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Usha Awasthi's Blog (41)

आए , तोड़े गर्व

धरणी को बरबाद कर

चन्द्र करो जा नष्ट

फिर ढूँढो घर तीसरा

जहाँ न कोई कष्ट

यह क्रम चलता ही रहे

मानव ही जब दुष्ट

आपस में लड़ कर करे

सर्व विभूति विनष्ट

समझे मालिक स्वयं को

बन बैठा भगवान

हिरनकशिपु सम सोच रख

औरों का अपमान

करते बम के परीक्षण

खुशी मने ज्यों पर्व

राम , कृष्ण सदृश कोई

आए , तोड़े गर्व

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on September 3, 2020 at 7:26pm — 3 Comments

आलस करैं न नेक

कपड़ा-लत्ता बाँधि कै

जावैं अपने देस

कितने दिनन बिता गए

तबहुँ लगै परदेस

पहुचैं अपने द्वार-घर

लक्ष्य यही बस एक

जा खेती - बाड़ी करैं

आलस करैं न नेक

धूप - ताप मा बिन रुके

चले जाँय सब गाँव

सोचत जात , थमें नहीं

मिले जो चाहे छाँव

नदियन नाला केर सब

कचरा देब हटाय

लहर-लहर बहियैं सबै

धरती पियै अघाय

बबुआ से कहिबै चलौ

गइया लेइ खरीद

दूध, दही , मट्ठा…

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Added by Usha Awasthi on August 30, 2020 at 11:27pm — 2 Comments

गीत , चाँद हमारे अँगना

झाँका , झाँका , देखो झाँका

चाँद हमारे अँगना

आने वाला है कोई 

बाजे मेरा कँगना

हो, हो , हो , हो

झाँका, झाँका , देखो झाँका

सुहाना समां है

खुला आसमां है

करतीं ठिठोली

तारों की टोली

झूमे , झूमे , देखो झूमे

आज हमारे अँगना 

आने....

बहे पुरवइया

डोले मन की नैया

मौसम की घड़ियाँ

जादू की छड़ियाँ

फेरें , फेरें , जादू फेरें

आज हमारे…

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Added by Usha Awasthi on August 21, 2020 at 11:35pm — 8 Comments

सारा हिन्दुस्तान

पढ़ी - लिखी जो गृहणियाँ

देखें निज परिवार

घर में बूढ़ी सास हैं

और श्वसुर लाचार

शिशु जिनके हैं पालने

सेवा की दरकार

आया पर छोड़ें नहीं

सहें स्वयं सब भार

गढ़ती हैं व्यक्तित्व वह

जिस विधि कोई कुम्हार

खोट सुधार सहन करें

चाहे विघ्न हजार

सदा करें निष्काम हो

सबके सुख की वृद्धि

प्रेम , हर्ष , ऐश्वर्य की

होती तभी समृद्धि

घर कुटुम्ब के हेतु जो

अपना सुख दे…

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Added by Usha Awasthi on August 19, 2020 at 7:24pm — 8 Comments

शिवत्व

जब मन वीणा के तारों पर 

स्वर शिवत्व झन्कार हुआ

चिरकालिक,शाश्वत ,असीम

प्रकटा , अमृत संचार हुआ

निर्गत हुए भविष्य  , भूत

वर्तमान अधिवास हुआ

कालातीत, निरन्तर,अक्षय

महाकाल का भास हुआ

शव समान तन,आकर्षण से

मन विमुक्त आकाश हुआ

काट सर्व बन्धन इस जग के

परम तत्व , निर्बाध हुआ

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on August 3, 2020 at 10:30am — 4 Comments

उरिझै कवनेउ मंद

सत्य सुनावै मनई कोउ

भरि साँसैं जमुहाईं

झूठि जहाँ पर चलि रहा

हुइ चैतन मुसुकाहिं

बहुतै मजा मिलै जहाँ

चुगली खावैं लोग

नमक, खटाई, मिरचि जब

चटकि , तबहिं मन मोद

का कलजुग ना दिखावै

सत्पथ धरहि जो पाँव

तपति मरूथल रेत जसि

दीखै कहूँ न छाँव

मौनी अब तौ साधिहौं

वाहै मा आनन्द

ई सांसारिक जालि मा

उरझै कवनेउ मंद

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on July 8, 2020 at 6:28pm — 3 Comments

क्यों ना जड़ पर चोट ?

पैसों से क्या जान को

हम पाएगें तोल ?

सदा - सदा को बुझ गए

जब चिराग़ अनमोल

किन-किन के थे वरद हस्त

जो पनपी यह खोट

खोज-खोज उनकी करें

क्यों ना जड़ पर चोट ?

इस बढ़ती विष बेल पर

यदि ना डली…

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Added by Usha Awasthi on July 4, 2020 at 5:50pm — 6 Comments

रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे

रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे

अजहूँ न आए पिया रे..

ये बदरा कारे - कजरारे 

बार- बार आ जाएँ दुआरे

घर आँगन सब सूना पड़ा रे

सूनी सेजरिया रे

रिमझिम....

तन-मन ऐसी अगन लगाए

जो बदरा से बुझे न बुझाए )

अब तो अगन बुझे तबही जब

आएँ साँवरिया रे

रिमझिम...

छिन अँगना छिन भीतर आऊँ

दीप बुझे सौ बार जलाऊँ

पिया हमारे घर आएगें

छाई अँधियारी रे

रिमझिम .....

मौलिक…

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Added by Usha Awasthi on June 30, 2020 at 9:00pm — 2 Comments

क्यों करते अह्वान ?

कितने सालों से सुनें

शान्ति - शान्ति का घोष

अपने ही भू- भाग को

खो बैठे , बेहोश

जब दुश्मन आकर खड़ा

द्वार , रास्ता रोक

क्या गुलाम बन कर रहें ?

करें न हम प्रतिरोध 

ज्ञान - नेत्र को मूँद लें

खड़ा करें अवरोध 

गीता से निज कर्म - पथ

का , कैसै हो बोध ?

ठुकराते ना सन्धि को

कौरव कर उपहास

कुरूक्षेत्र का युद्ध क्यों ?

फिर बनता इतिहास

सोलह कला प्रवीण…

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Added by Usha Awasthi on June 25, 2020 at 10:30am — No Comments

खो बैठे जब होश

बड़े-बड़े देखे यहाँ

कुटिल , सोच में खोट

मर्यादा की आड़ ले

दें दूजों को चोट

ऐसे भी देखे यहाँ 

सुन्दर, सरल , स्वभाव

यदि सन्मुख हों तो बहे

सरस प्रेम रस भाव

कलियुग इसको ही कहें

चाटुकारिता भाय

तज कर अमृत का कलश

विष-घट रहा सुहाय

गिनें , गिनाएँ , फिर गिनें

नित्य पराए दोष

एक न अपने में दिखे

खो बैठे जब होश

मौलिक एवं अप्रकाशित

 

Added by Usha Awasthi on June 23, 2020 at 1:00am — 6 Comments

सैनिकों का शौर्य बल

तोड़ कर अनुबन्ध अरि ने

देश पर डाली नज़र

उठा कर अब शस्त्र अपने

भून दो उसका जिगर

छल ,फरेब, असत्य ,धोखे का

करे अभिमान , खल

वह भी अब देखे हमारे

सैनिकों का शौर्य बल

शान्ति,सहआस्तित्व हो, स्थिर

बढ़े जग में अमन

वास्ते इस , धैर्य को समझा

कि हम कायर वतन

जो परायी सम्पदा को

हड़पने , रहता विकल

रौंद दो अहमन्यता 

षड़यन्त्र हो उसका विफल

शत्रु को है दण्ड देने…

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Added by Usha Awasthi on June 21, 2020 at 7:00am — 4 Comments

बूँद

कहते हैं मानसून अब

देगा बहुत सुकून

कैसे सहेजेगी भला

यह बारिश की बूँद?

ताल-तलैया , झील , नद

चढ़ें , अतिक्रमण भेंट

दोहन होता प्रकृति का

अनुचित हस्तक्षेप

करें बात जो न्याय की 

वही कर रहे घात

करनी कथनी से अलग 

ज्यों हाथी के दाँत

मौलिक एवंअप्रकाशित 

Added by Usha Awasthi on June 17, 2020 at 12:43pm — 2 Comments

बचपने की उम्र है

खेल लेने दो इन्हे यह बचपने की उम्र है

गेंद लेकर हाथ में जा दृष्टि गोटी पर टिकी

लक्ष्य का संधान कर ,  एकाग्रता की उम्र है

खेल.....

गोल घेरे को बना हैं धरा पर बैठे हुए

हाथ में कोड़ा लिए इक,सधे पग धरते हुए

इन्द्रियाँ मन में समाहित, साधना की उम्र है

खेल.....

टोलियों में जो परस्पर आमने और सामने

ज्यों लगे सीमा के रक्षक शस्त्र को हैं तानने

व्यूह रचना कर समर को जीतने की उम्र है

खेल.....

मौलिक…

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Added by Usha Awasthi on May 27, 2020 at 7:59pm — 6 Comments

पर्यावरण सुरक्षा

आज धरती धन्य है , उसका हृदय प्रमुदित हुआ

स्वच्छ वायु , स्वच्छ जल , पर्यावरण निर्मल हुआ

गर यही स्थिति रही तो संक्रमण मिट जाएगा

यदि पुनः मानव ना अपनी गलतियां दोहराएगा

क्या कभी नभ सर्वदा उज्ज्वल धुला  रह पाएगा ?

या कि फिर से धुन्ध का अजगर निगल ले जाएगा

है यही सपना निशा में दमकते नक्षत्र हों

चँहु दिशा पंछी चहकते उपवनों में मस्त हों

शुद्ध हो वातावरण , कैसे ? बड़ों से ज्ञान लें

उनकी अनुभव जन्य ज्ञान मशाल…

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Added by Usha Awasthi on April 27, 2020 at 7:39pm — 6 Comments

गुलमोहर

रक्त वर्ण इन पुष्प गुच्छ से

तुमने जो श्रृंगार किया

तपती गर्म दोपहरी को भी 

है तुमने रसधार किया

लू के गर्म थपेड़ों से

बच रहने का उपचार किया

नारंगी और पीत रंग के

भावों से मनुहार किया

पथिकों को विश्राम , पंछियों को

आश्रय , उपहार दिया

जिस धरती से अंकुर फूटा 

उसका कर्ज़ उतार दिया

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on April 22, 2020 at 12:45pm — No Comments

इच्छा नहीं

तर्क यदि दे सको तो

बैठो हमारे सामने

व्यर्थ  के उन्माद में , अब

पड़ने की इच्छा नहीं

यदि हमारी संस्कृति को

कह वृथा , ललकारोगे

ऐसे अज्ञानी मनुज से 

लड़ने की इच्छा नहीं

सर्व ज्ञानी स्वयं को

औरों को समझें निम्नतर

जिनके हृद कलुषित , है उनको

सुनने की इच्छा नहीं

व्यर्थ के उन्माद में , अब

पड़ने की इच्छा नहीं

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on April 15, 2020 at 8:32pm — 8 Comments

सहज शान्ति भरपूर

सीख अनर्गल दे रहे , बढ़-चढ़ बारम्बार

हमको भी अधिकार है , करने का प्रतिकार

केवल जिभ्या चल रही , करें न कोई काज

नित्य करें अवमानना , सारी लज्जा त्याग

अस्थिरता फैला रहे , करते व्यर्थ प्रलाप

गिद्ध दृष्टि बस वोट पर , अन्य न कोई बात

जब है विश्व कराहता , बढ़े भयंकर रोग

केवल बस आलोचना , नहीं कोई सहयोग

शान्थि समर्थक को समझ पत्थर , रगड़ें आप

प्रकटेगी शिव रोष की अगनि , भयंकर ताप

उसमें  सारा भस्म…

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Added by Usha Awasthi on April 13, 2020 at 12:08pm — 2 Comments

दूजा नहीं विकल्प

है मुश्किल आई बड़ी , सारी दुनिया त्रस्त

मिल कर साथ खड़े रहें , कहता है यह वक्त

परमपिता का न्याय तो  सबके लिए समान

अरबों के मालिक भले हों कोई श्रीमान

ईश्वर पर विश्वास का व्यर्थ मुलम्मा ओढ़

कर ना भ्रष्टाचार तू , जीवन यह अनमोल

प्रकृति हमें समझा रही , पर हित लें संकल्प

अन्य बचें तब हम बचें , दूजा नहीं विकल्प

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on March 28, 2020 at 5:30pm — 4 Comments

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ?

कोई भी भाषा हो , लेकिन

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ ?

जो दिल से भाव निकलते हैं

वह कोमल सा अहसास कहाँ ?

है नर्तन मधुर तरंगों सा

अपना ' प्रणाम ' अन्यान्य कहाँ ?

जिससे झंकृत हृद - तार मृदुल

वह सुन्दरता , उल्लास कहाँ

जब बच्चा ' अम्मा , कहकर के

जा , माँ के गले लिपटता है

इस नैसर्गिक उद्बोधन में

अद्भुत आनन्द , हुलास कहाँ ?

कोई भी भाषा हो , लेकिन

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ…

Continue

Added by Usha Awasthi on March 27, 2020 at 9:33am — 10 Comments

सब निरोग सब हों सुखी

कोरोना का संक्रमण सारे देश , जहान

है दुस्साध्य परिस्थिति , मुश्किल में है जान

इस संकट की घड़ी में हमको रहना एक

दृढ़ संकल्पित हों खड़े , भुला सभी मतभेद

सर्व हिताय खड़े हुए डा0 नर्स तमाम

पुलिस महकमे के लिए है आराम हराम

नित सफाई कर्मी करें बिना शिकन के काम

इनके सेवा भाव को शत , शत मेरा प्रणाम

आई है , टल जाएगी , यह जो बड़ी विपत्ति

अनुशासित घर में रहें बिना किसी आपत्ति

सब निरोग , सब हों सुखी , करना यही…

Continue

Added by Usha Awasthi on March 25, 2020 at 5:32pm — 2 Comments

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