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बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s Blog (43)

असबंधा छंद "हिंदी गौरव

असबंधा छंद "हिंदी गौरव

भाषा हिंदी गौरव बड़पन की दाता।

देवी-भाषा संस्कृत मृदु इसकी माता।।

हिंदी प्यारी पावन शतदल वृन्दा सी।

साजे हिंदी विश्व पटल पर चन्दा सी।।

हिंदी भावों की मधुरिम परिभाषा है।

ये जाये आगे बस यह अभिलाषा है।।

त्यागें अंग्रेजी यह समझ बिमारी है।

ओजस्वी भाषा खुद जब कि हमारी है।।

गोसाँई ने रामचरित इस में राची।

मीरा बाँधे घूँघर पग इस में नाची।।

सूरा ने गाये सब पद इस में प्यारे।

ऐसी थाती पा कर हम सब से…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 14, 2019 at 9:10am — 3 Comments

ग़ज़ल (देते हमें जो ज्ञान का भंडार)

गुरु पूर्णिमा के विशेष अवसर पर:-

बह्र:- 2212*4

देते हमें जो ज्ञान का भंडार वे गुरु हैं सभी,

दुविधाओं का सर से हरें जो भार वे गुरु हैं सभी।

हम आ के भवसागर में हैं असहाय बिन पतवार के,

जो मन की आँखें खोल कर दें पार वे गुरु हैं सभी।

ये सृष्टि क्या है, जन्म क्या है, प्रश्न सारे मौन हैं,

जो इन रहस्यों से करें निस्तार वे गुरु हैं सभी।

छंदों का सौष्ठव, काव्य के रस का न मन में भान…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on July 16, 2019 at 3:30pm — 2 Comments

बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (ग़ज़ल)

ग़ज़ल (वो जब भी मिली)

बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (12112*2)

वो जब भी मिली, महकती मिली,

गुलाब सी वो, खिली सी मिली।

हो गगरी कोई, शराब की ज्यों,

वो वैसी मुझे, छलकती मिली।

दिखाई पड़ीं, वे जब भी मुझे,

उन_आँखों में बस, खुमारी मिली।

लगाने की दिल, ये कैसी सज़ा,

वफ़ा की जगह, जफ़ा ही मिली।

कभी वो मुझे,बताए ज़रा,

जो मुझ में उसे, ख़राबी मिली।

गिला भी किया, ज़रा भी अगर,

पुरानी…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on July 14, 2019 at 3:30pm — 5 Comments

तोटक छंद "विरह"

तोटक छंद "विरह"

सब ओर छटा मनभावन है।

अति मौसम आज सुहावन है।।

चहुँ ओर नये सब रंग सजे।

दृग देख उन्हें सकुचाय लजे।।

सखि आज पिया मन माँहि बसे।

सब आतुर होयहु अंग लसे।।

कछु सोच उपाय करो सखिया।

पिय से किस भी विध हो बतिया।।

मन मोर बड़ा अकुलाय रहा।

विरहा अब और न जाय सहा।।

तन निश्चल सा बस श्वांस चले।

किस भी विध ये अब ना बहले।।

जलती यह शीत बयार लगे।

मचले मचले कुछ भाव जगे।।

बदली नभ की न जरा…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on May 8, 2019 at 2:21pm — 6 Comments

कनक मंजरी छंद "गोपी विरह"

कनक मंजरी छंद "गोपी विरह"

तन-मन छीन किये अति पागल,

हे मधुसूदन तू सुध ले।

श्रवणन गूँज रही मुरली वह,

जो हम ली सुन कूँज तले।।

अब तक खो उस ही धुन में हम,

ढूंढ रहीं ब्रज की गलियाँ।

सब कुछ जानत हो तब दर्शन,

देय खिला मुरझी कलियाँ।।

द्रुम अरु कूँज लता सँग बातिन,

में यह वे सब पूछ रही।

नटखट श्याम सखा बिन जीवित,

क्यों अब लौं, निगलै न मही।।

विहग रहे उड़ छू कर अम्बर,

गाय रँभाय रही सब हैं।

हरित सभी ब्रज के तुम पादप,

बंजर…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 22, 2019 at 10:54am — 4 Comments

अहीर छंद "प्रदूषण"

अहीर छंद "प्रदूषण"

बढ़ा प्रदूषण जोर।

इसका कहीं न छोर।।

संकट ये अति घोर।

मचा चतुर्दिक शोर।।

यह दावानल आग।

हम सब पर यह दाग।।

जाओ मानव जाग।

छोड़ो भागमभाग।।

मनुज दनुज सम होय।

मर्यादा वह खोय।।

स्वारथ का बन भृत्य।

करे असुर सम कृत्य।।

जंगल करत विनष्ट।

सहे जीव-जग कष्ट।।

प्राणी सकल…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 18, 2019 at 1:18pm — 6 Comments

ओ बी ओ मंच को समर्पित ग़ज़ल (1222*4)

तुझे इस वर्ष नौवें की ओ बी ओ बधाई है,

हमारे दिल में चाहत बस तेरी ही रहती छाई है।

मिला इक मंच तुझ जैसा हमें अभिमान है इसका,

हमारी इस जहाँ में ओ बी ओ से ही बड़ाई है।

सभी इक दूसरे से सीखते हैं और सिखाते हैं,

हमारी एकता की ओ बी ओ ही बस इकाई है।

सभी झूमें, सभी गायें यहाँ ओ बी ओ में मिल के,

सभी हम भक्त तेरे हैं तू ही प्यारा कन्हाई है।

लगा जो मर्ज लिखने का, दिखाते ओ बी ओ को ही,

उसी के पास इसकी क्यों कि इकलौती दवाई…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 1, 2019 at 12:00pm — 6 Comments

जागो भाग्य विधाताओ

(प्रति चरण 8+8+8+7 वर्णों की रचना)

देखा अजब तमाशा, छायी दिल में निराशा,

चार गीदड़ ले गये, मूँछ तेरी नोच के।

सोये हुए शेर तुम, भूतकाल में हो गुम,

पुरखों पे नाचते हो, नाक नीची सोच के।।

पूर्वजों ने घी था खाया, नाम तूने वो गमाया,

सूंघाने से हाथ अब, कोई नहीं फायदा।

ताव झूठे दिखलाते, गाल खूब हो बजाते,

मुँह से काम हाथ का, होने का ना कायदा।।

हाथ धरे बैठे रहो, आँख मीच सब सहो,

पानी पार सर से हो, मुँह तब फाड़ते।…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on February 16, 2019 at 5:00pm — 3 Comments

षट ऋतु हाइकु

षट ऋतु हाइकु

चैत्र वैशाख
छायी 'बसंत'-साख।
बौराई शाख।
**
ज्येष्ठ आषाढ़
जकड़े 'ग्रीष्म'-दाढ़
स्वेद की बाढ़।
**
श्रावण भाद्र
'वर्षा' से धरा आर्द्र
मेघ हैं सांद्र।
**
क्वार कार्तिक
'शरद' अलौकिक
शुभ्र सात्विक।
**
अग्हन पोष
'हेमन्त' भरे रोष
रजाई तोष।
**
माघ फाल्गुन
'शिशिर' है पाहुन
तापे आगुन।
*******

मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on January 31, 2019 at 12:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल (आज फैशन है)

ग़ज़ल (आज फैशन है)

1222 1222 1222 1222

लतीफ़ों में रिवाजों को भुनाना आज फैशन है,

छलावा दीन-ओ-मज़हब को बताना आज फैशन है।

ठगों ने हर तरह के रंग के चोले रखे पहने,

सुनहरे स्वप्न जन्नत के दिखाना आज फैशन है।

दबे सीने में जो शोले जमाने से रहें महफ़ूज़,

पराई आग में रोटी पकाना आज फैशन है।

कभी बेदर्द सड़कों पे न ऐ दिल दर्द को बतला,

हवा में आह-ए-मुफ़लिस को उड़ाना आज फैशन है।

रहे आबाद हरदम ही अना की बस्ती…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on May 2, 2018 at 8:30am — 13 Comments

ग़ज़ल (कैसी ये मज़बूरी है)

ग़ज़ल (कैसी ये मज़बूरी है)

22 22 22 22 22 22 22 2

गदहे को भी बाप बनाऊँ कैसी ये मज़बूरी है,

कुत्ते सा बन पूँछ हिलाऊँ कैसी ये मज़बूरी है।

एक गाम जो रखें न सीधा चलना मुझे सिखायें वे,

उनकी सुन सुन कदम बढ़ाऊँ कैसी ये मज़बूरी है।

झूठ कपट की नई बस्तियाँ चमक दमक से भरी हुईं,

उन बस्ती में घर को बसाऊँ कैसी ये मज़बूरी है।

सबसे पहले ऑफिस आऊँ और अंत में घर जाऊँ,

मगर बॉस को रिझा न पाऊँ कैसी ये मज़बूरी है।

ऊँचे घर…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 22, 2018 at 3:30pm — 13 Comments

ग़ज़ल(याद आती हैं जब)

ग़ज़ल(याद आती हैं जब)

212 212 212 212

याद आतीं हैं जब आपकी शोखियाँ,

और भी तब हसीं होतीं तन्हाइयाँ।

आपसे बढ़ गईं इतनी नज़दीकियाँ,

दिल के लगने लगीं पास अब दूरियाँ।

डालते गर न दरिया में कर नेकियाँ,

हारते हम न यूँ आपसे बाज़ियाँ।

गर न हासिल वफ़ा का सिला कुछ हुआ,

उनकी शायद रही कुछ हों मज़बूरियाँ।

मिलता हमको चराग-ए-मुहब्बत अगर,

राह में स्याह आतीं न दुश्वारियाँ।

हुस्नवालों से दामन बचाना ए…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 3, 2018 at 8:30am — 9 Comments

ग़ज़ल ,(तेरे चहरे की जब भी अर्गवानी याद आएगी।)

ग़ज़ल ,(तेरे चहरे की जब भी अर्गवानी याद आएगी।)

1222 1222 1222 1222

तेरे चहरे की रंगत अर्गवानी याद आएगी,

हमें होली के रंगों की निशानी याद आएगी।

तुझे जब भी हमारी छेड़खानी याद आएगी

यकीनन यार होली की सुहानी याद आएगी।

मची है धूम होली की जरा खिड़की से झाँको तो,

इसे देखोगे तो अपनी जवानी याद आएगी।

जमीं रंगीं फ़ज़ा रंगीं तेरे आगे नहीं कुछ ये,

झलक इक बार दिखला दे पुरानी याद आएगी।

नहीं कम ब्लॉग में मस्ती…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 2, 2018 at 11:30am — 9 Comments

ग़ज़ल(रहे गर्दिश में जो हरदम)

जनाब साहिर लुधियानवी के मिसरे पर तरही ग़ज़ल।

1222 1222 1222 1222

रहे गर्दिश में जो हरदम, उन_अनजानों पे क्या गुजरी,

किसे मालूम ऐसे दफ़्न अरमानों पे क्या गुजरी।

कमर झुकती गयी वो बोझ को फिर भी रहें थामे,

न जाने आज की औलाद उन शानों पे क्या गुजरी।

अगर हो बात फ़ितरत की नहीं तुम जानवर से कम,

*जब_इंसानों के दिल बदले तो इंसानों पे क्या गुजरी।*

मुहब्बत की शमअ पर मर मिटे जल जल पतंगे जो,

खबर किसको कि उन नाकाम परवानों…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on February 6, 2018 at 4:04pm — 9 Comments

लम्बे रदीफ़ की ग़ज़ल (कज़ा मेरी अगर जो हो)

गुणीजनों के सुझाव के हेतु।

काफ़िया=आ

रदीफ़= *मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर*

1222×4



खता मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर,

सजा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।



वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना,

वफ़ा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।



नशा ये देश-भक्ति का, रखे चौड़ी सदा छाती,

अना मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।



रहे चोटी खुली मेरी, वतन में भूख है जब तक,

शिखा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 22, 2017 at 11:11am — 16 Comments

ग़ज़ल (दीपावली)

ग़ज़ल (दीपावली)
212×4

जगमगाते दियों से मही खिल उठी,
शह्र हो गाँव हो हर गली खिल उठी।

लायी खुशियाँ ये दीपावली झोली भर,
आज चेह्रों पे सब के हँसी खिल उठी।

आप देखो जिधर नव उमंगें उधर,
हर महल खिल उठा झोंपड़ी खिल उठी।

सुर्खियाँ सब के गालों पे ऐसी लगे,
कुमकुमे हँस दिये रोशनी खिल उठी।

ओ बी' ओ को बधाई 'नमन' पर्व की
मंच पर आज दीपावली खिल उठी।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 19, 2017 at 9:42am — 8 Comments

ग़ज़ल

1222 1222 122

तिजारत हुक्मरानी हो गई है।
कहीं गुम शादमानी हो गई है।।

न अब गांधी न शास्त्री से हैं रहबर।
शहादत उनकी फ़ानी हो गई है।।

तेरा तो हुश्न ही दुश्मन है नारी।
कठिन इज्जत बचानी हो गई है।।

लगी जब बोलने बिटिया हमारी।
वो घर में सबकी नानी हो गई है।।

हमीं से चार लेकर एक दे कर।
'नमन' सरकार दानी हो गई है।।


मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 2, 2017 at 4:00pm — 8 Comments

छोटी बहर की ग़ज़ल

बहर - 2112
काफ़िया - आम; रदीफ़ - चले

जाम चले
काम चले।

मौत लिये
आम चले।

खुद का कफ़न
थाम चले।

सांसें आठों
याम चले।

सुब्ह हो या
शाम चले।

लोग अवध
धाम चले।

मन में बसा
राम चले।

पैसा हो तो
नाम चले।

जग में 'नमन'
दाम चले


मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 24, 2017 at 3:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल (सबसे रहे ये ऊँची मन में हमारी हिन्दी)

भाषा बड़ी है प्यारी जग में अनोखी हिन्दी,

चन्दा के जैसे सोहे नभ में निराली हिन्दी।



पहचान हमको देती सबसे अलग ये जग में,

मीठी जगत में सबसे रस की पिटारी हिन्दी।



हर श्वास में ये बसती हर आह से ये निकले,

बन के लहू ये बहती रग में ये प्यारी हिन्दी।



इस देश में है भाषा मजहब अनेकों प्रचलित,

धुन एकता की डाले सब में सुहानी हिन्दी।



शोभा हमारी इससे करते 'नमन' हम इसको,

सबसे रहे ये ऊँची मन में हमारी हिन्दी।





आज हिन्दी दिवस…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 14, 2017 at 11:30am — 65 Comments

आज़ादी का गीत

"आज़ादी का गीत"

(2212 122 अंतरा 22×4 // 22×3)

(तर्ज़- दिल में तुझे बिठा के)



भारत तु जग से न्यारा, सब से तु है दुलारा,

मस्तक तुझे झुकाएँ, तेरे ही गीत गाएँ।।



सन सैंतालिस मास अगस्त था, तारिख पन्द्रह प्यारी,

आज़ादी जब हमें मिली थी, भोर अज़ब वो न्यारी।

चारों तरफ खुशी थी, छायी हुई हँसी थी,

ये पर्व हम मनाएँ, तेरे ही गीत गाएँ।।



आज़ादी के नभ का यारों, मंजर था सतरंगा,

उतर गया था जैक वो काला, लहराया था तिरंगा।

भारत की जय थी गूँजी, अनमोल… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on August 15, 2017 at 1:29pm — 5 Comments

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