ता जानता हूँ

मगर मैं सिर्फ चलना जानता हूँ.

.

तेरे हर मूड को परखा है मैंने

तुझे तुझ से ज़ियादा जानता हूँ.

.

गले मिलकर वो ख़ंजर घोंप देगा

ज़माने का इरादा जानता हूँ.

.

मैं उतरा अपने ही दिल में तो पाया  

अभी ख़ुद को ज़रा सा जानता हूँ.

.

बहा लायी है सदियों की रवानी

मगर अपना किनारा जानता हूँ.

.

बता कुछ भी कभी माँगा है तुझ से?

मैं अपना घर चलाना जानता हूँ.      

.

निलेश…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on September 30, 2020 at 1:46pm — 8 Comments

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