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Babitagupta's Blog (36)

रूंद गया बचपन...

गुमनाम अंधेरे में देखो भारत का भविष्य पल रहा

दो जून रोटी की खातिर कोमल बचपन सुबक रहा

कलम चलाने वाले नन्हे हाथ झूठन साफ कर रहे

बस्ते उठाने वाले कंधे परिवार का बोझ उठा रहे

माँ के आंचल का फूल दरबदर की गाली खा रहा

भूखे पेट अपमान का घूंट पीकर जीवन गुजार रहा

हंसने-खेलने-पढ़ने की उम्र में मजदूर बन गये

बचपन की किलकारी खो गई मांझते-धोते

निरीह तरस्ती ऑखें उठ रही कुछ आस में...

इंसानियत के ठेकेदारों नियमों को मान लो

मंझवाने से अच्छा कल का भविष्य मांझ…

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Added by babitagupta on June 10, 2021 at 3:30pm — No Comments

मुखरता से हो रहा बदलाव (आलेख)

मुखरता से हो रहा बदलाव..... और बदल रही तस्वीर...!



विश्व की अन्य महिलाओं की तरह भारत की महिलाओं को आजादी से जीने और अधिकारों का उपयोग कर सर्वांगीण विकास करने के लिए संघर्ष नही करना पड़ा।समय के साथ सकारात्मक बदलाव भी हुये।पुरूषवर्चस्व क्षेत्रों में अपना उपस्थिति दर्ज कराके अपनी आजादी की नई ईबारत लिखती हौसले बुलंद महिलाओं ने देश-विदेश में अपनी सफलता, उपलब्धियों का परचम फहराया। अपने संघर्ष, मेहनत,जज्बा,जुनून से हर सीमाओं को लांघकर कामयाबी हासिल कर नई ऊंचाईयां छूकर प्रेरणा…

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Added by babitagupta on March 8, 2021 at 12:30pm — 3 Comments

मेरे पिता (लेख)

मेरे पिता

पिता शब्द स्वयं अपने आप में बजनदार होता हैं। हाथ की दसों उंगलियों की तरह हर पिता का व्यक्तित्व अलग होता हैं। पिता को परिभाषित किया जा सकता हैं, उपमानों से अलंकारित किया जा सकता हैं पर रेखांकित नही किया जा सकता।बस,उम्मीद की जा सकती हैं कि हमारे पिता बहुत अच्छे हैं, बस थोड़े-से ऐसे और होते। सभी बच्चों के पिता उनके हीरो होते हैं। ऐसे ही मेरे पिता मेरे किसी सुपरमेन से कम नहीं हैं, हरफनमौला हैं। बचपन से मैंने उनका सख्त चेहरा,कठोर अनुशासनबद्ध,जुझारूपन देखा हैं। मितभाषी हम सब के…

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Added by babitagupta on June 21, 2020 at 3:03pm — 1 Comment

फूल

फूल-सी सुकोमल,सुकुमारी

कौन-सा फूल तेरी बगिया की

न्यारी-प्यारी माँ-बाबा की दुलारी

मुस्कराती ,बाबा फूले ना समाते

फूल-से झङते माँ होले-से कहती

पर दादी झिङकती-फूल कोई-सा होवे

पर सिर पर ना ,चरणों में चढाये जावे

उस समय कोमल मन को समझ ना आई

जब किसी के घर गुलदान की शोभा बनी

तब बात समझ आई

नकारा,छटपटाई,महकना चाहती थी

टूटकर अस्तित्वहीन नहीं होना था

पर असफल रही,दल-दल छितर-बितर गया

सोचती,मैं फूल तो हूँ

चंपा,चमेली,चांदनी,पारिजात नहीं

गुलाब…

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Added by babitagupta on April 21, 2020 at 4:32pm — No Comments

जीवन का कर्फ्यू

जीवन का कर्फ्यू

रोजमर्रा की तरह टहलते हुये रामलाल उद्यान में गोपाल से मिला तो उसके चेहरे की झाईयां से झलकती खुशी कुछ और ही बयां कर रही थी।इससे पहले मैं कुछ पूछता कि उसने कहा, 'यार,कल जैसा दिन गुजारे जमाना हो गया।'

'पर यार कल तो कर्फ्यू लगा था।न किसी से मिलना-जुलना हुआ।कितना बोरियत भरा दिन था?'

'तेरे लिए था।पर इसने मेरी जिन्दगी के कर्फ्यू को हटा दिया।'

'कुछ समझा नही?'प्रश्न भरी निगाह से रामलाल ने गोपाल की तरफ देखकर कहा।

गोपाल ने पास पङी बेंच पर उससे बैठने का इशारा…

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Added by babitagupta on March 22, 2020 at 11:33pm — 2 Comments

परिचय [लघु कथा ]

परिचय

मेला प्रांगण में आयोजित बारहवाँ साहित्य सम्मेलन में देशभर के साहित्यकारों का जमावड़ा लगा हुआ था,जिसमें माननीय राज्यपाल के करकमलों से पुस्तक का विमोचन किया जाना था.

आगंतुकों में शहर के प्रतिष्ठित,मनोहर बाबू भी विशिष्ठजन की पंक्ति मंं विराजमान थे.शीघ्र ही मंच पर राज्यपाल की उपस्थित से सन्नाटा खिंच गया.औपचारिकताओं के पश्चात,जिस लेखक की किताब ‘मेरा परिचय’का अनुमोदन किया जाना था,उसे संबोधित कर मंच पर आने का आग्रह किया गया.तो सभी की उत्सुकता में एकटक निगाहें मंचासीन होने वाले के…

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Added by babitagupta on March 4, 2019 at 10:45pm — 7 Comments

तपस्या [लघु कथा ]

तपस्या     

राशि  को एकटक सास-श्वसुर की फोटो देख,रोमिल के झकझोरने पर,सपने से जागी,कहने लगी,‘मेरी तपस्या पूरी हुई.’

'मुझे पाकर,अब कौन-सी तपस्या?'प्रश्नभरी निगाहों से,देखकर बोला.

झेप गई,,फिर संभलते हुए बोली,'हां,लेकिन मम्मी-पापा की बहू,दिल से अपनाने की तपस्या.' 

सुनकर,खुशी में,हाथ पकड़कर बोला,'पर,तुम्हें.... कैसे..........?'

चेहरे पर बनते-बिगड़ते भावों से,लगा,जैसे उसे स्वर्ग मिल गया,‘आज तड़के सुबह,फोन पर मम्मी ने पहली बार बात…

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Added by babitagupta on March 3, 2019 at 4:51pm — 8 Comments

प्यार का दंश या फर्ज

प्यार का दंश या फर्ज

तुलसीताई के स्वर्गवासी होने की खबर लगते ही,अड़ोसी-पड़ोसी,नाते-रिश्तेदारों का जमघट लग गया,सभी के शोकसंतप्त चेहरे म्रत्युशैय्या पर सोलह श्रंगार किए लाल साड़ी मे लिपटी,चेहरे ढका हुआ था,पास जाकर अंतिम विदाई दे रहे थे.तभी अर्थी को कंधा देने तुलसीताई के पति,गोपीचन्दसेठ का बढ़ा हाथ,उनके बेटों द्वारा रोकने पर सभी हतप्रद रह गए.पंडितजी के आग्रह करने पर भी,अपनी माँ की अंतिम इच्छा का मान रखते हुये, ना तो कंधा लगाने दिया,ना ही दाहसंस्कार में लकड़ी.यहाँ तक कि उनके चेहरे के अंतिम…

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Added by babitagupta on February 26, 2019 at 4:24pm — 3 Comments

अनूठा इजहार [लघु कथा ]

अनूठा इजहार

नितिशा के बाबूजी के अंतिम श्रद्धांजलि दे रहे थे,तभी अंदर से शांत मुद्रा में नितिशा की दादी,सरल चिरनिद्रा में लीन बाबूजी के पार्थवशरीर के समक्ष बैठी,हाथ मे पकड़े नए सफेद रूमाल से मुंह पौछा,फिर कान के पास जाकर जो कहा,सभी उन्हें विस्मयद्रष्टि से देखने लगे,वो सिर पर हाथ फेरते हुये कह रही थी- ‘तुम आराम से रहना,मेरी चिंता मत करना. रामायण की चौपाई सुनाई,फिर बाबूजी का मनपसंद गीत गया,और सूखीआँखें चली गई.पूरे तेरह दिन सरला अपने ही कमरे मे ही रही. गरूढ़पुराण में शामिल होने को कहते तो…

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Added by babitagupta on February 22, 2019 at 3:33pm — 2 Comments

उम्मीद की रोशनी (अतुकांत कविता)

चुनावी महाकुंभ के नगाडे की टंकार में

चौतरफा राजनीति का हुआ महौल गरमागरम

ईद के चांद हुए नेता जो ,

चिराग लेकर ढूंढने पर थे नदारद

योजनाओं की बरसात होने लगी

धूल उडती गड्ढे वाली सडकों पर

चुनावी सीमेंट चढ गया

उजाड बंजर खेती पर

हरियाल करने का मरहम लगाते

कंबल, साडी, दारू, मुर्गा का

बंदरबांट का फार्मूला चलाते

नित नए तरीकों से वोटरों को रिझाते

चरणवंदन कर, घडियाली ऑंसू बहाते

खोखले वायदों की दहाड,

ना खायेंगे, ना खाने देगे

दिए प्रलोभन, दिखाई…

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Added by babitagupta on November 22, 2018 at 3:19pm — 5 Comments

बदहाल जनता (तुकांत अतुकांत कविता)

प्रजातांत्रिक देश स्वतंत्र व्यक्ति

अभिव्यक्ति की आजादी

विकास यात्रा सत्तर साल की

सरकारी नक्शे पर दर्ज इलाका

हालात जस के तस

टूटे घने जंगलों में बसा वीराना सा गांव

टूटी फूटी नदी, दम तोडती पुलिया

जर्जर धूल उडाती सडकें

विकराल संकटों से जूझ रहा

जीवन से लडता

रोजीरोटी की जद्दोजहद

मैले कुचैले अर्धवदन ढके

बदहाली मे आपस में दुख बांटते

अपने गांव की पीडा समझाते

चेहरे पर पीडा झलक आती

नेताओं के झूठे वादे घडियाली ऑसू

बिना लहर के हिलोरें…

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Added by babitagupta on November 19, 2018 at 7:52pm — 7 Comments

दोस्ती [तुकांत - अतुकांत कविता]

बचपन की यादों का अटूट बंधन 

बिना लेनदेन के चलने वाला 

खूबसूरत रिश्तों का अद्वितीय बंधन 

एक ढर्रे पर चलने वाली जिंदगी में 

नई-नई सोच से रूबरू करवाया 

अर्थहीन जीवन को अर्थ पूर्ण बनाया 

जीने का एक…

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Added by babitagupta on August 27, 2018 at 8:00pm — 4 Comments

रिश्तों की डोर [लघुकथा]

दरवाजे की घंटी सुन,  दरवाजा मेड शीला ने  खोला तो अपरिचित समझ मुझे आवाज लगाने पर मैं देखने गई तो सामने सलिल भैया और शालिनी भाभी को  देख हतप्रद रह गई.मुझे इस तरह देख,भैया कहने लगे- 'भूल गई क्या ?मैं तुम्हारा भाई .......

मैं अपने को संभालते हुए ,उन्हें  इशारे से अंदर आने को कह,कहने लगी- 'अरे नहीं भैया,आपको अचानक इतने सालो बाद देखा ....बस और कुछ नहीं।'

भाभी मेरी मनोस्थिति  समझ भैया को डाटने वाले लहजे में कहा - 'अब ,उसे झिलाना छोडो'।और मुझे रसोई में ले जाकर खाना बनाने में हाथ बटाँने…

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Added by babitagupta on August 26, 2018 at 9:42pm — 8 Comments

उम्मीदों की मशाल [लघु कथा ]

रामू की माँ तो अपने पति के शव पर पछाड़ खाकर गिरी जा रही थी.रामू कभी अपने छोटे भाई बहिन को संभाल रहा था ,तो कभी अपनी माँ को.अचानक पिता के चले जाने से उसके कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ आ पड़ा था.

पढ़ाई छोड़,घर में चूल्हा जलाने के वास्ते रामू काम की तलाश में सड़को की छान मारता।अंततःउसने घर-घर जाकर रद्दी बेचने का काम पकड़ लिया।रद्दी में मिलती किताबों को देख उसके अंदर का किताबी कीड़ा जाग उठा.किताबे बचाकर,बाकी रद्दी बेच देता।और रात में लालटेन में अपने पढ़ने की भूख को  तृप्त करता।

समय बीतता…

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Added by babitagupta on August 1, 2018 at 7:00pm — 4 Comments

मैं और मेरे गुरु [कविता]

क्षण-प्रतिक्षण,जिंदगी सीखने का नाम  

सबक जरूरी नहीं,गुरु ही सिखाए

जिससे शिक्षा मिले वही गुरु कहलाये 

जीवंत पर्यन्त गुरुओं से रहता सरोकार 

हमेशा करना चाहिए जिनका आदर-सत्कार 

प्रथम पाठशाला की गुरु माँ बनी …

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Added by babitagupta on July 27, 2018 at 1:00pm — 2 Comments

एक ज़िद (कविता)

बहुत देख ली आडंबरी दुनिया के झरोखों से 

बहुत उकेर लिए मुझे कहानी क़िस्सागो में 

लद गए वो दिन, कैद थी परम्पराओं के पिंजरे में 

भटकती थी अपने आपको तलाशने में  

उलझती थी,  अपने सवालों के जबाव ढूँढने में 

तमन्ना थी बंद मुट्ठी के सपनों को पूरा करने की 

उतावली,आतुर हकीकत की दुनिया जीने की 

दासता की जंजीरों को तोड़

,लालायित हूँ मुक्त आकाश में उड़ने को 

 लेकिन अब उठ गए इन्क्लाबी कदम 

बेखौफ हूँ,कोइ…

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Added by babitagupta on July 26, 2018 at 6:00pm — 4 Comments

गोपालदास नीरज जी - श्रद्धांजलि [जीवनी]

काव्य मंचों के अपरिहार्य ,नैसर्गिक प्रतिभा के धनी,प्रख्यात गीतकार ,पद्मभूषण से सम्मानित,जीवन दर्शन के रचनाकार,साहित्य की लम्बी यात्रा के पथिक रहे,नीरज जी का जन्म उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के पुरावली गांव में श्री ब्रज किशोर सक्सेना जी के घर  ४ जनवरी,१९२५ को हुआ था.गरीब परिवार में जन्मे नीरज जी की जिंदगी का संघर्ष उनके गीतों में झलकता हैं.युग के महान कवि नीरज जी को राष्ट्र कवि दिनकर जी 'हिंदी की वीणा' कहते थे. मुनब्बर राना जी कहते हैं-हिंदी और उर्दू के बीच एक पल की तरह काम करने वाले नीरज जी…

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Added by babitagupta on July 22, 2018 at 9:20pm — 7 Comments

अनावरण या आडंबर [लघु कथा]

तड़के सुबह से ही रिश्तेदारों का आगमन हो रहा था.आज निशा की माँ कमला की पुण्यतिथि थी. फैक्ट्री के मुख्यद्वार से लेकर अंदर तक सजावट की गई थी.कुछ समय पश्चात मूर्ति का कमला के पति,महेश के हाथो अनावरण किया गया.

कमला की मूर्ति को सोने के जेवरों से सजाया गया था.एकत्र हुए रिश्तेदार समाज के लोग मूर्ति देख विस्मय से तारीफ़ महेश से किये जा रहे थे. …

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Added by babitagupta on July 10, 2018 at 8:00pm — 7 Comments

सदा बिखरी रहे ये हंसी..

हँसमुखी चेहरे पर ये कोलगेट की मुस्कान,

बिखरी रहे ये हँसी,दमकता रहे हमेशा चेहरा,

दामन तेरा खुशियों से भरा रहे,

सपनों की दुनियां आबाद बनी रहे,

हँसती हुई आँखें कभी नम न पड़े,

कालजयी जमाना कभी आँख मिचौली न खेले,…

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Added by babitagupta on July 8, 2018 at 5:00pm — 9 Comments

वरखा बहार आई........[तुकांत-अतुकांत कविता]

घुमड़-घुमड़ बदरा छाये,

चम-चम चमकी बिजुरियां,छाई घनघोर काली घटाएं,

घरड-घरड मेघा बरसे,

लगी सावन की झड़ी,करती स्वागत सरसराती हवाएं........

लो,सुनो भई,बरखा बहार आई......

तपती धरती हुई लबालव,

माटी की सौंधी खुश्बू,प्रफुल्लित बसुन्धरा से संदेश कहती,

संगीत छेड़ती बूंदों की टप-टप ,

लहराते तरू,चहचहाते विहग,कोयल मधुर गान छेड़ती.......

लो सुनो भई,वरखा बहार आई.......

छटा बिखर गई,मयूर थिरक उठा-सा,

सुनने मिली झींगरों की झुनझुनी,पपीहे…

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Added by babitagupta on June 28, 2018 at 8:30pm — 9 Comments

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