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ग़ज़ल: वक़्त की शतरंज पर किस्मत का एक मोहरा हूँ मैं।

2122 2122 2122 212
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वक़्त की शतरंज पर किस्मत का एक मोहरा हूँ मैं। 
ज़िंदगी इतना भी ख़ुश मत हो, अभी ज़िंदा हूँ मैं। 
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मैं ख़ुदा की हाज़िरी में भी न बदलूँगा बयान, 
तुझको हाज़िर और नाज़िर जानकार कहता हूँ मैं। 
.
एक ही घर में बसर करना मुहब्बत तो नहीं, 
आज भी तेरी ख़ुशी और ग़म से वाबस्ता हूँ मैं। 
.
मेरी हर एक बात के मतलब हैं सौ, मक़सद हज़ार,
झूठ भी सच की मीनारों से कहा करता हूँ मैं। 
.
ऐ मेरे मालिक! ये तेरा अक्स मैला हो गया, 
अब भी लगता है तुझे तेरा नुमाइंदा हूँ मैं? 
.
ये मुहब्बत है तुम्हारी और तो कुछ भी नहीं, 
शायरों की भीड़ में अब तक पसंदीदा हूँ मैं। 
.
उपनिषद, क़ुर्आन दोनों ठीक लगते हैं मुझे, 
और उन्हें लगता है उनकी कौम को ख़तरा हूँ मैं। 
.
जिसमें बह जाते हैं इकदिन मीर भी, मंसूर भी, 
बस उसी बहते हुए दरिया का एक क़तरा हूँ मैं। 
.
तुमने जिसको तोड़कर बाज़ार जैसा कर दिया, 
ये समझ लीजे, उसी मंदिर का कुछ मलबा हूँ मैं। 
.
ये मेरा लहजा, मेरा लहजा नहीं है दोस्तो, 
मेरा मुझमें कुछ नहीं है, सिर्फ़ आईना हूँ मैं। 
.
मुश्क़िलों की आँच ने आसान काफी कर दिया,
आज भी लेकिन मुझे लगता है पेचीदा हूँ मैं। 
.
कुछ अधूरी हसरतों का हैरत अंगेज़ अक्स हूँ, 
और कुछ टूटे हुए ख़्वाबों का आमेज़ा हूँ मैं। 
.
मौलिक/अप्रकाशित, 
बलराम धाकड़ । 

Views: 126

Comment

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Comment by Balram Dhakar on October 20, 2019 at 12:40am

आदरणीय दंडपाणि जी, 

आपको ग़ज़ल पसंद आई, मेरा लिखना सार्थक हुआ। 

बहुत बहुत शुक्रिया। 

सादर। 

Comment by Balram Dhakar on October 20, 2019 at 12:21am

आदरणीय प्रशांत भाई, 

बहुत बहुत धन्यवाद। 

सादर। 

Comment by dandpani nahak on October 18, 2019 at 10:53am
आदरणीय बलराम जी बेहतरीन ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें! ये " मेरा लहज़ा मेरा लहज़ा नहीं है दोस्तों, मेरा मुझमें कुछ नहीं है , सिर्फ आईना हूँ मैं" वाह! बहुत खूब! बहुत अच्छा बहुत बधाई
Comment by प्रशांत दीक्षित 'सागर' on October 18, 2019 at 7:44am

Bahut sundar sir

Comment by Balram Dhakar on October 17, 2019 at 10:21pm

आदरणीय समर सर, सादर अभिवादन। 

ग़ज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा थी।  

टंकण त्रुटियाँ सुधार कर ली जाएंगीं। 

जिस शेर के उला और सानी में रब्त नहीं है उसपर और कोशिश करता हूँ। 

आपकी हौसला अफ़ज़ाई ग़ज़ल का उचित पारितोषिक है। और बेहतर की दिशा में अग्रसर करती है। 

सादर। 

Comment by Samar kabeer on October 17, 2019 at 12:10pm

जनाब बलराम धाकड़ जी आदाब,बहुत उम्द: ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

'वक़्त की शतरंज पर किस्मत का एक मोहरा हूँ मैं'

इस मिसरे में 'एक' को "इक" और 'मोहरा' को "मुहरा" कर लें ।

'मेरी हर एक बात के मतलब हैं सौ, मक़सद हज़ार'

इस मिसरे में 'एक' को "इक'' कर लें ।

'झूठ भी सच की मीनारों से कहा करता हूँ मैं'

इस मिसरे में 'मीनारों' को "मिनारों" कर लें । 

'ऐ मेरे मालिक! ये तेरा अक्स मैला हो गया, 
अब भी लगता है तुझे तेरा नुमाइंदा हूँ मैं'
इस शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,देखियेगा ।
'शायरों की भीड़ में अब तक पसंदीदा हूँ मैं'
इस मिसरे में 'शायरों' कोई शब्द नहीं है,इसे "शाइरों" लिखा करें ।
'बस उसी बहते हुए दरिया का एक क़तरा हूँ मैं'
इस मिसरे में 'एक' को "इक" कर लें ।
Comment by Balram Dhakar on October 17, 2019 at 12:07pm

हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय लक्ष्मण जी। 

सादर। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 17, 2019 at 9:53am

आ. भाई बलराम जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

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