For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल (न यूँ दर-दर भटकते हम...)

1222 - 1222 - 1222 - 1222

न यूँ दर-दर भटकते हम जो अपना आशियाँ होता

ख़ुदा ने काश हमको भी किया अह्ल-ए-मकाँ होता 

बिछा  के राहों  में काँटे  पता देते  हैं  मंज़िल   का

कोई  तो  रहनुमा   होता  कोई   तो  मेह्रबाँ   होता

ख़ुदा या  फेर लेता रुख़  जो तू भी ग़म के मारों से

तो  मुझ-से  बेक़रारों का ठिकाना फिर कहाँ होता

बने  तुम  हमसफ़र  मेरे  ख़ुदा  का   शुक्र  है वर्ना 

न  जाने  तुम  कहाँ  होते  न  जाने मैं  कहाँ  होता

हमारे  ग़म-ज़दा  चहरों  की न  पढ़ते  इबारत  तुम 

तो अपना दर्द-ए-ग़म हमसे न लफ़्ज़ों में बयाँ होता 

चलो  ये  राज़  टूटे दिल से ज़ाहिर  हो  गया  वर्ना 

दराज़-ए-दिल में पोशीदा  न ये ग़म भी अयाँ होता 

वतन पे आह! मिटने की  रही ख़्वाहिश अधूरी ही 

मुक़द्दर में  ये होता गर  तो अपना भी  निशाँ होता 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

Views: 113

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 20, 2020 at 8:02pm

जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे-दिल से मशकूर हूँ ।

शाद-ओ-आबाद रहें। 

Comment by Rupam kumar -'मीत' on October 20, 2020 at 8:17am

आ, अमीरुद्दीन साहिब जी, आदाब

अच्छी ग़ज़ल हुई वाह!! चौथा शे'र ख़ूब पसंद आया, 

"न जाने तुम कहाँ होते न जाने मैं कहाँ होता" यह मिस्रा याद हो गया साहिब वाह!!

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 5, 2020 at 8:36am

आदरणीय चेतन प्रकाश जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद, ऐजाज़ बख़्शने और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे-दिल से शुक्रिया। सादर।

Comment by Chetan Prakash on October 5, 2020 at 8:29am

बह्रे हज़ज मुसम्मन सालिम में कही गयी साफ-सुथरी बढ़िया ग़ज़ल, वाह क्या कहने, बधाई शायर 'अमीर' साहब को !

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय सर् नमस्कार । सर् ऊला में 'गीला सा चाँद' की उपमा 'नदी' से की गई है। क्या…"
1 minute ago
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह  'कुशक्षत्रप' जी नमस्कार बहुत बहुत धन्यवाद आपका हौसला…"
2 minutes ago
Krish mishra replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"चाहता हूं मैं ये तस्दीक फरेबी न हो वोइस नगर में मेरी जिस से भी शनासाई हो l  क्या बात है आ.…"
3 minutes ago
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय दिनेश कुमार विश्वकर्मा जी नमस्कार बहुत शुक्रिया आप वक़्त निकाल कर ग़ज़ल तक आए और…"
3 minutes ago
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय दण्डपाणि'नाहक'जी, मैंने सीखने के उद्देश्य से टिप्पणी की थी।सर् की इस्लाह हमेशा…"
7 minutes ago
Krish mishra replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"हाले दिल जान के यूँ मुस्कुरा के चल देना ।तुम भी औरों की तरह एक तमाशाई हो ।.......वाह क्या बात!…"
7 minutes ago
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहब आदाब बहुत बहुत शुक्रिया ज़नाब वक़्त निकाल कर  हौसला…"
9 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
""परीज़ाद'' का अर्थ होता है परी की औलाद, इस कारण से आप वाला भाव लाना मुश्किल हो रहा है…"
14 minutes ago
Krish mishra replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"दौर ऐसा न समय हमको दिखाये भगवनइस तरफ गहरा  कुआँ और उधर खाई हो...... आ. धामी जी, अच्छी गजल के…"
16 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"जी, दुरुस्त है ।"
20 minutes ago
Krish mishra replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"गाँव को शह्र बनाने की है साज़िश कि यहाँन रहें बाग-बगीचे न ही अमराई हो  ये शेर खासा पसंद आया,आ.…"
23 minutes ago
Krish mishra replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-127
"परम आ. समर सर हार्दिक आभार, बेहतरी का प्रयास करता हूँ।"
34 minutes ago

© 2021   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service