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डॉ छोटेलाल सिंह's Blog – November 2017 Archive (2)

परिवर्तन (सरसी छन्द)

परिवर्तन (सरसी छन्द)



प्रचंड लीला परिवर्तन की, सभी झेलते मार

पुष्प सदा जो खिलते रहते, कम्पित होती डार।1।



भृंग मधुर रव तान सुनाते, करते वे मदहोश

गम में सभी सहन करते हैं, परिवर्तन आक्रोश।2।



हरित पर्ण पर हिमकन शोभित, नर्तन करती रोज

परिवर्तन का तांडव पल में, धूमिल करता ओज ।3।



सदा बाग का माली हँसता, सुषमा देख अपार

पतझड़ में नित रुदन करे वह, दिखता हाहाकार।4।



परिवर्तन की विषम ज्वाल में, जलता राज समाज

चीख पुकार सुनाई देती,… Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on November 27, 2017 at 6:57pm — 7 Comments

धुँआ (सरसी छन्द)

*धुआँ (सरसी छःन्द)*



आसमान में धुआँ धुआँ है, हुए सभी बेहाल |

व्याकुलता बढ़ती जाती है, जीना हुआ मुहाल ||



काली धुंध सड़क पे छायी, मुश्किल चलनी राह |

नर नारी सबके ही मुख से, निकल रही है आह ||



अस्त व्यस्त सारा जन जीवन, सुनता कौन पुकार |

आपस में कर खींचातानी,बढ़ा रहे तकरार ||



जिम्मेदारी भूल गए हैं, सभी बजाते गाल |

दिल के भीतर कालापन है, बिगड़ गयी है चाल ||



धुँधलायी नित बढ़ती जाती,उठता रोज सवाल |

फिक्र नहीं है यहाँ किसी… Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on November 13, 2017 at 5:51pm — 12 Comments

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