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नग़्मा (घटा ग़मों की वही....)

1212 - 1122 - 1212 - 22

घटा ग़मों की वही दिल पे छा गई फिर से 

वो दास्तान ज़ुबाँ पर जो आ गई फिर से 

ये उम्र कैसे कटेगी कहाँ बसर होगी 

अँधेरी रात की जाने न कब सहर होगी 

शिकस्त सारी उमीदें मिटा गई फिर से 

घटा ग़मों की वही दिल पे छा गई फिर से 

मुझे गुमाँ भी नहीं था हबीब बदलेगा 

बदल गया है मगर, यूँ नसीब बदलेगा? 

बहार बनके ख़िज़ाँ ही जला गई फिर से 

घटा ग़मों की वही दिल पे छा गई फिर से 

ज़माने में है कहाँ और वक़्त सा मरहम

नहीं है दूसरा कोई भी ऐसा ही बरहम 

घड़ी वो कैसी थी आई रुला गई फिर से 

घटा ग़मों की वही दिल पे छा गई फिर से 

वो दास्तान ज़ुबाँ पर जो आ गई फिर से 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on March 2, 2021 at 1:08pm

आदरणीया वीणा गुप्ता जी आदाब, नग़्मा पर आपकी आमद बाइस-ए-शरफ़ है, मशकूर ओ ममनून हूँ। सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया। सादर। 

Comment by Veena Gupta on March 2, 2021 at 4:09am

 ख़ूबसूरत नग़मा,मुबारकबाद क़ुबूल करें

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on February 23, 2021 at 11:46pm

जनाब कृष मिश्रा 'जान' साहिब आदाब, नग़्मा पर आपकी दाद, मुबारकबाद और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया। सादर। 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 23, 2021 at 4:24pm

बहोत खूबसूरत नग़मा हुआ है आदरणीय अमीरुद्दीन सर जी ढेरों मुबारकबाद।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on February 22, 2021 at 9:32pm

जनाब आज़ी तमाम साहिब आदाब, रचना पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया। सादर। 

Comment by Aazi Tamaam on February 22, 2021 at 9:45am

सादर प्रणाम आदरणीय अमीर जी

अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें

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