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ग़ज़ल: किसी कँवल का हंसीं ख़ाब देखने के लिये

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किसी कँवल का हंसीं ख़ाब देखने के लिये

किसी के हुस्न का सैलाब देखने के लिये

कहाँ थे देखो सनम हम कहाँ चले आये

वो गुलबदन वो आब ओ ताब देखने के लिये

न जाने कब से हक़ीक़त की थी तलब हमको

न जाने कब से थे बेताब देखने के लिये

छुआ तो जाना हर इक ख़ाब था धुंआ यारो

बचा न कुछ भी याँ नायाब देखने के लिये

करीब जा के हर एक चीज खोयी है हमने

लुटे हैं खुद को ही ईजाब देखने के लिये

कटी है ज़िंदगी अपनी भी यूँ उसूलों पर

फ़ज़ा में रह गया तल्ख़ाब देखने के लिये

हाँ एक बार किया था भरम निग़ाहों ने

दिली पसंद का आदाब देखने के लिये

भटक रहे हैं अभी तक उन्हीं नज़ारों में

न मिल सका हमें गुल ख़्वाब देखने के लिये

उजाड़ कर मेरे ख़्वाबों की छोटी सी दुनिया

मुझे वो दे गया इक ख़्वाब देखने के लिये

यूँ दे के ज़ख़्म गया कोई ज़िंदगी भर को

किसी की आँख को ख़ूँ-नाब देखने के लिये

न जाने ख़ाक-बसर हुईं कितनी ज़िंदग़ियाँ

सुकून ओ चैन का पायाब देखने के लिये

तमाम ज़िंदगी हमने गुजार दी आज़ी

तरस गये हैं ज़फ़रयाब देखने के लिये

आज़ी तमाम

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Aazi Tamaam on October 18, 2021 at 1:20pm

जी आदरणीय ब्रज जी बस कोशिश जारी है

आपका आभार ग़ज़ल तक आने के लिये

ऐसा लगता है की शायद दोषरहित ग़ज़ल लिखना असंभव है

अभी तक तो बाकी तो सब गुणीजनों की इस्लाह से इतना हुआ है कोशिश रहेगी आगे भी सुधार हो

समर गुरु जी जैसे निस्वार्थ इस्लाहकारों को ख़ुदा लंबी उम्र बख़्शे

सादर

Comment by Aazi Tamaam on October 18, 2021 at 1:14pm

जी आदरणीय अमीर जी सहृदय शुक्रिया ग़ज़ल तक आने के लिये

आपका दिल से आभार

Comment by Aazi Tamaam on October 18, 2021 at 1:13pm

 सहृदय शुक्रिया आ नूर जी

आपकी ग़ज़ल मुझे बहुत पसंद आती है

ग़ज़ल तक आने के लिये शुक्रिया

मैं इस ग़ज़ल को जल्द ही दुरुस्त कर दूंगा कोशिश जारी है

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 17, 2021 at 4:44pm

भाई आजी तमाम जी जिस तरह से आप मेहनत कर रहे हैं...निश्चय ही एक दिन दोषरहित ग़ज़ल कहेंगे...ऐसी मेरी शुभकामनाएं हैं।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 14, 2021 at 4:55pm

जनाब आज़ी तमाम साहिब आदाब, ग़ज़ल की अच्छी कोशिश हुई है बधाई स्वीकार करें। मुहतरम समर कबीर साहिब ने मुकम्मल इस्लाह कर दी है।  सादर। 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 14, 2021 at 8:59am

आ. आज़ी साहब
मतला क्या कहना चाहता है यह स्पष्ट नहीं है..बाकी सब समर सर कह ही चुके हैं..
प्रयास के लिए बधाई 
सादर 

Comment by Aazi Tamaam on October 11, 2021 at 3:49pm

 सादर प्रणाम गुरु जी

सहृदय शुक्रिया ग़ज़ल पर बारीकी से गौर फरमाने के लिये

दिल से आभार

मैं कोशिश करूँगा दुरुस्त करने की

Comment by Samar kabeer on October 11, 2021 at 3:10pm

जनाब आज़ी तमाम जी आदाब, ओबीओ के तरही मिसरे पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है , बधाई स्वीकार करें  I 

`किसी कँवल का हंसीं ख़ाब देखने के लिये

किसी के हुस्न का सैलाब देखने के लिये`

मतला नहीं हुआ , दोनों मिसरे अलग अलग हैं इनमें रब्त पैदा नहीं हो सका , ग़ौर करें I 

`वो गुलबदन वो आब ओ ताब देखने के लिये`

ये मिसरा बह्र में नहीं है , देखियेगा I 

`छुआ तो जाना हर इक ख़ाब था धुंआ यारो`

इस मिसरे में `ख़ाब` को "ख़्वाब" और `धुंआ` को  "धुआँ " कर लें I 

`करीब जा के हर एक चीज खोयी है हमने

लुटे हैं खुद को ही ईजाब देखने के लिये`

इस शे`र के ऊला मिसरे में `करीब` को "क़रीब" और `एक` को "इक" कर लें , और सानी मिसरे में "ईजाब" शब्द का अर्थ होता है मंज़ूर , क़ुबूल , जो यहाँ काम नहीं दे रहा है , देखियेगा  I

`हाँ एक बार किया था भरम निग़ाहों ने

दिली पसंद का आदाब देखने के लिये`

इस शे`र का भाव मेरी समझ में नहीं आया I 

गिरह का मिसरा अच्छा है I 

`न जाने ख़ाक-बसर हुईं कितनी ज़िंदग़ियाँ

सुकून ओ चैन का पायाब देखने के लिये`

इस शे`र का ऊला मिसरा बह्र में नहीं है, और सानी में इज़ाफ़त का इस्तेमाल मुनासिब नहीं है क्योंकि `चैन` शब्द हिन्दी भाषा का है और `सुकून`शब्द अरबी भाषा का I 

`तरस गये हैं ज़फ़रयाब देखने के लिये`

इस मिसरे को यूँ कहना उचित होगा :-

`यहाँ तो ख़ुद को ज़फ़रयाब देखने के लिये `

बाक़ी शुभ शुभ  I 

 

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