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नोटबंदी का मुनाफा काले धन की वापसी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२


पेट जब भरता नहीं गुफ़्तार उसका दोस्तो
ढोइए अब और मत यूँ भार उसका दोस्तो।१।
**
नोटबंदी का मुनाफा काले धन की वापसी
हर वचन जाता रहा  बेकार उसका दोस्तो।२।
**
है खबर रस्ते से करने वो लगा है दरकिनार
रास्ता जिस ने किया  तैयार उस का दोस्तो।३।
**
हाल देखे से न भरनी जो हमारी झोलियाँ
क्या करें इस हाल में दीदार उसका दोस्तो।४।
**
यूँ चमन पूरा खफ़ा हैं फूलों से बरताव पर
दे रहे हैं साथ लेकिन  ख़ार उसका दोस्तो।५।
**
भाण जिनको बोलते जब दे रहे नित गालियाँ
कर रहे गुणगान क्यों हुशियार उसका दोस्तो।६।
**
काट मेरी बात का रख वो रिझायेगा तुम्हें
है जमूरे से न कम किरदार उसका दोस्तो।७।
**
दान में पायी जिन्होंने थैलियाँ अहसान की
करते हैं चुपचाप वो आभार उसका दोस्तो।८।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by सालिक गणवीर on November 2, 2020 at 12:32pm

आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी
सादर अभिवादन
उम्दा भाव और विरोधी तेवर के साथ बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने।
मेरी ओर से हार्दिक बधाई स्वीकार करें.

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 1, 2020 at 8:53pm

बहुत ही खूब ग़ज़ल कही आदरणीय धामी जी...बधाई

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 31, 2020 at 10:15am

आ. लक्ष्मण जी,

उम्दा भाव और विरोधी तेवर लिए ग़ज़ल हुई है.. शिल्प आदि अपर समर सर बता ही चुके हैं..
मेरी ओर से बधाई स्वीकार करें.
सादर 

Comment by Samar kabeer on October 27, 2020 at 8:42pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'पेट जब भरता नहीं गुफ़्तार उसका दोस्तो'

इस मिसरे में 'गुफ़्तार' शब्द स्त्रीलिंग है, अगर ये पुल्लिंग भी मान लें तब भी आप क्या कहना चाहते हैं,समझ नहीं आया ।

'काट मेरी बात का रख वो रिझायेगा तुम्हें
है जमूरे से न कम किरदार उसका दोस्तो'

इस शैर का भाव स्पष्ट नहीं हुआ,और ऊला का शिल्प भी कमज़ोर है,देखियेगा ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 27, 2020 at 11:28am

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार। त्रुटि की ओर ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद..

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 27, 2020 at 10:37am

आदरणीय लक्षमण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। मतले के ऊला में 'गुफ़्तार' शब्द स्त्रीलिंग है, देखियेगा। सादर। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 27, 2020 at 9:37am

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और समर्थन के लिए आभार। 

Comment by TEJ VEER SINGH on October 27, 2020 at 8:43am

हार्दिक बधाई आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर जी।लाज़वाब गज़ल।

भाण जिनको बोलते जब दे रहे नित गालियाँ
कर रहे गुणगान क्यों हुशियार उसका दोस्तो।

काट मेरी बात का रख वो रिझायेगा तुम्हें
है जमूरे से न कम किरदार उसका दोस्तो।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 26, 2020 at 10:07pm

आ. भाई दण्डपाणि नाहक जी, सादर अभिवादन ।गजल पर उपस्थिति व सराहना के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by dandpani nahak on October 26, 2020 at 9:38pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर ' जी नमस्कार बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें

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