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ये ग़म ताज़ा नहीं करना है मुझको

१२२२/१२२२/१२२ 

ये ग़म ताज़ा नहीं करना है मुझको
वफ़ा का नाम अब डसता है मुझको[१]

मुझे वो बा-वफ़ा लगता नहीं है
मगर वो बे-वफ़ा कहता है मुझको[२]

मेरे पीछे जो तूने गुल खिलाए
तेरे चेहरे पे सब दिखता है मुझको[३]

नहीं है ग़मज़दा वो फिर भी उसने
भरम में आज तक रक्खा है मुझको[४]

मोहब्बत को उड़ाकर ख़ाक़ में वो,

सितमगर, बे-झिझक कहता है मुझको[५]

कलेजा चाक करके ख़ूँ किया है,

भला किश्तों में क्यूँ मारा है मुझको[६]

तुझे मैं तंज़ कर के गिर गया हूँ

तेरी नज़रों में यूँ लगता है मुझको[७]

"मौलिक व अप्रकाशित"
रूपम कुमार -'मीत'

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Comment

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Comment by Rupam kumar -'मीत' on June 4, 2020 at 12:55pm

डॉ छोटेलाल सिंह  जी आपका तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ की आपने इस छोटे से बालक का हौसला बढ़ाया अपनी दाद से !!! आपका दिन शुभ हो :)

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on June 4, 2020 at 7:39am

आदरणीय रूपम जी बहुत अच्छी गजल हुई ,दिली मुबारकबाद कुबूल कीजिए

Comment by Rupam kumar -'मीत' on June 3, 2020 at 4:53pm

अमीरुद्दीन खान साहब आपने जो इस्लाह की उससे सहमत हूँ, मैंने सही कर लिया है। आपका स्नेह मिलता रहे, शुक्रिया☺️

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on June 2, 2020 at 10:18am

जनाब रूपम कुमार जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है।बधाई स्वीकार करें। कुछ संशोधन पेश कर रहा हूंँ। उचित लगे तो अप्लाई कर सकते हैं, अन्यथा नज़र अन्दाज़ कर दीजिएगा।

"मोहब्बत वो उड़ाकर ख़ाक में अब.                   “मोहब्बत को उड़ाकर ख़ाक़ में वो, 

 सितमगर बे-झिझक कहता है मुझको[५].            सितमगर, बे-झिझक कहता है मुझको[५]

"कलेजा चाक करके ख़ूँ किया है                        "कलेजा चाक करके ख़ूँ किया है,                         

 तूने किश्तों में यूँ मारा है मुझको[६]                     भला किश्तों में क्यूँ मारा है मुझको[६]       (तूने 2 2 या 21हो सकता है 12 नहीं) 

"तुझे यूँ तंज़ कर के गिर गया हूँ                         " तुझे मैं तंज़ कर के गिर गया हूँ

 तेरी नज़रों में अब लगता है मुझको[७]                 तेरी नज़रों में यूँ लगता है मुझको[७]

 

 

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