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विवेक पर जब मन हावी हो जाता है,
तभी तो ऐसा मंजर नजर आता है।
हे मानव, तू अड़ा रहा मनमानी पे,
किया निरंतर खिलवाड़ प्रकृति से।
हे अधम, प्रगति के मद में,
तूने प्रकृति का तिरस्कार किया।
बस, मैं ही मैं हूं ,तू इस खुश फहमी में जिया।
पर, मत भूल, प्रकृति जब विकराल रूप धर लेती है,
फिर वह सांसे भी हर लेती है।
अब भी समय है, हे मानव ,संभल जा,
अपनी हरकतों से बाज आ।

सुन, ए नादान ,गर जीना है सुकून से,
तो प्रकृति की शरण में जा।
वो मां है, तुझे अब भी अपना लेगी,
बस, उसके आंचल में बच्चों सा मचल जा।
द्वारा भूपेंद्र सिंह राणावत
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on March 28, 2020 at 4:13pm

जनाब भूपेंद्र सिंह राणावत जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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