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ग़ज़ल (निगलते भी नहीं बनता उगलते भी नहीं बनता)

1222-1222-1222-1222

निगलते  भी  नहीं  बनता  उगलते  भी  नहीं  बनता 

हुई  उनसे  ख़ता  ऐसी   सँभलते  भी   नहीं  बनता 

इजारा  बज़्म  पे ऐसा  हुआ  कुछ   बदज़बानों  का

यहाँ रुकना भी ज़हमत है कि चलते भी नहीं बनता 

जुगलबंदी हुई जब से ये शैख़-ओ-बरहमन की हिट

ज़बाँ  से शे'र  क्या  मिसरा निकलते भी नहीं बनता 

रक़ीबों को  ख़ुशी  ऐसी मिली हमको  तबाह करके

कि  चाहें  ऊँचा उड़ना  पर  उछलते भी नहीं बनता 

ख़ुद अस्मत नोच  के  ख़ुद ही जताते  झूटी  हमदर्दी 

जहाँ  में  ऐसे  लोगों  से तो  मिलते भी  नहीं  बनता 

रफ़ू करना भी मुश्किल है लगा जो ज़ख्म इस दिल पर

गरेबाँ  चाक   ऐसा  है  कि  सिलते  भी  नहीं  बनता 

ज़मीं  के  तिफ़्ल  होकर  वो  करें  दावा  ख़ुदाई  का

बिना रब की  रज़ा  के जिनसे हिलते भी नहीं बनता 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

 

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on November 9, 2020 at 7:08pm

आ. अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन 

अच्छी ग़ज़ल हुई है,  बधाई स्वीकारें 

  

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 3, 2020 at 8:26pm

वाह बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है अमीरुद्दीन जी...बधाई

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 29, 2020 at 11:11am

आदरणीय चेतन प्रकाश जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई के लिए मशकूर हूँ, क्रिया विशेषण पर आपकी राय अनुकरणीय ह, तामील बजा लाता हूँ और आपको एक बार फिर से धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। सादर। 

Comment by Chetan Prakash on October 28, 2020 at 10:04pm

अच्छी ग़ज़ल हुई, 'अमीर' साहब, बधाई ! हाँ, मतला, आपका अतिरिक्त ध्यान माँगता लगता है, शायद, रब्त का अभाव है। आप खुद दोहराएंगे तो स्पष्ट हो जाएगा। कहना न होगा, मतला ग़ज़ल का सबसे प्रमुख कथ्य होता है। अतः स्वयंमेव स्पष्ट होना चाहिए। कदाचित अगर आप मतले के सानी मिसरे में क्रिया विशेषण कैसी के बजाय ऐसी रख लें तो भाव स्वतः स्पष्ट हो जाएगी, इति।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 28, 2020 at 8:45pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद, सुख़न नवाज़ी, हौसला अफ़ज़ाई और तनक़ीद के लिए बेहद मशकूर हूँ। मुहतरमा दूसरे शे'र में ख़फ़ीफ़ तक़ाबुल-ए-रदीफ़ (ऐसा तक़ाबुल-ए-रदीफ़ जिसे कहने या पढ़ने से रदीफ़ होने का भ्रम न हो) नज़र-अन्दाज़ करने के क़ाबिल है। ग़ज़ल के मतले में क़ाफ़िया "लते" सेट किया गया है जिसका निर्वहन पूरी ग़ज़ल में किया गया है अख़ीर के तीनों अशआर में भी। उम्मीद है बात पहुँची होगी। सादर। 

Comment by Rachna Bhatia on October 28, 2020 at 3:14pm
  1. आदरणीय अमीरुद्दीन'अमीर'जी आदाब। बेहतरीन ग़ज़ल हुई।बधाई। आदरणीय दूसरे शे'र में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ है । आख़िरी तीनों अश्आर में शायद क़ाफ़िया बदल गया है। सादर।
Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 27, 2020 at 10:30am

आदरणीय लक्षमण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया। सादर। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 27, 2020 at 7:49am

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

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