For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Hariom Shrivastava's Blog (44)

कुण्डलिया छंद-

1-

जितना जब भी जो बचा, खाया सबके बाद।

फिर भी उसने की नहीं, जीवनभर फरियाद।।

जीवनभर फरियाद, नहीं करती यह नारी।

किंतु वृद्ध असहाय, वही अपनों से हारी।।

कहते कवि हरिओम,ध्यान रखना बस इतना।

माँ का प्रेम अनंत, गहन सागर के जितना।।

2-

जिनके जीवन में करे, माँ खुशियाँ अपलोड।

वृद्धावस्था में वही, बदल रहे हैं मोड।।

बदल रहे हैं मोड, मगर माँ तो माँ होती।

करके उनको याद, बैठ आश्रम में रोती।।

कोई कर दे क्लीन, वायरस अब तो इनके।

माँ ने कर अपडेट,…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on October 29, 2019 at 10:51pm — 3 Comments

कुण्डलिया छंद-

नयनों का जिस क्षण हुआ, नयनों से सम्पर्क।
नयन नयन के हो गए, हुआ न कोई तर्क।।
हुआ न कोई तर्क, नयन नयनों पर छाए।
निकट नयन को देख, नयन नत-नत शरमाए।।
नयना ही आधार, नयन के है चयनों का।
नयन नयन का मेल, निरामय है नयनों का।।
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
#हरिओम श्रीवास्तव#

Added by Hariom Shrivastava on September 3, 2019 at 7:04pm — 4 Comments

कुण्डलिया छंद -

1-

ख़ातूनों का हो गया, खत्म एक संत्रास।

चर्चित तीन तलाक का, हुआ विधेयक पास।।

हुआ विधेयक पास, सभी मिल खुशी मनाएँ।

अब होंगी भयमुक्त, सभी मुस्लिम महिलाएँ।।

बीती काली रात्रि, चाँद निकला पूनों का।

बढ़ा आत्मविश्वास, आज से ख़ातूनों का।।

2-

तीस जुलाई ने रचा, एक नया इतिहास।

मुद्दा तीन तलाक पर, हुआ विधेयक पास।।

हुआ विधेयक पास, साँस लेगी अब नारी।

कहकर तीन तलाक, जुल्म होते थे भारी।।

ख़ातूनों ने आज, विजय खुद लड़कर पाई।

दो हजार उन्नीस, दिवस है…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on July 31, 2019 at 7:51pm — 4 Comments

कुण्डलिया छंद-

- "कुण्डलिया छंद"-
=========================
तेरा मुखड़ा चाँद सा, उतर न जाए यान।
गंजा पति कहने लगा, बचना मेरी जान।।
बचना मेरी जान,दक्षिणी ध्रुव पर खतरा।
चिंता की है बात, उमरिया  तेरी  सतरा।।
एक जगह दो चाँद, एक  तेरा  इक मेरा।
मेरे  सिर का  एक, दूसरा  मुखड़ा  तेरा।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
-हरिओम श्रीवास्तव-

Added by Hariom Shrivastava on July 23, 2019 at 3:30pm — 2 Comments

कुण्डलिया छंद-

1-

तुलसी बाबा कह गए, परहित सरिस न धर्म।

परपीड़ा सम है नहीं, अधमाई का कर्म।।

अधमाई का कर्म, मर्म यह जिसने जाना।

उसको ही नरश्रेष्ठ, जगत ने भी है माना।।

जहाँ प्रेम सौहार्द, वहीं है काशी-काबा।

परहित सरिस न धर्म, कह गए तुलसी बाबा।।

2-

सबको ही यह ज्ञात है, परहित सरिस न धर्म।

किंतु आज वह चैन में, जिसके कुत्सित कर्म।।

जिसके कुत्सित कर्म, उसी के वारे न्यारे।

झूठ कपट छल छिद्र, स्वार्थ ने पैर पसारे।।

मिथ्या पाले दम्भ, आदमी भूला रब को।

रब…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on June 7, 2019 at 7:11pm — 3 Comments

कुण्डलिया छंद-(विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में)

1-

हरियाली  कम  हो  गई, हुई  प्रदूषित  वायु।

शनै-शनै कम हो रही,अब मनुष्य की आयु।।

अब मनुष्य की आयु, धरा पर  संकट भारी।

पर्यावरण   सुधार, विश्व  में  हैं  अब  जारी।।

दिवस मनाकर एक,मुक्ति क्या मिलने वाली।

इसका सिर्फ निदान, बढ़े फिर से हरियाली।।

2-

जीवन  को  संकट  हुआ, करते  सभी  प्रलाप।

पर्यावरण  बिगड़  गया, बढ़ा  धरा  का  ताप।।

बढ़ा   धरा  का   ताप, गर्क  होता  अब  बेड़ा।

पहले  बिना  विचार, प्रकृति को  हमने  छेड़ा।।

अब भी एक उपाय, करें हम विकसित वन…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on June 5, 2019 at 8:12pm — 1 Comment

कुण्डलिया छंद-

1-

भाई भाई के लिए, हो जाता कुर्बान।

रिश्ता है यह खून का, ईश्वर का वरदान।।

ईश्वर का वरदान, नहीं है जिसका सानी।

पाण्डव हों या राम, सभी की यही कहानी।।

सुलझाकर मतभेद, न मन में रखें खटाई।

बुरे वक्त में काम, सिर्फ आता है भाई।।

2-

भाई का रिश्ता अमर, जैसे लक्ष्मण राम।

मगर विभीषण ने किया, इसे बहुत बदनाम।।

इसे बहुत बदनाम, और भेदी कहलाया।

देकर सारे भेद, नाश कुल का करवाया।।

तुलसी ने रच ग्रंथ, इन्हीं की महिमा गाई।

दशरथ नंदन राम, भरत लक्ष्मण…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on May 17, 2019 at 9:40am — 4 Comments

चतुष्पदी -

धरती  से  तो   आसमान   का,  हो   जाता   अनुमान।
किंतु न खुद की छत से दिखता,खुद का कभी मकान।।
जो   जमीन   पर   पैर  जमाकर, करे   लक्ष्य   संधान।
वही   बनाता   है   इस   जग  में, नये-नये    प्रतिमान।।

(मौलिक व अप्रकाशित)
-हरिओम श्रीवास्तव-

Added by Hariom Shrivastava on May 14, 2019 at 2:00pm — 4 Comments

सार छंद - (मातृदिवस पर रचित)

1~

बचपन की यादों में जब मैं, मातृ दिवस पर लौटा।

पाया खुद के ही मुखड़े पर, नकली एक मुखौटा।।

लौट गया मैं गाँव अचानक, माँ से करने बातें।

माँ तो वहाँ न थी लेकिन थीं, यादों की बारातें।।

2~

माता माता मन्दिर जाती, रखे हाथ पर लोटा।

सीढ़ी चढ़ने में साड़ी का, लेती सदा कछोटा।।

माँ के पीछे-पीछे चलकर, हम बच्चे भी जाते।

माता को चुपचाप देखते, माता से बतियाते।।

3~

माँ ने अपनी खातिर माँ से, कभी नहीं कुछ माँगा।

उन मधुरिम यादों को हमने, क्योंकर खूँटी…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on May 13, 2019 at 11:30am — 2 Comments

सार छंद -

1~

भवन और सड़कें पुल-पुलियाँ,मजदूरों की माया।

ईंटे पत्थर ढोते-ढोते, सिकुड़ी इनकी काया।।

श्रम के कौशल से भारत में, ताजमहल बन पाया।

लेकिन मजदूरों के हिस्से, हाथ कटाना आया।।

2~

भूख मिटाने की खातिर ही, श्रम करतीं महिलाएँ।

यदाकदा मजदूरी करते, बाल श्रमिक भी पाएँ।।

शिक्षा से वंचित रह जातीं, इनकीं ही संतानें।

मगर नीति निर्धारक शिक्षा, सौ प्रतिशत ही मानें।।

3~

सबकी खातिर महल अटारीं, जो मजदूर बनाते।

भूमिहीन होकर बेचारे, बेघर ही रह…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on May 9, 2019 at 9:28pm — 2 Comments

मदलेखा छंद -

  1. (मगण,सगण व गुरु एवं दो-दो चरणों में सम तुकांतता)

    -----------------------------------------------------------------

    1-

    नेताजी   कल   आए, बैठे   थे   बतियाए।

    बोले वोट दिलाओ, आओ हाथ मिलाओ।।

    2-

    नेताजी  जब आए, नारे  खूब  लगाए।

    घण्टों वो रिरियाए, पैसे भी दिखलाए।।

    3-

    मेरी  नाक  बचाओ, कोई  स्वाँग  रचाओ।

    जो चाहो तुम बोलो, मेरी किस्मत खोलो।।

    4-

    जो नेतागण आते, दूजे को गरियाते।

    घोटाले  करवाते, बातों में भरमाते।।

    5-

    कुर्सी…
Continue

Added by Hariom Shrivastava on May 8, 2019 at 10:30am — 2 Comments

कुण्डलिया छंद-

1-

राह  बताते  और  को, स्वयं  लाँघते  भीत।

जग का यही विधान है,यही आज की रीत।।

यही  आज की  रीत, सभी को प्रवचन देते।

लेकिन  वही  प्रसंग, अमल में कभी न लेते।।

खुद   करते   पाखंड,  दूसरों  को  भरमाते।…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on May 2, 2019 at 11:01pm — 6 Comments

कुण्डलिया छंद-. [अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के उपलक्ष्य में]

खेती में घाटा हुआ, कृषक हुए मजबूर।

क्षुधा मिटाने के लिए, बने आज मजदूर।।

बने आज मजदूर, हुए खाने के लाले।

चले गाँव को छोड़, घरों में डाले ताले।।

खाली है चौपाल, गाँव में है सन्नाटा।

फाँसी चढ़े किसान, हुआ खेती में घाटा।।

2-

बिकने को बाजार में, खड़ा आज मजदूर।

फिर भी देश महान है, उनको यही गुरूर।।

उनको यही गुरूर,नहीं अब रही गरीबी।

वह खुद हुए धनाड्य,साथ में सभी करीबी।।

नेता शासक वर्ग, सभी लगते घट चिकने।

लेते आँखें मूँद, खड़ा है मानव…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on May 1, 2019 at 3:11pm — 8 Comments

कुण्डलिया छंद-

1-

नेता आपस में लड़ें, रोज जुबानी जंग।

मर्यादाएँ हो रहीं, इस चुनाव में भंग।।

इस चुनाव में भंग, सभी ने गरिमा खोई।

फैलाकर उन्माद, परस्पर नफरत बोई।।

जनता का इस बार, बनेगा वही चहेता।

जो कर सके विकास, चाहिए ऐसा नेता।।

2-

बातें बेसिरपैर कीं, नेता करते रोज।

मर्यादाएँ तोड़कर, दिखलाते हैं ओज।।

दिखलाते हैं ओज, मंच से देते गाली।

खुद की ठोकें पीठ,बजावें खुद ही ताली।।

संसद में जो लोग, चलाते मुक्के लातें।

गरिमा के विपरीत, वही करते हैं…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on April 19, 2019 at 10:00am — 4 Comments

कुण्डलिया छंद-

ढलती जाती उम्र में, डगमग होती नाव।

कभी-कभी नैराश्य के, आ जाते हैं भाव।।

आ जाते हैं भाव, और दुख होता भारी।

लगने लगती व्यर्थ, तभी यह दुनियादारी।।

जीर्णशीर्ण यह नाव,चले हिचकोले खाती।

घिरता है अवसाद, उम्र जब ढलती जाती।।

2-

माला फेरी उम्रभर, तीरथ किए हजार।

काम क्रोध मद मोह से, पाया कभी न पार।।

पाया कभी न पार, जिन्दगी व्यर्थ गँवाई।

बीत गई अब उम्र, विदा की बेला आई।।

मन में रखकर द्वेष, बैर अपनों से पाला।

धुला न मन का मैल,जपी निसदिन ही…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on April 12, 2019 at 9:22pm — 6 Comments

कुण्डलिया छंद -

दिखलाते हैं जो सदा, व्हाट्सएप पर ओज।
गुडमार्निंग गुडनाइट जो, करें नियम से रोज।।
करें नियम से रोज, किंतु जब सम्मुख मिलते।
तब फिर इनके होंठ, नहीं रत्तीभर हिलते।।
आगे बढ़कर हाथ, नहीं यह कभी मिलाते।
वटसिपिया व्यवहार, नैट पर ये दिखलाते।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

Added by Hariom Shrivastava on April 3, 2019 at 11:06am — 2 Comments

कुण्डलिया छंद-

मतदाता को फाँसने, डाल रहे हैं जाल।
नेता आपस में सभी, कीचड़ रहे उछाल।।
कीचड़ रहे उछाल, मची है ता ता थैया।
नागनाथ हैं एक, दूसरे साँप नथैया।।
हर नेता ही रोज, निराले ख्वाब दिखाता।
सारे नटवरलाल, करे अब क्या मतदाता।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

Added by Hariom Shrivastava on April 1, 2019 at 11:31pm — 8 Comments

सार छंद -

1-

अर्थ धर्म या काम मोक्ष में, अर्थ प्रथम है आता।

फिर भी पैसा मैल हाथ का,क्योंकर है कहलाता।।

सब कुछ भले न हो यह पैसा, पर कुछ तो है ऐसा।

जिस कारण जीवनभर मानव,करता पैसा-पैसा।।

2-

बिना अर्थ सब व्यर्थ जगत में,क्या होता बिन पैसा।

निर्धन से वर्ताव यहाँ पर, होता कैसा-कैसा।।

धनाभाव ने हरिश्चंद्र को,समय दिखाया कैसा।

बेटे के ही क्रिया-कर्म को, पास नहीं था पैसा।।

3-

इसी धरा पर पग-पग दिखती,पैसे की ही माया।

पैसा-पैसा करते भटके, पंचतत्व की…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on March 29, 2019 at 12:21pm — 2 Comments

कुण्डलिया छंद- 'मतदान'

1-

जिसको भी मतदान का, भारत में अधिकार।

उसको चुननी चाहिए, एक कुशल सरकार।।

एक कुशल सरकार, वोट देने से बनती।

जब देते सब वोट, चैन की तब ही छनती।।

यह भी करें विचार, वोट देना है किसको।

उसको ही दें वोट, लगे अच्छा जो जिसको।।

2-

नेता कहें चुनाव में, वोटर को भगवान।

लोकतंत्र के यज्ञ में, समिधा है मतदान।।

समिधा है मतदान, यज्ञ में शामिल होना।

यह अमूल्य अधिकार, नहीं आलस में खोना।।

करके सोच विचार, वोट जो वोटर देता।

वह वोटर निष्पक्ष, सही चुनता…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on March 26, 2019 at 1:30pm — 6 Comments

बरवै छंद -

1-

हिरणाकुश नामक था, इक सुल्तान।

खुद को ही कहता था, जो भगवान।।

2-

जन्मा उसके घर में, सुत प्रहलाद।

जो करता था हर पल, प्रभु को याद।।

3-

दोनोों  के  थे  विचार, सब  विरुद्ध।

हिरणाकुश था सुत से, भारी क्रुद्ध।।

4-

बहिन होलिका पर था, ऐसा चीर।

जिसे पहनने से ना, जले शरीर।।

5-

मिला होलिका को तब, यह आदेश।

प्रहलाद को गोद लो, कटे कलेश।।

6-

बैठा गोद जपा फिर, प्रभु का नाम।

हुआ होलिका का ही, काम तमाम।।

7-…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on March 25, 2019 at 8:00pm — 2 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
""ओबीओ लाइव तरही मुशायरा"अंक-115 को सफ़ल बनाने के लिए सभी ग़ज़लकारों का हार्दिक आभार व…"
21 hours ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"जनाब दण्डपाणि नाहक़ जी आदाब,तरही मिसरे पर ग़ज़ल अच्छी कही आपने,बधाई स्वीकार करें ।"
22 hours ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"जी,आजकल ओबीओ पर संकलन नहीं निकल रहे हैं,संचालक महोदय व्यस्त रहते हैं,कहाँ, नहीं मालूम ।"
22 hours ago
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"ये ज़मीन है वही तो ये वही तो आसमाँ है जिसे सब तलाश करते वो वफ़ा बता कहाँ है तेरे सामने कहूं कुछ ये…"
22 hours ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"जी,क्षमा करें ! आपकी ग़ज़ल के नीचे मौलिक/ अप्रकाशित लिखा देख कर धोका हो गया ।"
22 hours ago
दिनेश कुमार replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"मैं दूसरों की ग़ज़ल पर अपने विचार अवश्य रखूँगा, सर। लेकिन अभी वक़्त कम बचा है। संकलन के समय, हर ग़ज़ल पर…"
22 hours ago
Amit Kumar "Amit" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"आदरणीय क्षमा करें किंतु  गजल अलग से पोस्ट नहीं की है रिप्लाई बॉक्स में ही है अगर अलग से की…"
22 hours ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"जनाब दिनेश जी,दूसरों की ग़ज़लों पर भी अपने विचार रखें ।"
22 hours ago
दिनेश कुमार replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"बहुत बहुत शुक्रिया आ. रवि भाई जी। आभार"
22 hours ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"जी,दो बार ग़ज़ल पोस्ट करना नियम के विरुद्ध है,आपको ये ग़ज़ल संशोधित लिख कर पहली ग़ज़ल के रिप्लाय में…"
22 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"आदरणीय दिनेश भाई, इस सुंदर ग़ज़ल पर आपको हार्दिक बधाई। सभी अश'आर बहुत अच्छे हुए हैं।"
22 hours ago
दिनेश कुमार replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"बहुत बहुत शुक्रिया आ. लक्ष्मण जी। नवाज़िश मुहब्बतों के लिए।"
22 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service