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Vindu Babu's Blog (19)

समर्पण....सॉनेट महर्षि अरविन्द

ऐ प्रकृति,सूक्ष्म आत्मा तुम रहती हो मुझमे

मैं गेह मात्र हूँ,तुम ही इसकी सत वासी

नश्वर अस्तित्व हमारा मिलने दो खुद में;

बन जाने दो मुझे अलौकिक दैवी राशी।

मन तुझे दिया,अपने मन का तुम पथ गढ़ना

सभी समर्पित इच्छाएं,ये तेरी हो जावें

पीछे कोई अंश हमारा नहीं छोड़ना

अद्भुत,नीरव सा मिलन हमारा हो जावे।

तेरा प्रेम,जग-प्राण,मेरा उर उसी संग

स्पन्दित होगा,और मेद, मेदनी हित।

नसों शिराओं में होगी…

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Added by Vindu Babu on May 27, 2014 at 11:00pm — 16 Comments

नन्हीं सी चिनगारी

निष्प्राण कभी लगता

जीवन

निर्मम समय-प्रहारों से

सूख-बिखरते,बू खोते

सुरभित पुष्प अतीत के.

निश्चेत 'आज' भी होता

भावी शीतल-शुष्क

हवाओं की आहट पाने को.

फिर भी कुछ अंश

जिजीविषा के रहते

गतिमान रखें जो तन को

निरा यंत्र-सा.

जो हेतु बने

दाव,हवन,होलिका के

या अस्तित्व मिटाती

झंझावर्तों में

चिनगारी...

वही एक नन्हीं सी.

द्युतिमान रहूँ मैं भी

हों तूफान,थपेड़े

या…

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Added by Vindu Babu on April 30, 2014 at 10:30pm — 30 Comments

भावों के विहंगम

तेरे फड़फड़ाते पंखों की छुअन से

ऐ परिंदे!

हिलोर आ जाती है

स्थिर,अमूर्त सैलाब में

और...

छलक जाता है 

चर्म-चक्षुओं के किनारों से

अनायास ही कुछ नीर.

हवा दे जाते हैं कभी

ये पर तुम्हारे

आनन्द के उत्साह-रंजित

ओजमय अंगार को,

उतर आती है

मद्धम सी चमक अधरोष्ठ तक,

अमृत की तरह.

विखरते हैं जब

सम्वेदना के सुकोमल फूल से पराग,

तेरे आ बैठने…

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Added by Vindu Babu on February 9, 2014 at 2:00pm — 32 Comments

भोली आस्था

एक मासूम...

तल्लीनता से जोर-जोर पढ़ रहा था

क-कमल,ख-खरगोश,ग-गणेश।

शिक्षक ने टोका

ग-गणेश! किसने बताया?

बाबा ने...

माँ और पिता को सब कुछ माना

तभी तो सबसे बड़े देव हुए।

नहीं,गणेश नहीं कहते

संप्रदायिकता फैलेगी

जिसे तुम समझो झगड़ा. .विवाद

ग-गधा कहो बेटे।

आस्था भोली थी

बाबा के गणेश,मसीहा और अल्लाह से रेंग

'गधे' में शांति खोजने…

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Added by Vindu Babu on February 2, 2014 at 4:50am — 17 Comments

योगी श्री अरविन्द/सॉनेट

सादर वन्दे वन्दनीय सुधी वृन्द।

महानुभावों सर्वज्ञात है, गत 5 दिसम्बर को महर्षि अरविन्द का निर्वाण दिवस था। आपका साहित्य(सावित्री अभी छू भी नहींसकी),मेरे हृदय को बहुत सहलाता है।यद्यपि  इस महान दार्शनिक,कवि और योगी के साहित्य की अध्यात्मिक ऊंचाई के दर्शन करने में भी समर्थ नहीं हूँ फिर भी सूरज को दिया दिखाने जैसा कार्य किया है,जो आपको निवेदित है।सादर निवेदन है कि मुझे जरुर अवगत कराएँ की मेरी समझ कहाँ तक सफल हो पाई…

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Added by Vindu Babu on December 11, 2013 at 8:11am — 20 Comments

'मैं' को ध्येय बनाऊँगी

कल्पना के मुक्त पर से

सीमाओं तक जाऊँगी।

दुश्वारियों से परे, निज

अस्तित्व को मैं…

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Added by Vindu Babu on December 4, 2013 at 12:30pm — 30 Comments

तडफ

भंवरों ने घेरा

पहुंचाया अवसादों की गर्तो में

संयोग बड़ ही सुखकर थे जिनके

उनके ही वियोग भुजंग बने,लगे डसने

कौन शक्ति? जो हर क्षण

अपनी ही ओर हमें है खींच रही

कल से खींचा,आज छुड़ाया

जो आयेगा वो भी छुटेगा

नश्वरता में इक दिन जीवन ही डूबेगा 

क्षणभंगुरता से हो विकल हृदय

साश्वत खोज में जब भी तड़फा है

मोहवार्तों ने आलिंगन कर

जिज्ञासु तड़फ को मोड़ा है।

खार उदधि की हर विंदु…

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Added by Vindu Babu on November 23, 2013 at 10:30am — 20 Comments

'भ्रमर गीत'

जन्माष्टी के उपलक्ष में निवेदित रचना-

 

विमुग्ध हो फूल का रसपान कर

ज्यों त्यागते हों भ्रमर !



भाँति तेरे कृष्ण भी,

बंशी सुनाते,

चुरा कर चित्त कुब्जा में रमें

छोड़ दी मेरी खबर ।

पीत पर लहराता है तू भी,

निज मित्र के पट पीत सम,

तू भी काला श्याम सा

कपटी कुचाली प्रीति डोरी तोड़ पल में

मन रिझाता है ।

भृंग की भनक संदेश है क्या?



पर...

गोपियां सुनतीं व्यथा कह उससे,

द्वन्द्व, मन का घटातीं,

प्रेम जो…

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Added by Vindu Babu on August 24, 2013 at 6:30pm — 5 Comments

'ध्वज'

हो नहीं आक्रांत,

समर्पण भाव पर

सुर्ख आह्लाद की

जो छाप है,

भाव उन्नत उपजते

बुद्धि उर्वर,विवेक में

समृद्ध मनन का निवास है,

ना विकलता,

उर में यदि

धवल शान्ति का

प्रकाश विद्यमान है,

जीवन्तता

निरन्त चक्र सम

चैतन्यता

रग-रग मे तुम्हारे जो व्याप्त है,

तो समझ लो

हे आत्मन्!

ये तुम्हारा ही नहीं

राष्ट्र का उत्थान है।

स्व से उठकर

'पर' पर जो तुम्हारा राग है,

ध्वज तुम्ही हो,आन और...

राष्ट्र-गौरवगान… Continue

Added by Vindu Babu on August 17, 2013 at 9:27am — 17 Comments

परिवर्तन

परिवर्तन है सत्य सदा

अपनाना इसको सीखें।

इसमें ही है नव-जीवन

नूतन-पथ बुनना सीखें।।



नूतनता,खुशियां जनती

उत्सव नित्य मनाएं हम।

खुश रहकर कुसमय काटें

समय से न कट जाएं हम।

जीवन रंग सजाने को,

नयन-अश्रु पीना सीखें।।



शोक,हर्ष,उत्थान-पतन

हमें तपा कुन्दन करते ।

अगम सिन्धु की झंझा में

कर्म सदा नौका बनते।

निष्कामी आराधक बन

जग-वन्दन करना सीखें।।



प्राण मात्र से प्रीति करें,

प्रेम-पात्र जो बनना है।

अब तो… Continue

Added by Vindu Babu on August 9, 2013 at 8:58am — 20 Comments

हो भान तो वह!

एक प्रयास

(बहर- 2122 2122 2122)



लक्ष्य क्या जो खोजते हम दौड़ते हैं।

है कहाँ ये आज तक ना जानते हैं।।



ढूंढ साधन,साधने को लक्ष्य सोंचा,

ना सधा ये,सब 'स्व' को ही रौंदते हैं।



जग छलावे में भटकते इस तरह हम,

शांति के हित शांति खोते भासते हैं ।

*समर्पण हो पूर्ण,या लब सीं लिए हों,

क्या शिला भी प्रेम को पा सीलते हैं?

ना पहुंचू पर मुझे हो भान तो वह,

तब बढेंगे, आज तो बस खोजते हैं ।।

*संशोधित …

Continue

Added by Vindu Babu on July 18, 2013 at 5:00am — 22 Comments

काँपते उर

संवेदना के शुष्क तरु
के सानिध्य में,
पुष्प प्रीति के,
ढूंढे जा रहे हैं
आज।
पत्थरों को ईश मान,
मंदिरों में घट बंधा,
घट-जलधार के पास से
पिपासाकुल खग...
भगाए जा रहें हैं
आज।
प्रसाधन-जनित
यज्ञशाला की अग्नि में,
आंच के भय से
आहुति,
सब घटा रहे हैं।
सुना है,देखा नहीं
भगवान औ भूत,दोनों
पर...ईशास्था से अभय
को नकार
भूत में विश्वास कर,
उर काँपते हैं आज।
-विन्दु
(मौलिक/अप्रकाशित)

Added by Vindu Babu on May 27, 2013 at 8:10am — 14 Comments

'बदलाव'

उद्येश्य बदल गया-
भावों की पहरन
शब्द का
परिमाण बदल गया,
साहित्य,दर्पण समाज का
धुंधला हो गया।
प्रतिद्वंदी
तलवार का,कलम
लोकेष्णा का दास बन गया।
बाढ़ है, तो बारिश भी है
आऽज,भावेश का
बहाव बदल गया।
साहित्य का...
उद्येश्य बदल गया।
परिवेश बदल गया।।
-विन्दु
(मौलिक/अप्रकाशित)

Added by Vindu Babu on April 26, 2013 at 11:03am — 17 Comments

'है पहचानना'

उद्विग्न चित्त
पहचान है
असिद्ध बुद्धि की।
आता कहाँ उबाल
सिद्ध दल में
बटलोई की।
स्वरूप में ही
स्थिति होना
है स्वस्थ होना।
निज मान,अपमान
आनन्द की चाबी
औरों के हाथ
क्या देना।
चिरानन्द है
'स्वयं' में
बस है पहचानना।
-विन्दु
(मौलिक,अप्रकाशित)

Added by Vindu Babu on April 16, 2013 at 11:24pm — 10 Comments

क्या जीवन है/हाइकू (प्रयास)

बालू का स्थल
जालाभास रश्मि से
तपती प्यास
------------------

प्रीति सुमन
नागफनी का बाग
व्यर्थ खोजना
------------------

तृप्ति कामना
घी दहकाए ज्वाला
पूर्ति आहुति
-------------------

जीवन यात्रा
हर क्षण रहस्य
रोना या गाना
-------------------
गन्तव्य कहाँ!
लमकन जारी है
क्या जीवन है?
-विन्दु (मौलिक,अप्रकाशित)

Added by Vindu Babu on April 4, 2013 at 11:54pm — 17 Comments

'अंश हूं तुम्हारा'

जब जिन्दगी की किनारों की
हरियाली सूख गई हो,
पक्षी मौन होकर
आपने नीड़ों मे जा छुपे हों,
सूरज पर ग्रहण की कालिमा
गहराती ही जा रही हो,
मित्र,स्वजन कंटीली राह में
अकेले छोड़कर चल दिये हों,
संसार की सारी नाखुशी
मेरे ललाट को ढक रही हो,
तब मेरे प्रभु!
मेरे होठों पर हंसी की
उजली किरण बनाए रखना।
मैं अंश हूं तुम्हारा
कायरता को न सौंप देना।।
-विन्दु

Added by Vindu Babu on March 23, 2013 at 11:11pm — 8 Comments

मृत्यु प्रिया

नश्वर जग
तुम नित्य सदा से
मैंने ये पाया
------------
तुम निष्पक्ष
आज अराजक है
ये जग जब
------------
दयावान तू
उबे,थके,दुखी के
कर गहती
------------
छिद्र बहुत
जग ने कर डाले
गले लगा ले
-------------
नौका पाई थी
भव से तरने को
इसे नसाया
-------------
ये रिश्ते नाते
हैं लक्ष्य मे बाधक
तू मिलवा दे
------------
तुझे दुलारूं
मृत्यु प्रिया जाने क्यूं
सब डरते
-विन्दु

Added by Vindu Babu on March 21, 2013 at 10:13pm — 12 Comments

'सुखद छांव'

मैं श्रमित

जिन्दगी की जद्दोजहद से व्यथित

चली जा रही थी

अज्ञात गन्तव्य की ओर

प्रेममय संवाद सुनकर रुकी

सघन छांव ने दिया ठौर

मतवाली लतिका

तरु के उर पर करती बिहार

गद गद था तरु

जो लतिका बनी गले का हार

तूफां हो या भानु-ताप

थामे थे इक-दूजे का हाथ

मैं 'भाग्यवान ज्यादा',था विवाद का मसला

सुनकर हृदय मेरा मचला और बोला-

मैं धन्य तुम दोनों से कहीं अधिक हूं

शीतल छांव का भाजक एक पथिक हूं

त्याग समर्पण प्रीति के प्राण हैं

चैन… Continue

Added by Vindu Babu on March 11, 2013 at 6:27pm — 9 Comments

'माँ'

माँ..

मैं परिणाम तुम्हारे त्यागों का

वरदान तेरे संघर्षों का

सम्मान तुम्हारे भावों का

निष्कर्ष तेरे कर्तव्यों का

कोरी है रसना की परिपाटी,

क्या शब्द बुनूं तेरी ममता में...

तेरे,

संघर्षों से अस्तित्व मिला

तेरे भावों से उर प्रेम खिला

कर्तव्यों से पथ-दर्श मिला

कुछ यूं हि मुझे आकार मिला,

क्या प्रतिफल दूं तेरी ममता में...

तूने,

सृजन किया है दृढ़ता से

पर पाला अति कोमलता से

मोह त्यागकर ममता से

खुद जल,सींचा शीतलता… Continue

Added by Vindu Babu on February 21, 2013 at 6:11am — 17 Comments

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