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2122 2122 2122 212

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है नहीं रहना जो पानी में , शिकायत कीजिए
वर्ना घड़ियालों से पहली सी अदावत कीजिए

है नया ये दौर लेकिन वो पुराना ठीक था
सोच लें पहले समझ लें फिर मुहब्बत कीजिए

रंजिशों का बोझ लेकर जी नहीं सकता कोई
छोड़िए ग़ैरों को ख़ुद पर तो इनायत कीजिए

तोड़ने की कोशिशें नाकाम करता जाऊँगा
जोड़ने के नाम पर हर दम सियासत कीजिए

उम्रभर देंगी दुआएं इस चमन की तितलियाँ
इन गुलों की बाग़ में अब तो हिफ़ाज़त कीजिए

मुफ़्त में अब प्यार की दौलत उड़ाते जाइये
नफ़रतों को ख़र्च करने में किफ़ायत कीजिये

दुश्मनी को ख़त्म करना ही पड़ेगा अब हमें
दौर है मुश्किल रक़ीबों से रफ़ाक़त कीजिए

*मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सालिक गणवीर on May 26, 2020 at 5:37pm
आदरणीय समर कबीर साहब
आदाब
मेरे ब्लॉग की सारी ग़ज़लों पर आपकी इस्लाह और मार्ग दर्शन मिला है. ये ग़ज़ल आपकी नज़र में नहीं आई है ,मोहतरम. जनाब एक दफ्अ पढ़ लें तो आगे कुछ लिखने की हिम्मत जुटाऊँ.

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