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कोरोना के चक्र की, बड़ी वक्र है चाल।
लापरवाही से बने, साँसों का ये काल।।

निज सदन को मानिए, अपनी जीवन ढाल।
घर से बाहर है खड़ा ,संकट बड़ा विशाल।।

मिलकर देनी है हमें, कोरोना को मात।
काल विभूषित रात की, करनी है प्रभात।।

निज स्वार्थ को छोड़कर, करते जो उपकार।
कोरोना की जंग के ,वो सच्चे किरदार।।

हाथ जोड़ कर दूर से, कीजिये नमस्कार।
हर किसी पर आपका, होगा ये उपकार।।

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on May 1, 2020 at 8:32pm
आदरणीय   narendrasinh chauhan  जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।
Comment by narendrasinh chauhan on April 10, 2020 at 1:44pm
खूब सुंदर रचना, सर

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