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नादिर ख़ान's Blog – September 2015 Archive (1)

हमसे बच्चों के ये तेवर नहीं देखे जाते

2122 1122 1122 22

अपनी आँखों से ये मंज़र नहीं देखे जाते

हाथ में अपनों के खंजर नहीं देखे जाते

दुश्मनी की भी कोई हद तो मुक़र्रर कर दो

इन गरीबों के जले घर नहीं देखे जाते

बातों ही बातों में शमशीर निकल जाती है

हमसे बच्चों के ये तेवर नहीं देखे जाते

खूबसूरत हैं बहुत आपकी प्यारी आँखें

गम के है इनमें जो सागर नहीं देखे जाते

याद गावों की मुझे अब भी सताती है बहुत

अपने पुरखों के ये खण्डर…

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Added by नादिर ख़ान on September 30, 2015 at 11:00am — 4 Comments

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