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1212, 1122, 1212, 22


1)तेरे जमाल के मारों से गुफ़्तगू की है
तमाम रात सितारों से गुफ़्तगू की है

2)है तेरे हुस्न से ख़तरे में हर चमन का वजूद
गुलों ने डर के बहारों से गुफ़्तगू की है

3)उदास टूटे मेरे दिल ने आज सारी रात
मेरे मकाँ की दरारों से गुफ़्तगू की है

4) मुदावा हो गया मेरे सभी ग़मों का आज
ज़माने बाद जो यारों से गुफ़्तगू की है

5)मिला नहीं है हमें अब तलक कोई तुमसा
जहाँ में हमने हज़ारों से गुफ़्तगू की है

6)ज़रा जो आँख दिखाई है शम्स ने देखो
नदी ने कैसे किनारों से गुफ़्तगू की है

7)दिखा रहे हैं ये जुगनू ग़ुरूर आज उसे
वो जिसने चाँद सितारों से गुफ़्तगू की है

8)"अनीस" दर्द ही मिलता है गुल की क़ुर्बत से
खुला ये राज़ जो ख़ारों से गुफ़्तगू की है

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Md. Anis arman on July 26, 2021 at 1:48pm
  1. जनाब समर कबीर साहब ग़ज़ल तक आने और पसंद कर हौसला बढ़ाने का बहुत बहुत शुक्रिया 
Comment by Samar kabeer on July 17, 2021 at 3:44pm

जनाब अनीस अरमान जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Md. Anis arman on July 13, 2021 at 1:22pm

जनाब  अमीरुद्दीन आमिर साहब ग़ज़ल तक आने और पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on July 12, 2021 at 9:35am

जनाब अनीस अरमान साहिब आदाब, क्या ख़ूब ग़ज़ल कही है मज़ा आ गया, वाह. हर एक शे'र लाजवाब है। शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।  सादर।

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