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इश्क़ से ना हो राब्ता कोई
ज़िन्दगी है की हादसा कोई

वो पुराने ज़माने की बात है
अब नहीं करता है वफ़ा कोई

ज़िन्दगी के जद्दोजहद अपने
मौत का है न फ़लसफ़ा कोई

यहाँ सब बे अदब हैं मेरी जां
अब करे क्या मुलाहिज़ा कोई

दिल का है टूटने का ग़म 'नाहक'
था सलामत मुआहिदा कोई

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on September 30, 2020 at 2:10pm

जनाब रूपम कुमार जी आदाब, मैंने दण्डपाणि नाहक़ जी की ग़ज़ल पर टिप्पणी मात्र की है और अपने सुझाव पेश किए हैं, कोई किसी का एक मिसरा भी दुरुुस्त नहीं कर सकता जबतक कि स्वयं रचयिता किसी सुझाव को स्वीकार कर गृहण न कर ले। किसी की रचनाओं पर की गई टिप्पणी और सुझावों पर प्रतिक्रिया देने का पहला अधिकार उस रचयिता का ही होता है, इसलिए थोड़ा धैर्य रखिए, धीरे-धीरे सब सीख जाएंगे, अभी तो पहले सण्डे वाला टास्क पूरा कीजिए। सादर। 

Comment by Rupam kumar -'मीत' on September 30, 2020 at 7:40am

आदरणीय, अमीरुद्दीन साहिब, प्रणाम ।

आपने शे'र काफी दुरुस्त कर दिए,
हमने भी यह ग़ज़ल पढ़ी लेकिन इतनी नज़र अच्छी नहीं कि इस मेयार तक देख पाते,

आपके एक सवाल है,

"शे'र का शिल्प कमज़ोर है" इस का मतलब क्या हुआ और शिल्प को दुरुस्त कैसे किया जाता है,

मुझे पता नहीं इस मंच पर सवाल जवाब कहाँ किया जाता है, यह कमेंट पढ़ा तो हमने यहीं पूछ लिया ग़लती हुई हो तो मुआ'फ़ी चाहूंगा,

हमने आपको एक मैसेज भी किया था, लेकिन पता नहीं आपको वो मिला नहीं कि आपने वो देखा नहीं अभी तक, हम मुंतज़िर थे आपके जवाब का, सादर।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on September 29, 2020 at 10:46pm

आदरणीय दण्डपाणि नाहक़ जी आदाब ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बहुत ख़ूबसूरत इन्सानी जज़्बात आपने अपनी ग़ज़ल में पिरोए हैं बधाई स्वीकार करें, कुछ सुझाव पेश करने की जसारत कर रहा हूंँ :

इश्क़ से ना हो राब्ता कोई          इश्क़ से है न राब्ता कोई 

ज़िन्दगी है की हादसा कोई        ज़िन्दगी है कि हादिसा कोई   

वो पुराने ज़माने की बात है        बात वो है गये ज़माने की 

(ये मिसरा बह्र में नहीं है)          अब नहीं करता है वफ़ा कोई

ज़िन्दगी के जद्दोजहद अपने      मरहले ज़िन्दगी में रहते हैं 

(ये मिसरा बह्र में नहीं है)          मौत का है न फ़लसफ़ा कोई 

यहाँ सब बे अदब हैं मेरी जां      बेअदब हैं सभी तो याँ 'नाहक़' 

(ये मिसरा बह्र में नहीं है)          अब करे क्या मुलाहिज़ा कोई

दिल का है टूटने काग़म 'नाहक' दिल जो टूटा तो ग़म नहीं मुझको 

था सलामत मुआहिदा कोई       टूटा थोड़ी महायदा कोई

(इस शे'र का शिल्प कमज़ोर है)  सादर। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 29, 2020 at 7:33pm

आ. भाई दण्डपाणि जी, सादर अभिवादन । गजल का प्रयास अच्छा हुआ है । हार्दिक बधाई ।

मेरे हिसाब से इसे इस प्रकार बाँधते तो और बेहतर हो सकता था

२१२१/१२१२/१२
इश्क़ से नहीं राब्ता कोई
ज़िन्दगी है कि हादसा कोई
वो पुराने ज़माने की बात है

शेष गुणीजनों के विचारों का इतजार करें । सादर..

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 29, 2020 at 9:43am

आ दण्डपाणी जी,

ग़ज़ल के प्रयास हेतु बधाई। कुछ जगह बह्र टूट रही है।

एक टिप है कि सिर्फ मात्राएं गिनने की जगह रचना को लय और ताल पर गुनगुनाएं। 

सादर

Comment by Rupam kumar -'मीत' on September 28, 2020 at 10:27am

बहुत उम्दा शे'र हुए है, आ. नाहक साहिब , 

 

"इश्क़ से ना हो राब्ता कोई"  यहा  "ना "  ज़ियादा  उचित  होगा की "न "  का  इस्तिमाल   रौशनी  डाले इस पर सादर |

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