For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

नादिर ख़ान's Blog (63)

चुनावी क्षणिकाएँ

1

जारी है कवायद

शब्दों को रफ़ू करने की

बुलाये गए हैं 

शब्दों के खिलाड़ी

 

शब्द

काटे जोड़े और

मिलाये जा रहे हैं

रचे और रंगे जा रहे हैं

शब्दों का सौंदर्यीकरण जारी है

2

शब्द

कभी चाशनी में

घोले जा रहे हैं

तो कभी छौंके जा रहे हैं 

कढ़ाई में

फिर जारी है खिलवाड़

हमारे सपनों का

 

3

 

भाँपा जा रहा है मिजाज़

हर शख्स का

अचानक…

Continue

Added by नादिर ख़ान on May 2, 2014 at 8:30am — 11 Comments

चुनावी बाज़ार

 

1

गिरते – गिराते

उठा-पटक 

शातिर चालें

शह और मात

जूतम पैजार

चमकाते हथियार

भड़काते विचार  

हो जाइए तैयार

फिर गरम है

चुनावी बाज़ार ।

 

2

 

चापलूसों की फौज

शहीदों का अपमान

गिरती इंसानियत

बेचते ईमान   

लड़ते –लड़ाते

शोर मचाते

लक्ष्य है जीत।

 

3

झूठ पे झूठ

आरोप प्रत्यारोप

काम का दिखावा

बातों से…

Continue

Added by नादिर ख़ान on April 9, 2014 at 9:00pm — 7 Comments

फाग आया आओ हम होली मनायें

   वज़्न   2122    2122     2122

फाग आया आओ हम होली मनायें

नफ़रतों को होलिका में अब जलायें //1

 

होलिका से अम्न का दीपक जलाकर  

झूठी चालों, साजिशों को भी मिटायें //2

 

अब जगा दें, सो चुकी इंसानियत को

दुनिया को रंगीन हम सबकी बनायें //3

 

पाठ सबको भाई चारे का पढ़ाकर

देश के सम्मान को ऊँचा उठायें //4

 

प्यार का पिचकारियों में रंग भरकर

फूल अब इंसानियत के हम खिलायें //5

 

ऊँचा नीचा…

Continue

Added by नादिर ख़ान on March 17, 2014 at 1:00pm — 7 Comments

दरमियाँ जब हमारे बढ़ी दूरियाँ

212   212   212   212

रोज़ ख़्वाबों में मेरे वो आने लगे

और नींदें हमारी उड़ाने लगे //1

 

खुद से शरमा के पलकें झुकाने लगे

हमसे नज़रें भी अब वो चुराने लगे //2

 

क्या बयाँ हम करें उनकी हर इक अदा

जान हम हर अदा पर लुटाने लगे//3

 

प्यार आता हमें उनकी हर बात पर

झूठे गुस्से से हमको डराने लगे //4  

 

छा गई है खुशी मिट गए सारे गम

याद बनकर वो अब गुदगुदाने लगे //5

 

दरमियाँ जब हमारे बढ़ी…

Continue

Added by नादिर ख़ान on February 19, 2014 at 11:30pm — 13 Comments

मज़दूर

(एक)

 

तुम क्या चुकाओगे

मेरी मेहनत की कीमत

मेरी जवानी

मेरे सपने

मेरी उम्मीदें

सब-कुछ तो दफ्न है

तुम्हारी इमारतों में।

 

(दो)

 

जब चलती हैं  

झुलसा देने वाली गर्म हवाएँ

कवच बन जातीं है

यही सूरज की किरणें

हमारे लिए ।

 

मुसलधार बारिश

जब हमारे बदन को छूती है

फिर से खिल उठता है  

हमारा तन

ऊर्जावान हो…

Continue

Added by नादिर ख़ान on January 16, 2014 at 10:30pm — 16 Comments

हालात .....

नियम/अनुशासन

सब आम लोगों के लिए है

जो खास हैं

इन सब से परे हैं

उन पर लागू  नहीं होते

ये सब

ख़ास लोग तो तय करते हैं

कब /कौन/ कितना बोलेगा

कौन सा मोहरा

कब / कितने घर चलेगा

यहाँ शह भी वे ही देते हैं  

और मात भी

आम लोग मनोरंजन करते हैं   

आम लोगों का रेमोट

ख़ास लोगों के हाथों में होता है  

वे नचाते हैं

आम लोग नाचते हैं.....

मगर हालात

हमेशा एक जैसे नहीं होते

और न ही…

Continue

Added by नादिर ख़ान on January 8, 2014 at 12:00pm — 11 Comments

माँ – बाप (क्षणिकाएँ )

(1)

हमारे सपने लेते रहे आकार

बड़े और बड़े

महानगर की इमारतों की तरह

भव्य और विशाल

हमारे सपने

बढ़ते रहे

आगे और…

Continue

Added by नादिर ख़ान on December 20, 2013 at 12:30pm — 22 Comments

अपनों को आपस में लड़ा देता है पैसा

  2212     2212     2212      2

दीवार नफरत की उठा देता है पैसा

कमज़ोर रिश्तों को बना देता है पैसा

 

उल्टा चलन कैसा सिखा देता है पैसा

ईमान आबिद का गिरा देता है पैसा

 

अंगूरी सा पहले नशा देता है पैसा

बीमार फिर खुद का, बना देता है पैसा

 

आता है मंजूरे नज़र, बनकर यही और

अपनों को आपस में लड़ा देता है पैसा

 

बैठे हैं महफिल में सभी बनकर जो अपने

दरबार झूठों का सजा देता…

Continue

Added by नादिर ख़ान on December 11, 2013 at 6:30pm — 15 Comments

अपना दुखड़ा किसको सुनाऊँ

वज़्न - 222  221  122 

अपना दुखड़ा किसको सुनाऊँ

का पहनूँ मै, और का खाऊँ

जब दामों में आग लगी हो

क्या सौदा बाज़ार से लाऊँ

मंहगाई अब मार रही है

कैसे इससे पिंड छुड़ाऊँ

खुद अपना ही बोझ बना मै

कैसे घर का बोझ उठाऊँ

विद्यालय की फीस बहुत है

अब बच्चों को कैसे पढ़ाऊँ

पैसों से हैं, बनते बिगड़ते

रिश्ते ऐसे क्यों मै निभाऊँ

हैं झूठी तारीफ के भूखे

अब इनको मै…

Continue

Added by नादिर ख़ान on November 23, 2013 at 11:00pm — 8 Comments

हर दफ़ा ख़ुद पर ही निशाना लगता है

वज़्न -  2122  2212   2222

तुम हो तो हर मौसम सुहाना लगता है

हर तरफ जन्नत सा नज़ारा लगता है 

 …

Continue

Added by नादिर ख़ान on November 18, 2013 at 6:00pm — 14 Comments

हद से गुज़रे हैं हम निभाने में

वज़्न  2222 1212  22

आने में उनके और जाने में 

युग बीता देखने दिखाने में 

 

अब उन्हे कोसने से क्या हासिल

गुज़री है उम्र तो मनाने में

 

ये विज्ञापन का दौर है प्यारे

बिकता है झूठ अब ज़माने में

 

तेरी इक-इक अदा के क्या कहने 

खुद को हम हैं, लगे लुटाने में

 

घाटा हो या कि फायदा नादिर

हद से गुज़रे हैं हम निभाने में 

मौलिक एवं अप्रकाशित ...

Added by नादिर ख़ान on October 4, 2013 at 12:30pm — 19 Comments

फिर चुनावी दौर शायद आ रहा है

फिर चुनावी दौर शायद आ रहा है

द्वेष का बाज़ार फिर गरमा रहा है 

 

मेंमने की खाल में है भेड़िया जो

बोटियों को नोंच सबकी खा रहा है

 

इस तरह से सच भी दफ़नाया गया अब 

झूठ को सौ बार वो दुहरा रहा है

 

क्या वफ़ादारी निभायी जा रही है

देवता, शैतान को बतला रहा है

 

बोझ दिल में सब लिए अपने खड़े हैं

ख़ुद-से ही हर शख़्स अब शरमा रहा है 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by नादिर ख़ान on August 18, 2013 at 8:00pm — 9 Comments

माँ

बहुत ख़ुशनसीब हैं

हम लोग

हमारे सिर पर

हाथ है माँ का

क्योंकि

माँ का आँचल

हर छत से ज़्यादा

मज़बूत होता है

सुरक्षित होता है…

Continue

Added by नादिर ख़ान on May 9, 2013 at 1:00pm — 12 Comments

किसका दोष है ??

रोज़ होती सड़क दुर्घटनायें

कभी ये, कभी वो…

Continue

Added by नादिर ख़ान on April 16, 2013 at 5:52pm — 5 Comments

सर्द हालात सही बर्फ पिघल जाएगी

रात के साथ मुलाक़ात निकल जाएगी

जिंदगी रेत की मानिंद फिसल जाएगी

 

आप जो आज मेहरबान हुये है हम पर

चाल हालात सुधरते ही बदल जाएगी

 

भोली आवाम है, वो चाँद पे क्या…

Continue

Added by नादिर ख़ान on April 6, 2013 at 4:48pm — 14 Comments

होली (हाईकु)

हंसी ठिठोली

सबको मुबार‍क 

रंगों की होली ।

 

 बढ़ता मेल 

कोई गोरा न काला 

समझो न खेल…

Continue

Added by नादिर ख़ान on March 28, 2013 at 5:21pm — 7 Comments

बस तेरी चुप्पी मुझे खलने लगी

जब से मजबूरी मेरी बढ़ने लगी

दोस्तों से दूरी भी बनने लगी

 

उनकी हाँ में हाँ मिलाया जब नहीं 

बस मेरी मौजूदगी डसने लगी

 

कद मेरा उस वक्त से बढ़ने लगा

आजमाइस दुनिया जब करने…

Continue

Added by नादिर ख़ान on February 18, 2013 at 10:00pm — 21 Comments

यूँ लड़ते हुये हम कहाँ तक गिरेंगे

ज़हर भर चुका है दिलों में हमारे
सभी सो रहे है खुदा के भरोसे

जुबां बंद फिर भी अजब शोर-गुल है
हैं जाने कहाँ गुम अमन के नज़ारे

धरम बेचते हैं धरम के पुजारी
हमें लूटते हैं ये रक्षक हमारे

भला कब हुआ है कभी दुश्मनी से
बचा ही नहीं कुछ लुटाते-लुटाते

बटा घर है बारी तो शमशान की अब
यूँ लड़ते हुये हम कहाँ तक गिरेंगे

धरम का था मतलब खुदा से मिलाना
खुदा को ही बांटा धरम क्या निभाते

Added by नादिर ख़ान on February 10, 2013 at 12:30am — 7 Comments

फासला

मेरे आने और तुम्हारे जाने के बीच

बस चंद कदमों का फासला रहा

न मै जल्दी आया कभी

न कभी तुमने इंतज़ार किया

ये फासला ही तो था

जिसे हमने

संजीदगी और ईमानदारी के साथ निभाया

फासले को…

Continue

Added by नादिर ख़ान on February 1, 2013 at 11:30am — 15 Comments

फांसले दिल के अब मिटते नहीं हैं हमसे

प्यार ने तेरे बीमार बना रखा है
जा चुके कल का अख़बार बना रखा है

फांसले दिल के अब मिटते नहीं हैं हमसे
चीन की खुद को दीवार बना रखा है

बेचकर गैरत अपनी सो चुके हैं कब के 
हमने उनको ही सरदार* बना रखा है

शोर सा मेरे इस दिल में ऐसा मचा है
जैसे गठबंधन सरकार बना रखा है

चापलूसों का दरबार लगा है नादिर
झूठ को ही कारोबार बना रखा है

*सरदार = मुखिया

Added by नादिर ख़ान on January 24, 2013 at 5:30pm — 5 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

अनपढ़े ग्रन्थ

कुछ दर्द एक महान ग्रन्थ की तरह होते हैं पढना पड़ता है जिन्हें बार- बार उनकी पीड़ा समझने के लिए…See More
10 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (दिलों से ख़राशें हटाने चला हूँ )
"ग़ज़ल और मतले पर हुई चर्चा में भाग लेने वाले सभी गुणीजनों का आभार व्यक्त करते हुए, ख़ासतौर पर…"
yesterday
Samar kabeer commented on Anjuman Mansury 'Arzoo''s blog post ग़ज़ल - फिर ख़ुद को अपने ही अंदर दफ़्न किया
"//इस पर मुहतरम समर कबीर साहिब की राय ज़रूर जानना चाहूँगा// 'पहले दफ़्न 'आरज़ू' दिल…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (दिलों से ख़राशें हटाने चला हूँ )
"//यहाँ पर मैं उन के आलेख से सहमत नहीं हूँ. उनके अनुसार रहे और कहे आदि में इता दोष होगा-यह कथ अपने…"
yesterday
Anita Maurya posted blog posts
yesterday
Anjuman Mansury 'Arzoo' posted a blog post

ग़ज़ल - फिर ख़ुद को अपने ही अंदर दफ़्न किया

वज़्न - 22 22 22 22 22 2उनसे मिलने का हर मंज़र दफ़्न किया सीप सी आँखों में इक गौहर दफ़्न कियादिल…See More
yesterday
Anjuman Mansury 'Arzoo' commented on Anita Maurya's blog post एक साँचे में ढाल रक्खा है
"मुहतरमा अनिता मौर्य जी आदाब, अच्छे अशआर कहे आपने, दाद क़ुबूल फ़रमाएं। समर कबीर साहिब से सहमत हूँ।…"
yesterday
Dr. Vijai Shanker commented on vijay nikore's blog post श्रध्दांजलि
"आदरणीय विजय निकोर जी , आपकी लेखनी के साथ साथ आपके विचार बहुत गंभीर होते हैं और भावनाएं मानवता से…"
Wednesday
Dr. Vijai Shanker commented on Sushil Sarna's blog post अपने दोहे .......
"आदरणीय सुशील सरना जी , सच्ची पूजा का नहीं, समझा कोई अर्थ ।बिना कर्म संंसार में,अर्थ सदा है व्यर्थ…"
Wednesday
Dr. Vijai Shanker commented on Anita Maurya's blog post एक साँचे में ढाल रक्खा है
"अच्छा है , बधाई , सादर."
Wednesday
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Anita Maurya's blog post एक साँचे में ढाल रक्खा है
"मुहतरमा अनिता मौर्य जी आदाब, अच्छे अशआर कहे आपने, दाद क़ुबूल फ़रमाएं। समर कबीर साहिब से सहमत हूँ।…"
Wednesday
Samar kabeer commented on Anita Maurya's blog post एक साँचे में ढाल रक्खा है
"मुहतरमा अनीता मौर्य जी आदाब, ओबीओ पर आपकी ये पहली रचना है शायद । अच्छे अशआर हैं, इसे ग़ज़ल इसलिये…"
Wednesday

© 2021   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service